प्रश्न 01. प्राचीन भारत से लेकर औपनिवेशिक शासन काल तक के संवैधानिक विकास की प्रक्रिया पर विस्तृत लेख लिखिए।
🔹 परिचय — संवैधानिक विकास का अर्थ और महत्व
संवैधानिक विकास से आशय उस क्रमिक प्रक्रिया से है जिसके माध्यम से किसी देश की शासन-व्यवस्था, प्रशासनिक ढाँचा, अधिकारों की व्यवस्था तथा राज्य की शक्तियों का निर्धारण विकसित होता है। संविधान केवल एक लिखित दस्तावेज नहीं होता, बल्कि यह परम्पराओं, नियमों, संस्थाओं और राजनीतिक विचारों का समन्वित रूप होता है।
भारत में संवैधानिक विकास एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है। यह प्रक्रिया प्राचीन काल से शुरू होकर मध्यकालीन युग से गुजरते हुए औपनिवेशिक शासन तक पहुँची। हर काल ने अपने-अपने ढंग से शासन की संरचना और नियमों को आकार दिया।
🔸 प्राचीन भारत में संवैधानिक विचारों की आधारशिला
प्राचीन भारत में आधुनिक अर्थों में लिखित संविधान नहीं था, लेकिन शासन व्यवस्था स्पष्ट नियमों और सिद्धांतों पर आधारित थी। धर्म, नीति और न्याय शासन के मुख्य आधार थे। राजा को “धर्म का रक्षक” माना जाता था और वह मनमानी नहीं कर सकता था।
उदाहरण के लिए, Ashoka ने अपने शासन में नैतिकता और लोककल्याण को प्रमुख स्थान दिया। उनके शिलालेखों में प्रजा के अधिकारों, धार्मिक सहिष्णुता और प्रशासनिक जिम्मेदारी का उल्लेख मिलता है। यह दर्शाता है कि शासन केवल शक्ति का प्रयोग नहीं था, बल्कि नैतिक उत्तरदायित्व भी था।
प्राचीन ग्रंथों में राज्य के सात अंगों (राजा, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, सेना और मित्र) का उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि शासन संगठित और संरचित था। न्याय व्यवस्था भी विकसित थी, जहाँ अपराध और दंड के स्पष्ट नियम थे।
🔹 ग्राम पंचायत और स्थानीय स्वशासन की परंपरा
प्राचीन भारत में ग्राम पंचायतों की व्यवस्था अत्यंत मजबूत थी। गाँव अपने स्तर पर निर्णय लेते थे। पंचायतें भूमि विवाद, कर निर्धारण और सामाजिक व्यवस्था का संचालन करती थीं।
यह व्यवस्था स्थानीय लोकतंत्र का प्रारंभिक रूप थी। इससे यह सिद्ध होता है कि भारत में संवैधानिक सोच केवल राजमहल तक सीमित नहीं थी, बल्कि समाज की जड़ों तक फैली हुई थी।
🔸 मध्यकालीन काल — केंद्रीकृत शासन और प्रशासनिक ढाँचा
मध्यकाल में भारत में नई राजनीतिक शक्तियों का उदय हुआ। विशेष रूप से Delhi Sultanate और बाद में Mughal Empire की स्थापना हुई।
इस काल में शासन अधिक केंद्रीकृत हो गया। सुल्तान और बादशाह सर्वोच्च सत्ता के प्रतीक थे। प्रशासन को प्रांतों, जिलों और परगनों में विभाजित किया गया। अधिकारियों की नियुक्ति केंद्र से होती थी।
मुगल शासन में राजस्व व्यवस्था, सैन्य संगठन और न्यायिक प्रणाली सुव्यवस्थित थी। अकबर के समय “दिवान”, “मीर बख्शी” और “सदर” जैसे पदों का निर्माण हुआ। यह प्रशासनिक संरचना एक संगठित शासन प्रणाली का संकेत देती है।
हालाँकि इस काल में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व सीमित था, फिर भी प्रशासनिक नियमों और दायित्वों की स्पष्ट व्यवस्था थी।
📍 न्याय और कानून की व्यवस्था
मध्यकाल में कानून का आधार धार्मिक ग्रंथ और शाही आदेश थे। न्यायालयों की स्थापना की गई और काजी तथा अन्य न्यायाधीश नियुक्त किए गए।
इससे स्पष्ट होता है कि शासन केवल सैन्य शक्ति पर आधारित नहीं था, बल्कि विधिक संरचना भी विकसित हो रही थी।
🔹 16th–17th शताब्दी में यूरोपीय प्रभाव और कंपनी शासन की शुरुआत
16th और 17th शताब्दी में यूरोपीय व्यापारिक शक्तियाँ भारत आईं। इनमें सबसे प्रभावशाली रही British East India Company।
शुरुआत में कंपनी केवल व्यापार के उद्देश्य से आई थी, लेकिन धीरे-धीरे उसने राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करना शुरू कर दिया। प्लासी (1757) और बक्सर (1764) की लड़ाइयों के बाद कंपनी का प्रभाव तेजी से बढ़ा।
🔸 Regulating Act 1773 — संवैधानिक विकास की पहली सीढ़ी
1773 का रेगुलेटिंग एक्ट भारत के संवैधानिक इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अधिनियम के माध्यम से ब्रिटिश संसद ने पहली बार कंपनी के प्रशासन पर नियंत्रण स्थापित किया।
इसके तहत:
गवर्नर ऑफ बंगाल को गवर्नर जनरल बनाया गया।
एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई।
कंपनी के कार्यों की निगरानी शुरू हुई।
यह भारतीय प्रशासन को नियंत्रित और संगठित करने की दिशा में पहला औपचारिक कदम था।
🔹 Charter Acts और प्रशासनिक केंद्रीकरण
Charter Acts (1813, 1833, 1853) के माध्यम से कंपनी के अधिकारों में बदलाव किया गया। 1833 के अधिनियम ने गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल को “गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया” बना दिया। इससे प्रशासन का केंद्रीकरण हुआ।
1853 के अधिनियम ने सिविल सेवा परीक्षा की शुरुआत की, जिससे प्रशासन में योग्यता आधारित चयन की परंपरा आई।
📌 1858 का अधिनियम — कंपनी शासन का अंत
1857 के विद्रोह के बाद 1858 में कंपनी शासन समाप्त कर दिया गया और भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया।
यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि अब शासन की जिम्मेदारी सीधे ब्रिटिश सरकार पर थी।
🔸 1861, 1892 और 1909 के सुधार — प्रतिनिधित्व की शुरुआत
1861 के भारतीय परिषद अधिनियम के माध्यम से विधायी परिषदों का विस्तार हुआ। भारतीयों को सीमित रूप से शासन में शामिल किया गया।
1892 के अधिनियम ने प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ाया।
1909 के मॉर्ली-मिन्टो सुधारों ने पहली बार चुनाव की व्यवस्था शुरू की। हालांकि मताधिकार सीमित था, फिर भी यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुरुआत थी।
🔹 1919 का अधिनियम — उत्तरदायी शासन की ओर कदम
1919 के मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के तहत प्रांतों में द्वैध शासन (Diarchy) लागू किया गया। कुछ विभाग भारतीय मंत्रियों को दिए गए, जबकि महत्वपूर्ण विभाग ब्रिटिश अधिकारियों के पास रहे।
यह सीमित स्वशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
🔸 Government of India Act 1935 — व्यापक संवैधानिक ढाँचा
1935 का अधिनियम भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण औपनिवेशिक अधिनियम था। इसके अंतर्गत:
प्रांतीय स्वायत्तता प्रदान की गई।
संघीय संरचना की रूपरेखा दी गई।
केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया।
यह अधिनियम बाद में भारतीय संविधान के निर्माण में आधार बना।
📍 औपनिवेशिक शासन का प्रभाव और सीमाएँ
औपनिवेशिक शासन ने भारत को आधुनिक प्रशासनिक ढाँचा, न्यायपालिका और विधायिका की संरचना दी। लेकिन यह व्यवस्था पूर्ण लोकतांत्रिक नहीं थी। वास्तविक शक्ति ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही रही।
भारतीय नेताओं ने स्वशासन और पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की, जिसके परिणामस्वरूप 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ।
🔹 निष्कर्ष — ऐतिहासिक निरंतरता और आधुनिक संविधान की नींव
प्राचीन भारत से लेकर औपनिवेशिक काल तक संवैधानिक विकास एक सतत और क्रमिक प्रक्रिया रही।
प्राचीन काल ने नैतिक शासन और स्थानीय स्वशासन की नींव रखी।
मध्यकाल ने प्रशासनिक केंद्रीकरण और संगठित व्यवस्था विकसित की।
औपनिवेशिक काल ने लिखित कानून, प्रतिनिधिक संस्थाएँ और संघीय ढाँचे की रूपरेखा दी।
इन सभी चरणों का सम्मिलित प्रभाव स्वतंत्र भारत के संविधान में दिखाई देता है। 1950 में लागू हुआ भारतीय संविधान इन ऐतिहासिक अनुभवों का परिणाम है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि भारत का संवैधानिक विकास अचानक नहीं हुआ, बल्कि यह हजारों वर्षों के अनुभव, संघर्ष और सुधारों की देन है। यह प्रक्रिया हमें यह सिखाती है कि शासन व्यवस्था समय के साथ बदलती रहती है, और समाज की आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को ढालती है।
प्रश्न 02. भारतीय संविधान की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
🔹 परिचय — भारतीय संविधान का स्वरूप
भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत और लिखित संविधान माना जाता है। यह केवल शासन चलाने का दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आदर्शों का दर्पण है। 26 January 1950 को लागू हुआ यह संविधान भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करता है।
भारतीय संविधान की विशेषताएँ इसे अन्य देशों के संविधान से अलग और विशिष्ट बनाती हैं। इसमें कई देशों के संवैधानिक अनुभवों को अपनाया गया है, लेकिन इसे भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढाला गया है।
अब हम इसकी प्रमुख विशेषताओं का क्रमबद्ध अध्ययन करते हैं।
🔸 1. विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान
भारतीय संविधान लिखित और अत्यंत विस्तृत है। प्रारंभ में इसमें 395 अनुच्छेद, 8 अनुसूचियाँ और 22 भाग थे। वर्तमान में संशोधनों के बाद अनुच्छेदों और अनुसूचियों की संख्या बढ़ चुकी है।
इसकी विस्तृतता का कारण है—भारत की विविधता, विशाल जनसंख्या, सामाजिक-आर्थिक असमानता और संघीय ढाँचा। संविधान में शासन के प्रत्येक अंग, नागरिकों के अधिकार और कर्तव्यों तथा केंद्र-राज्य संबंधों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।
🔹 2. संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य
संविधान की प्रस्तावना भारत को “Sovereign, Socialist, Secular, Democratic Republic” घोषित करती है।
📍 Sovereign (संप्रभु) — भारत किसी बाहरी शक्ति के अधीन नहीं है।
📍 Socialist (समाजवादी) — सामाजिक और आर्थिक समानता को बढ़ावा देना।
📍 Secular (धर्मनिरपेक्ष) — राज्य सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखता है।
📍 Democratic (लोकतांत्रिक) — जनता द्वारा, जनता के लिए और जनता का शासन।
📍 Republic (गणराज्य) — राष्ट्राध्यक्ष जनता द्वारा चुना जाता है।
यह विशेषता भारतीय संविधान की मूल आत्मा को व्यक्त करती है।
🔸 3. संघात्मक ढाँचा (Federal Structure) लेकिन एकात्मक प्रवृत्ति के साथ
भारतीय संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है।
संघ सूची
राज्य सूची
समवर्ती सूची
लेकिन आपातकाल की स्थिति में केंद्र को अधिक शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं। इसलिए इसे “संघात्मक प्रणाली जिसमें एकात्मक झुकाव है” कहा जाता है।
🔹 4. संसदीय शासन प्रणाली
भारत में ब्रिटेन की तरह संसदीय शासन प्रणाली अपनाई गई है।
📌 राष्ट्रपति राष्ट्र का संवैधानिक प्रमुख है।
📌 वास्तविक कार्यकारी शक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद के पास होती है।
📌 मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
इस व्यवस्था से जनता की सीधी भागीदारी सुनिश्चित होती है।
🔸 5. मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)
भारतीय संविधान नागरिकों को 6 प्रमुख मौलिक अधिकार प्रदान करता है:
समानता का अधिकार
स्वतंत्रता का अधिकार
शोषण के विरुद्ध अधिकार
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार
संवैधानिक उपचार का अधिकार
ये अधिकार नागरिकों की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करते हैं।
🔹 6. राज्य के नीति-निर्देशक तत्व (Directive Principles of State Policy)
ये तत्व सरकार को सामाजिक और आर्थिक न्याय स्थापित करने के लिए दिशा-निर्देश देते हैं।
हालांकि ये न्यायालय में लागू नहीं किए जा सकते, लेकिन शासन के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।
इनका उद्देश्य एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है।
🔸 7. मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties)
42nd Amendment (1976) के माध्यम से नागरिकों के लिए मौलिक कर्तव्य जोड़े गए।
इनका उद्देश्य नागरिकों में राष्ट्रीय भावना और जिम्मेदारी का विकास करना है।
🔹 8. स्वतंत्र न्यायपालिका (Independent Judiciary)
भारतीय न्यायपालिका स्वतंत्र है। सर्वोच्च न्यायालय संविधान का रक्षक है।
📍 न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) की शक्ति न्यायालय को संविधान की रक्षा करने में सक्षम बनाती है।
📍 न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका पर नियंत्रण रखती है।
यह व्यवस्था लोकतंत्र को मजबूत बनाती है।
🔸 9. संविधान की कठोरता और लचीलापन (Rigid and Flexible Constitution)
भारतीय संविधान न तो पूरी तरह कठोर है और न ही पूरी तरह लचीला।
कुछ प्रावधान साधारण बहुमत से संशोधित हो सकते हैं, जबकि कुछ के लिए विशेष बहुमत और राज्यों की स्वीकृति आवश्यक होती है।
इस संतुलन से संविधान समय के साथ बदलने योग्य बना रहता है।
🔹 10. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise)
भारत में 18 वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक को मतदान का अधिकार है।
यह लोकतंत्र की सच्ची भावना को दर्शाता है और सामाजिक समानता को बढ़ावा देता है।
🔸 11. एकल नागरिकता (Single Citizenship)
भारत में केवल एक नागरिकता है—भारतीय नागरिकता।
यह राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाती है।
🔹 12. आपातकालीन प्रावधान (Emergency Provisions)
संविधान में तीन प्रकार की आपातकालीन व्यवस्थाएँ हैं:
राष्ट्रीय आपातकाल
राज्य आपातकाल
वित्तीय आपातकाल
इन प्रावधानों से संकट की स्थिति में शासन को स्थिर बनाए रखने में सहायता मिलती है।
🔸 13. स्वतंत्र निर्वाचन आयोग (Independent Election Commission)
निर्वाचन आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए उत्तरदायी है।
यह लोकतंत्र की निष्पक्षता सुनिश्चित करता है।
🔹 निष्कर्ष — भारतीय संविधान की विशिष्टता
भारतीय संविधान केवल शासन चलाने का साधन नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति का दस्तावेज है। इसमें स्वतंत्रता, समानता और न्याय के आदर्शों को समाहित किया गया है।
इसकी प्रमुख विशेषताएँ—विस्तृतता, संघीय ढाँचा, संसदीय प्रणाली, मौलिक अधिकार, नीति-निर्देशक तत्व, स्वतंत्र न्यायपालिका और आपातकालीन प्रावधान—इसे विश्व के सबसे प्रभावशाली संविधानों में स्थान दिलाती हैं।
यह संविधान भारतीय समाज की विविधता को एक सूत्र में बाँधने का कार्य करता है। यह समय-समय पर संशोधनों के माध्यम से स्वयं को अद्यतन करता रहा है, जिससे इसकी प्रासंगिकता बनी रहती है।
अतः कहा जा सकता है कि भारतीय संविधान एक जीवंत, गतिशील और प्रगतिशील दस्तावेज है, जो भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है।
प्रश्न 03. भारतीय शासन प्रणाली में संघीय ढांचे की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? केंद्र-राज्य संबंधों की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए समझाइए।
🔹 परिचय — संघीय ढांचे का अर्थ और भारतीय संदर्भ
संघीय शासन प्रणाली (Federal System) वह व्यवस्था है जिसमें सत्ता दो स्तरों में विभाजित होती है—केंद्र और राज्य। दोनों के अधिकार और कर्तव्य संविधान द्वारा निर्धारित होते हैं। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में संघीय ढांचा राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय विविधता के बीच संतुलन स्थापित करने का माध्यम है।
भारतीय संविधान ने संघात्मक व्यवस्था को अपनाया है, परंतु इसमें एकात्मक (Unitary) प्रवृत्तियाँ भी शामिल हैं। इसलिए भारत को “संघात्मक व्यवस्था के साथ एकात्मक झुकाव” वाला राज्य कहा जाता है।
अब हम इसकी प्रमुख विशेषताओं तथा केंद्र-राज्य संबंधों की आलोचनात्मक समीक्षा करेंगे।
🔸 1. द्विस्तरीय शासन व्यवस्था (Dual Polity)
भारतीय संघीय प्रणाली की सबसे प्रमुख विशेषता है—दो स्तरों की सरकार:
केंद्र सरकार
राज्य सरकारें
दोनों अपने-अपने क्षेत्रों में कार्य करती हैं। केंद्र राष्ट्रीय विषयों पर निर्णय लेता है, जबकि राज्य स्थानीय विषयों का संचालन करते हैं।
🔹 2. शक्तियों का स्पष्ट विभाजन
भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में शक्तियों को तीन सूचियों में बाँटा गया है:
📍 संघ सूची (Union List)
📍 राज्य सूची (State List)
📍 समवर्ती सूची (Concurrent List)
संघ सूची के विषयों (जैसे रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा) पर केवल केंद्र कानून बना सकता है।
राज्य सूची के विषयों (जैसे पुलिस, स्वास्थ्य, कृषि) पर राज्य कानून बनाते हैं।
समवर्ती सूची के विषयों पर दोनों कानून बना सकते हैं, पर टकराव की स्थिति में केंद्र का कानून मान्य होगा।
यह स्पष्ट विभाजन संघीय ढांचे की मजबूती को दर्शाता है।
🔸 3. लिखित और सर्वोच्च संविधान
भारत का संविधान लिखित और सर्वोच्च है। केंद्र और राज्य दोनों को अपनी शक्तियाँ संविधान से मिलती हैं।
यदि कोई कानून संविधान के विरुद्ध है, तो न्यायालय उसे निरस्त कर सकता है। यह संघीय संतुलन बनाए रखने में सहायक है।
🔹 4. स्वतंत्र न्यायपालिका
भारत में स्वतंत्र न्यायपालिका संघीय ढांचे की रक्षक है।
📌 सर्वोच्च न्यायालय केंद्र और राज्यों के बीच विवादों का निपटारा करता है।
📌 न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के माध्यम से संविधान की रक्षा की जाती है।
इससे संघीय संतुलन सुरक्षित रहता है।
🔸 5. द्विसदनीय संसद (Bicameral Legislature)
भारत की संसद दो सदनों से मिलकर बनी है—लोकसभा और राज्यसभा।
राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है। इससे राज्यों की भागीदारी केंद्र के कानून निर्माण में सुनिश्चित होती है।
🔹 6. कठोर संविधान
संविधान के कुछ प्रावधानों में संशोधन के लिए विशेष बहुमत और राज्यों की स्वीकृति आवश्यक होती है।
यह संघीय ढांचे की सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण साधन है।
🔸 7. एकल नागरिकता (Single Citizenship)
भारत में केवल एक नागरिकता है। यह संघीय ढांचे के साथ राष्ट्रीय एकता को भी मजबूत बनाती है।
🔹 8. आपातकालीन प्रावधान — एकात्मक झुकाव
संविधान में आपातकालीन प्रावधानों के माध्यम से केंद्र को विशेष शक्तियाँ दी गई हैं।
राष्ट्रीय आपातकाल
राज्य आपातकाल (President’s Rule)
वित्तीय आपातकाल
इन परिस्थितियों में केंद्र राज्य की शक्तियाँ अपने हाथ में ले सकता है। यह संघीय ढांचे की एकात्मक प्रवृत्ति को दर्शाता है।
केंद्र-राज्य संबंधों की आलोचनात्मक समीक्षा
🔹 1. विधायी संबंध (Legislative Relations)
विधायी शक्तियों का विभाजन स्पष्ट है, लेकिन समवर्ती सूची में केंद्र को प्राथमिकता दी गई है।
📍 आलोचना — इससे राज्यों की स्वायत्तता सीमित हो सकती है।
📍 समर्थन — राष्ट्रीय एकरूपता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है।
🔸 2. प्रशासनिक संबंध (Administrative Relations)
राज्य सरकारें कई मामलों में केंद्र के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य होती हैं।
📌 केंद्र राज्य को दिशा-निर्देश दे सकता है।
📌 अखिल भारतीय सेवाएँ (IAS, IPS) केंद्र और राज्य दोनों के अधीन कार्य करती हैं।
आलोचना यह है कि इससे राज्यों की प्रशासनिक स्वतंत्रता कम होती है।
🔹 3. वित्तीय संबंध (Financial Relations)
वित्तीय संसाधनों का बड़ा भाग केंद्र के पास है। राज्यों को अपने कार्यों के लिए केंद्र पर निर्भर रहना पड़ता है।
📍 वित्त आयोग राज्यों को धन के बंटवारे की सिफारिश करता है।
📍 GST व्यवस्था के बाद राज्यों की कराधान शक्ति में परिवर्तन आया है।
आलोचना — राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता सीमित है।
सकारात्मक पक्ष — संसाधनों का समान वितरण संभव हो पाता है।
🔸 4. राज्य आपातकाल का दुरुपयोग
अतीत में कई बार राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) का राजनीतिक कारणों से प्रयोग किया गया।
इससे संघीय ढांचे की भावना को ठेस पहुँची। हालांकि बाद में न्यायपालिका ने इस पर नियंत्रण स्थापित किया।
🔹 5. सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism)
हाल के वर्षों में केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग की भावना बढ़ी है।
📌 नीति आयोग
📌 अंतर-राज्य परिषद
ये संस्थाएँ संवाद और सहयोग को बढ़ावा देती हैं।
🔸 6. प्रतिस्पर्धी संघवाद (Competitive Federalism)
राज्य विकास और निवेश के क्षेत्र में एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। इससे आर्थिक विकास को गति मिली है।
🔹 संतुलित मूल्यांकन
भारतीय संघीय ढांचा न तो पूर्णतः संघात्मक है और न ही पूर्णतः एकात्मक। यह परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने में सक्षम है।
राष्ट्रीय संकट की स्थिति में केंद्र मजबूत भूमिका निभाता है, जबकि सामान्य परिस्थितियों में राज्य स्वायत्त रूप से कार्य करते हैं।
🔸 निष्कर्ष — भारतीय संघवाद की वास्तविकता
भारतीय शासन प्रणाली का संघीय ढांचा राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय विविधता के बीच संतुलन स्थापित करता है।
इसकी प्रमुख विशेषताएँ—द्विस्तरीय शासन, शक्तियों का विभाजन, स्वतंत्र न्यायपालिका, द्विसदनीय संसद और लिखित संविधान—इसे संघात्मक स्वरूप प्रदान करती हैं।
हालाँकि केंद्र को अधिक शक्तियाँ प्राप्त हैं, फिर भी समय के साथ सहकारी संघवाद की भावना मजबूत हुई है।
आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो वित्तीय निर्भरता, राष्ट्रपति शासन का दुरुपयोग और समवर्ती सूची में केंद्र की प्रधानता जैसे मुद्दे संघीय संतुलन को चुनौती देते हैं।
फिर भी भारतीय संघवाद एक गतिशील और व्यावहारिक व्यवस्था है, जो देश की एकता, अखंडता और विकास को सुनिश्चित करती है।
अतः कहा जा सकता है कि भारतीय संघीय ढांचा एक संतुलित, लचीला और परिस्थितियों के अनुकूल विकसित होने वाली प्रणाली है, जिसने विविधताओं से भरे भारत को एक मजबूत राष्ट्र के रूप में संगठित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
प्रश्न 04. संविधान में दिए मौलिक अधिकारों और मौलिक कर्तव्यों का वर्णन कीजिए तथा दोनों के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिए।
🔹 परिचय — अधिकार और कर्तव्य का संतुलन
किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि वहाँ नागरिकों को कितनी स्वतंत्रता और सुरक्षा दी गई है तथा वे अपने कर्तव्यों के प्रति कितने जागरूक हैं। भारतीय संविधान में नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं, ताकि उनकी स्वतंत्रता, समानता और गरिमा सुरक्षित रहे। साथ ही, मौलिक कर्तव्यों को जोड़ा गया है, ताकि नागरिक राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझें।
अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं। जहाँ अधिकार व्यक्ति को शक्ति देते हैं, वहीं कर्तव्य उस शक्ति के सही उपयोग की दिशा निर्धारित करते हैं।
मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)
🔸 मौलिक अधिकारों का अर्थ और महत्व
मौलिक अधिकार वे अधिकार हैं जो संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए हैं और जिन्हें न्यायालय द्वारा संरक्षित किया जाता है। ये अधिकार व्यक्ति के सर्वांगीण विकास और लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक हैं।
भारतीय संविधान के भाग III में मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है।
🔹 1. समानता का अधिकार (Right to Equality)
यह अधिकार सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता प्रदान करता है।
📍 किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा।
📍 समान अवसर का अधिकार सुनिश्चित किया गया है।
यह अधिकार सामाजिक न्याय की आधारशिला है।
🔸 2. स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom)
यह अधिकार नागरिकों को कुछ मूल स्वतंत्रताएँ देता है, जैसे:
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार
संगठन बनाने का अधिकार
देश में कहीं भी रहने और व्यवसाय करने का अधिकार
हालाँकि इन स्वतंत्रताओं पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
🔹 3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right against Exploitation)
📌 मानव तस्करी और जबरन श्रम पर प्रतिबंध है।
📌 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को खतरनाक उद्योगों में काम कराने पर रोक है।
यह अधिकार कमजोर वर्गों की रक्षा करता है।
🔸 4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom of Religion)
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है।
📍 प्रत्येक नागरिक को किसी भी धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता है।
📍 राज्य किसी एक धर्म का पक्ष नहीं लेता।
🔹 5. सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (Cultural and Educational Rights)
यह अधिकार अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति की रक्षा करने का अवसर देता है।
📌 वे अपनी शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित और संचालित कर सकते हैं।
🔸 6. संवैधानिक उपचार का अधिकार (Right to Constitutional Remedies)
यह अधिकार नागरिकों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय जाने की शक्ति देता है।
📍 सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय रिट जारी कर सकते हैं।
📍 इसे संविधान की “आत्मा” कहा गया है।
मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties)
🔹 मौलिक कर्तव्यों का अर्थ और उद्देश्य
मौलिक कर्तव्य नागरिकों के नैतिक और राष्ट्रीय दायित्व हैं। इन्हें 1976 में 42nd संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया। बाद में एक और कर्तव्य जोड़ा गया।
इनका उद्देश्य नागरिकों में देशभक्ति, अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना विकसित करना है।
🔸 प्रमुख मौलिक कर्तव्य
संविधान का पालन करना और उसके आदर्शों का सम्मान करना।
राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना।
देश की एकता और अखंडता की रक्षा करना।
देश की रक्षा करना और राष्ट्रीय सेवा के लिए तत्पर रहना।
साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखना।
प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करना।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना।
सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना।
6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा दिलाना (अभिभावकों का कर्तव्य)।
ये कर्तव्य नागरिकों को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करते हैं।
मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्यों के मध्य अंतर
🔹 1. प्रकृति में अंतर
मौलिक अधिकार कानूनी अधिकार हैं, जिन्हें न्यायालय द्वारा लागू कराया जा सकता है।
मौलिक कर्तव्य नैतिक दायित्व हैं, जिन्हें सीधे न्यायालय में लागू नहीं कराया जा सकता।
🔸 2. उद्देश्य में अंतर
अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
कर्तव्य राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी और अनुशासन को बढ़ावा देते हैं।
🔹 3. कानूनी संरक्षण
अधिकारों का उल्लंघन होने पर नागरिक न्यायालय जा सकते हैं।
कर्तव्यों के उल्लंघन पर सीधे कोई दंड नहीं है, लेकिन कुछ कानूनों के माध्यम से अप्रत्यक्ष दंड हो सकता है।
🔸 4. महत्व का स्वरूप
अधिकार लोकतंत्र की नींव हैं।
कर्तव्य लोकतंत्र की मजबूती का आधार हैं।
🔹 5. संतुलन की आवश्यकता
यदि केवल अधिकार हों और कर्तव्य न हों, तो अराजकता फैल सकती है।
यदि केवल कर्तव्य हों और अधिकार न हों, तो तानाशाही का खतरा हो सकता है।
इसलिए दोनों का संतुलन आवश्यक है।
आलोचनात्मक दृष्टिकोण
कुछ विद्वानों का मत है कि मौलिक कर्तव्यों को न्यायालय में लागू न कर पाने के कारण उनकी प्रभावशीलता कम है।
लेकिन दूसरी ओर यह भी सत्य है कि कर्तव्य नागरिकों में नैतिक जागरूकता पैदा करते हैं। यदि नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन करें, तो अधिकारों की रक्षा स्वतः हो जाती है।
🔹 निष्कर्ष — लोकतंत्र का संतुलित आधार
भारतीय संविधान ने नागरिकों को व्यापक मौलिक अधिकार प्रदान किए हैं, जिससे व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और गरिमा सुरक्षित रहती है। साथ ही मौलिक कर्तव्यों के माध्यम से नागरिकों को राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों की याद दिलाई गई है।
दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अधिकार हमें शक्ति देते हैं और कर्तव्य हमें उस शक्ति का सही उपयोग करना सिखाते हैं।
अतः कहा जा सकता है कि मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य मिलकर भारतीय लोकतंत्र की मजबूत नींव तैयार करते हैं। जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों का भी पालन करते हैं, तभी राष्ट्र सशक्त और समृद्ध बनता है। 🔹📌
प्रश्न 05. स्थानीय स्वशासन की आवश्यकता क्या है? 73वें और 74वें संविधान संशोधन के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
🔹 परिचय — लोकतंत्र की जड़ें और स्थानीय स्वशासन
लोकतंत्र केवल संसद और विधानसभाओं तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसकी वास्तविक शक्ति गाँव और शहरों तक फैली होती है। जब शासन जनता के निकट होता है और स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर किया जाता है, तब लोकतंत्र मजबूत होता है। इसी व्यवस्था को स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) कहा जाता है।
भारत जैसे विशाल और विविध देश में हर क्षेत्र की समस्याएँ अलग-अलग हैं। इसलिए स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्थानीय स्वशासन जनता को शासन में प्रत्यक्ष भागीदारी का अवसर देता है।
स्थानीय स्वशासन की आवश्यकता
🔸 1. लोकतंत्र की मजबूती
स्थानीय स्वशासन लोकतंत्र की आधारशिला है। जब ग्राम पंचायत, नगर पालिका और नगर निगम जैसे संस्थान कार्य करते हैं, तब जनता सीधे शासन से जुड़ती है।
📍 इससे लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि निरंतर सहभागिता का रूप लेता है।
🔹 2. स्थानीय समस्याओं का त्वरित समाधान
गाँव और शहरों की समस्याएँ अलग-अलग होती हैं—जैसे सड़क, पानी, बिजली, स्वच्छता, शिक्षा आदि।
स्थानीय निकाय इन समस्याओं को बेहतर ढंग से समझते हैं और शीघ्र समाधान कर सकते हैं।
🔸 3. विकेंद्रीकरण (Decentralization) की आवश्यकता
केंद्र और राज्य सरकारों पर अधिक भार होने से प्रशासनिक कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
📌 स्थानीय स्वशासन के माध्यम से प्रशासनिक शक्तियों का विकेंद्रीकरण होता है।
📌 इससे कार्यों में पारदर्शिता और दक्षता आती है।
🔹 4. जनभागीदारी और नेतृत्व का विकास
स्थानीय निकायों के माध्यम से सामान्य नागरिक भी नेतृत्व की भूमिका निभा सकते हैं।
📍 इससे राजनीतिक जागरूकता बढ़ती है।
📍 महिलाओं और पिछड़े वर्गों को भी प्रतिनिधित्व मिलता है।
🔸 5. सामाजिक और आर्थिक विकास
स्थानीय संस्थाएँ विकास योजनाओं को क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुसार लागू करती हैं।
📌 ग्रामीण विकास, कृषि सुधार, स्वास्थ्य सेवाएँ और शिक्षा का प्रसार स्थानीय स्तर पर अधिक प्रभावी होता है।
73वाँ संविधान संशोधन (1992) — पंचायती राज व्यवस्था
🔹 पृष्ठभूमि
स्वतंत्रता के बाद भी पंचायतों को पर्याप्त संवैधानिक दर्जा नहीं मिला था। इसलिए 1992 में 73वाँ संविधान संशोधन पारित किया गया, जो 1993 में लागू हुआ।
इस संशोधन के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला।
🔸 73वें संशोधन की प्रमुख विशेषताएँ
📍 संविधान में भाग IX जोड़ा गया।
📍 तीन-स्तरीय पंचायत व्यवस्था स्थापित की गई:
ग्राम पंचायत
पंचायत समिति (ब्लॉक स्तर)
जिला परिषद
📍 प्रत्येक 5 वर्ष में नियमित चुनाव अनिवार्य किए गए।
📍 अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई।
📍 वित्त आयोग की स्थापना का प्रावधान किया गया।
📍 29 विषय पंचायतों को सौंपे गए (11वीं अनुसूची में)।
🔹 महत्व
73वें संशोधन ने ग्रामीण क्षेत्रों में लोकतंत्र को सशक्त किया। महिलाओं को कम से कम 1/3 आरक्षण मिला, जिससे उनकी भागीदारी बढ़ी।
यह संशोधन ग्रामीण स्वराज की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
74वाँ संविधान संशोधन (1992) — नगर निकाय व्यवस्था
🔸 पृष्ठभूमि
शहरी क्षेत्रों में नगर पालिकाओं और नगर निगमों की स्थिति भी मजबूत नहीं थी। इसलिए 74वाँ संशोधन लागू किया गया।
🔹 74वें संशोधन की प्रमुख विशेषताएँ
📍 संविधान में भाग IX-A जोड़ा गया।
📍 तीन प्रकार के शहरी निकायों की व्यवस्था:
नगर पंचायत
नगर पालिका
नगर निगम
📍 नियमित चुनाव की अनिवार्यता।
📍 SC, ST और महिलाओं के लिए आरक्षण।
📍 राज्य वित्त आयोग का गठन।
📍 18 विषय नगर निकायों को सौंपे गए (12वीं अनुसूची में)।
🔸 महत्व
इस संशोधन से शहरी स्वशासन को मजबूती मिली।
📌 शहरी विकास योजनाएँ स्थानीय स्तर पर लागू होने लगीं।
📌 नगर निकायों की जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ी।
आलोचनात्मक दृष्टिकोण
🔹 1. वित्तीय निर्भरता
स्थानीय निकाय आज भी वित्तीय रूप से राज्य सरकार पर निर्भर हैं।
🔸 2. प्रशासनिक नियंत्रण
राज्य सरकार का नियंत्रण अधिक होने के कारण पूर्ण स्वायत्तता नहीं मिल पाती।
🔹 3. क्षमता और प्रशिक्षण की कमी
कई प्रतिनिधियों को प्रशासनिक अनुभव नहीं होता, जिससे योजनाओं के क्रियान्वयन में कठिनाई आती है।
समग्र मूल्यांकन
73वें और 74वें संशोधनों ने स्थानीय स्वशासन को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की।
📍 लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हुईं।
📍 महिलाओं और वंचित वर्गों को राजनीतिक सशक्तिकरण मिला।
📍 विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को गति मिली।
हालाँकि वित्तीय और प्रशासनिक चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं, फिर भी ये संशोधन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर हैं।
🔹 निष्कर्ष — लोकतंत्र का वास्तविक रूप
स्थानीय स्वशासन लोकतंत्र की आत्मा है। यदि शासन जनता के निकट होगा, तो विकास अधिक प्रभावी और समावेशी होगा।
73वें और 74वें संविधान संशोधनों ने गाँव और शहरों को शासन की मुख्य धारा से जोड़ा।
इन संशोधनों ने यह सिद्ध किया कि भारत में लोकतंत्र केवल शीर्ष स्तर पर नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी जीवंत है।
अतः कहा जा सकता है कि स्थानीय स्वशासन की आवश्यकता लोकतंत्र की मजबूती, सामाजिक न्याय और समग्र विकास के लिए अत्यंत अनिवार्य है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 01. संवैधानिक विकास में शासन अधिनियम, 1935 का क्या योगदान था? स्पष्ट कीजिए।
🔹 परिचय — संवैधानिक विकास में एक महत्वपूर्ण चरण
भारतीय संवैधानिक इतिहास में शासन अधिनियम, 1935 (Government of India Act, 1935) एक अत्यंत महत्वपूर्ण मील का पत्थर था। यह ब्रिटिश शासन द्वारा पारित सबसे व्यापक और विस्तृत अधिनियम था। इस अधिनियम ने भारत की प्रशासनिक, विधायी और संघीय संरचना को नई दिशा दी।
हालाँकि यह अधिनियम पूर्ण स्वशासन प्रदान नहीं करता था, फिर भी इसने स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माण की आधारशिला रखी। अनेक प्रावधान बाद में भारतीय संविधान में शामिल किए गए।
शासन अधिनियम, 1935 की पृष्ठभूमि
🔸 राजनीतिक परिस्थितियाँ
1919 के अधिनियम से भारतीयों को सीमित स्वशासन मिला था, परंतु भारतीय नेताओं की मांग पूर्ण उत्तरदायी शासन की थी।
📍 साइमन कमीशन (1927)
📍 गोलमेज सम्मेलन (1930–32)
📍 श्वेत पत्र (White Paper)
इन घटनाओं के परिणामस्वरूप शासन अधिनियम, 1935 अस्तित्व में आया।
शासन अधिनियम, 1935 की प्रमुख विशेषताएँ
🔹 1. संघीय शासन की स्थापना का प्रस्ताव
इस अधिनियम में अखिल भारतीय संघ (All India Federation) की स्थापना का प्रावधान था।
📌 संघ में ब्रिटिश भारत के प्रांत और रियासतें शामिल होने वाली थीं।
📌 केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया।
हालाँकि रियासतों के शामिल न होने के कारण संघीय व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं हो सकी।
🔸 2. शक्तियों का तीन सूचियों में विभाजन
इस अधिनियम के अंतर्गत शक्तियों को तीन भागों में बाँटा गया:
संघ सूची
प्रांतीय सूची
समवर्ती सूची
यह व्यवस्था बाद में भारतीय संविधान में भी अपनाई गई।
🔹 3. प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy)
1919 के अधिनियम में लागू द्वैध शासन (Diarchy) को समाप्त कर दिया गया।
📍 प्रांतों को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान की गई।
📍 मंत्रिपरिषद विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी बनी।
यह प्रावधान भारतीय प्रांतों को वास्तविक प्रशासनिक अधिकार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।
🔸 4. केंद्र में द्वैध शासन (Diarchy at Centre)
हालाँकि प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर दिया गया, लेकिन केंद्र में इसे लागू किया गया।
📌 रक्षा और विदेश नीति जैसे विषय गवर्नर जनरल के अधीन रहे।
📌 अन्य विषय मंत्रियों को सौंपे गए।
यह व्यवस्था जटिल और अव्यवहारिक थी, इसलिए पूरी तरह सफल नहीं हो सकी।
🔹 5. द्विसदनीय विधायिका (Bicameral Legislature)
केंद्र में दो सदनों की व्यवस्था की गई:
📍 संघीय सभा (Federal Assembly)
📍 राज्य परिषद (Council of States)
यह व्यवस्था आधुनिक भारतीय संसद की संरचना का आधार बनी।
🔸 6. संघीय न्यायालय की स्थापना
इस अधिनियम के तहत 1937 में संघीय न्यायालय की स्थापना की गई।
📌 यह केंद्र और प्रांतों के बीच विवादों का निपटारा करता था।
📌 यही संस्था आगे चलकर सर्वोच्च न्यायालय की आधारशिला बनी।
🔹 7. निर्वाचन प्रणाली का विस्तार
मताधिकार का दायरा बढ़ाया गया, हालांकि यह अभी भी सीमित था।
📍 अलग-अलग समुदायों के लिए पृथक निर्वाचन (Separate Electorates) की व्यवस्था जारी रही।
यह प्रावधान आलोचना का विषय बना क्योंकि इससे साम्प्रदायिक विभाजन को बढ़ावा मिला।
🔸 8. रिजर्व बैंक और लोक सेवा आयोग
इस अधिनियम के तहत भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना (1935) की गई।
📌 संघ लोक सेवा आयोग और प्रांतीय लोक सेवा आयोगों की व्यवस्था की गई।
ये संस्थाएँ प्रशासनिक ढाँचे को मजबूत करने में सहायक रहीं।
शासन अधिनियम, 1935 का संवैधानिक विकास में योगदान
🔹 1. संघीय ढाँचे की आधारशिला
इस अधिनियम ने केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों के विभाजन की स्पष्ट व्यवस्था दी, जो बाद में भारतीय संविधान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।
🔸 2. प्रांतीय स्वायत्तता की शुरुआत
प्रांतों को स्वायत्तता देने से भारतीय नेताओं को शासन का व्यावहारिक अनुभव मिला।
1937 के चुनावों के बाद कई प्रांतों में कांग्रेस मंत्रिमंडल बने, जिससे प्रशासनिक अनुभव प्राप्त हुआ।
🔹 3. आधुनिक संस्थाओं की स्थापना
संघीय न्यायालय, लोक सेवा आयोग और रिजर्व बैंक जैसी संस्थाओं की स्थापना ने प्रशासनिक और आर्थिक ढाँचे को मजबूत किया।
🔸 4. संविधान निर्माण का आधार
स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माताओं ने 1935 के अधिनियम के कई प्रावधानों को अपनाया।
📍 शक्तियों का विभाजन
📍 प्रांतीय स्वायत्तता
📍 संघीय न्यायालय की अवधारणा
हालाँकि कई कमियों को दूर कर लोकतांत्रिक और उत्तरदायी शासन की स्थापना की गई।
शासन अधिनियम, 1935 की आलोचना
🔹 1. पूर्ण स्वशासन का अभाव
अधिनियम के बावजूद वास्तविक शक्ति गवर्नर जनरल और ब्रिटिश सरकार के पास थी।
🔸 2. केंद्र में द्वैध शासन की जटिलता
केंद्र में लागू द्वैध शासन अव्यवहारिक और असफल रहा।
🔹 3. साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली
अलग निर्वाचन व्यवस्था ने समाज में विभाजन को बढ़ावा दिया।
समग्र मूल्यांकन
शासन अधिनियम, 1935 पूर्ण रूप से संतोषजनक नहीं था, लेकिन यह भारतीय संवैधानिक विकास का महत्वपूर्ण चरण था।
📍 इसने संघीय ढाँचे की नींव रखी।
📍 प्रांतीय स्वायत्तता प्रदान की।
📍 प्रशासनिक संस्थाओं को मजबूत किया।
हालाँकि इसमें कई सीमाएँ थीं, फिर भी इस अधिनियम ने भारतीय संविधान के निर्माण के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
🔹 निष्कर्ष — स्वतंत्र भारत के संविधान की पूर्वपीठिका
शासन अधिनियम, 1935 भारतीय संवैधानिक विकास की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण कड़ी था। इसने भारत को संघीय संरचना, प्रशासनिक अनुभव और संस्थागत ढाँचा प्रदान किया।
यद्यपि यह अधिनियम पूर्ण स्वतंत्रता का प्रतीक नहीं था, फिर भी इसने भारत को आधुनिक संवैधानिक शासन की दिशा में अग्रसर किया।
अतः कहा जा सकता है कि शासन अधिनियम, 1935 ने भारतीय संविधान की रूपरेखा तैयार करने में आधारभूत योगदान दिया और स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे की पूर्वपीठिका सिद्ध हुआ। 🔹📌
प्रश्न 02. भारतीय संविधान के देशी और विदेशी स्त्रोतों का वर्णन कीजिए।
🔹 परिचय — विविध स्रोतों से निर्मित एक अनोखा संविधान
भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत और समन्वित संविधान है। यह किसी एक देश या परंपरा का परिणाम नहीं है, बल्कि विभिन्न देशी (भारतीय) और विदेशी स्रोतों से प्राप्त विचारों, सिद्धांतों और अनुभवों का संगम है। संविधान निर्माताओं ने विश्व के अनेक संविधानों का अध्ययन किया और भारत की परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त प्रावधानों को अपनाया।
इसलिए भारतीय संविधान को “उधार का थैला” भी कहा गया, परंतु वास्तव में यह उधार नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण चयन और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप संशोधन का परिणाम है।
अब हम देशी और विदेशी स्रोतों का क्रमबद्ध अध्ययन करते हैं।
देशी (भारतीय) स्त्रोत
🔸 1. भारत शासन अधिनियम, 1935 का प्रभाव
भारतीय संविधान का सबसे बड़ा देशी स्रोत 1935 का शासन अधिनियम था।
📍 संघीय ढांचा
📍 केंद्र और राज्य के बीच शक्तियों का विभाजन
📍 प्रांतीय स्वायत्तता
📍 संघीय न्यायालय की अवधारणा
📍 आपातकालीन प्रावधान
इनमें से अनेक प्रावधान बाद में भारतीय संविधान में शामिल किए गए।
🔹 2. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का प्रभाव
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय नेताओं ने लोकतंत्र, समानता और स्वतंत्रता की मांग की।
📌 1928 की नेहरू रिपोर्ट
📌 1931 का कराची प्रस्ताव (जिसमें मौलिक अधिकारों का उल्लेख था)
इन दस्तावेजों ने संविधान में मौलिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की अवधारणा को प्रभावित किया।
🔸 3. प्राचीन भारतीय परंपराएँ और मूल्य
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में “न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता” जैसे शब्द भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े हैं।
📍 ग्राम पंचायत की अवधारणा
📍 सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता की भावना
📍 सामाजिक समरसता
ये तत्व भारतीय समाज की ऐतिहासिक विरासत से प्रेरित हैं।
🔹 4. संविधान सभा की बहसें
संविधान सभा में व्यापक चर्चा और विचार-विमर्श हुआ।
📌 विभिन्न समितियों की रिपोर्ट
📌 डॉ. भीमराव आंबेडकर का योगदान
📌 पंडित नेहरू, सरदार पटेल आदि नेताओं के विचार
इन बहसों ने संविधान को व्यावहारिक और संतुलित रूप दिया।
विदेशी स्त्रोत
भारतीय संविधान निर्माताओं ने कई देशों के संविधानों से प्रेरणा ली।
🔸 1. ब्रिटेन (United Kingdom)
ब्रिटेन के संविधान से निम्नलिखित प्रावधान लिए गए:
📍 संसदीय शासन प्रणाली
📍 मंत्रिपरिषद की सामूहिक उत्तरदायित्व
📍 विधि का शासन (Rule of Law)
📍 लोकसभा की प्रधानता
ब्रिटिश प्रणाली ने भारतीय लोकतंत्र की संरचना को आकार दिया।
🔹 2. अमेरिका (United States of America)
अमेरिकी संविधान से लिए गए प्रमुख प्रावधान:
📌 मौलिक अधिकार
📌 न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review)
📌 स्वतंत्र न्यायपालिका
📌 संघीय ढांचे की अवधारणा
अमेरिका से प्रेरित होकर नागरिकों को व्यापक अधिकार प्रदान किए गए।
🔸 3. आयरलैंड (Ireland)
आयरलैंड से राज्य के नीति-निर्देशक तत्व (Directive Principles of State Policy) की अवधारणा ली गई।
📍 राष्ट्रपति के निर्वाचन की पद्धति भी आयरलैंड से प्रेरित है।
🔹 4. कनाडा (Canada)
कनाडा से निम्नलिखित प्रावधान लिए गए:
📌 संघात्मक ढांचा जिसमें केंद्र को अधिक शक्तियाँ
📌 अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को देना
🔸 5. ऑस्ट्रेलिया (Australia)
ऑस्ट्रेलिया से प्रेरित प्रावधान:
📍 समवर्ती सूची
📍 केंद्र और राज्यों के बीच व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता
🔹 6. जर्मनी (Germany)
आपातकालीन प्रावधान जर्मनी के संविधान से प्रेरित हैं।
📌 आपातकाल की स्थिति में मौलिक अधिकारों का निलंबन
🔸 7. सोवियत संघ (USSR)
सोवियत संघ से प्रेरित होकर मौलिक कर्तव्यों की अवधारणा अपनाई गई।
📍 सामाजिक, आर्थिक न्याय की भावना भी इसी से प्रभावित है।
🔹 8. दक्षिण अफ्रीका (South Africa)
संविधान संशोधन की प्रक्रिया और राज्यसभा के सदस्यों के निर्वाचन की पद्धति दक्षिण अफ्रीका से ली गई।
समग्र विश्लेषण
भारतीय संविधान विभिन्न स्रोतों का समन्वय है। यह किसी एक देश की नकल नहीं है, बल्कि विभिन्न देशों के श्रेष्ठ सिद्धांतों को भारतीय परिस्थितियों के अनुसार ढालकर तैयार किया गया है।
📍 देशी स्रोतों ने इसे भारतीय समाज के अनुरूप बनाया।
📍 विदेशी स्रोतों ने इसे आधुनिक और प्रगतिशील स्वरूप दिया।
🔹 आलोचनात्मक दृष्टिकोण
कुछ आलोचकों का मत है कि संविधान में विदेशी तत्वों की अधिकता है।
लेकिन यह भी सत्य है कि संविधान निर्माताओं ने प्रत्येक प्रावधान को भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप संशोधित किया।
इसलिए इसे मौलिक और स्वतंत्र दस्तावेज माना जाना चाहिए।
🔸 निष्कर्ष — समन्वय और मौलिकता का अद्भुत उदाहरण
भारतीय संविधान देशी और विदेशी स्रोतों का सुंदर समन्वय है।
देशी स्रोतों ने इसे भारतीय समाज और स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से जोड़ा, जबकि विदेशी स्रोतों ने इसे आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों से समृद्ध किया।
इस प्रकार भारतीय संविधान न तो पूर्णतः विदेशी है और न ही केवल परंपरागत भारतीय। यह एक ऐसा संतुलित दस्तावेज है जो विश्व के श्रेष्ठ सिद्धांतों को अपनाकर भारत की विविधता और एकता को सुरक्षित रखता है।
अतः कहा जा सकता है कि भारतीय संविधान का निर्माण विचारों के वैश्विक आदान-प्रदान और भारतीय अनुभवों के समन्वय का परिणाम है, जो इसे विश्व के सबसे प्रभावशाली संविधानों में स्थान दिलाता है।
प्रश्न 03. 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में अपनाए गए संशोधनों पर निबंध लिखिए।
🔹 परिचय — प्रस्तावना का महत्व और 42वाँ संशोधन
भारतीय संविधान की प्रस्तावना (Preamble) संविधान की आत्मा मानी जाती है। यह संविधान के उद्देश्यों, आदर्शों और मूल्यों को स्पष्ट करती है। प्रस्तावना हमें बताती है कि भारत किस प्रकार का राज्य है और उसका अंतिम लक्ष्य क्या है।
1976 में आपातकाल की पृष्ठभूमि में 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया गया, जिसे अक्सर “लघु संविधान” (Mini Constitution) कहा जाता है क्योंकि इसने संविधान के कई भागों में व्यापक परिवर्तन किए। इस संशोधन के माध्यम से प्रस्तावना में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए।
अब हम विस्तार से समझते हैं कि 42वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में क्या परिवर्तन किए गए और उनका क्या महत्व है।
42वें संविधान संशोधन की पृष्ठभूमि
🔸 राजनीतिक परिस्थिति
1975 में देश में आपातकाल लागू किया गया। इस अवधि में सरकार ने संविधान में व्यापक संशोधन करने का निर्णय लिया।
📍 सरकार का उद्देश्य संविधान को अधिक स्पष्ट और समाजवादी दिशा देना था।
📍 आलोचकों का मत था कि यह संशोधन सत्ता को मजबूत करने का प्रयास था।
इसी संदर्भ में 1976 में 42वाँ संशोधन पारित हुआ।
प्रस्तावना में किए गए प्रमुख संशोधन
🔹 1. “समाजवादी” (Socialist) शब्द का समावेश
संविधान की मूल प्रस्तावना में “समाजवादी” शब्द नहीं था।
42वें संशोधन द्वारा “समाजवादी” शब्द जोड़ा गया।
📍 इसका उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक समानता को बढ़ावा देना था।
📍 राज्य को ऐसी नीतियाँ अपनाने के लिए प्रेरित करना था जो धन और संसाधनों का समान वितरण सुनिश्चित करें।
इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारत केवल राजनीतिक लोकतंत्र नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय की दिशा में भी कार्य करेगा।
🔸 2. “धर्मनिरपेक्ष” (Secular) शब्द का समावेश
मूल प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता की भावना थी, लेकिन “Secular” शब्द स्पष्ट रूप से नहीं लिखा गया था।
42वें संशोधन के माध्यम से “धर्मनिरपेक्ष” शब्द जोड़ा गया।
📍 इसका अर्थ है कि राज्य किसी विशेष धर्म का पक्ष नहीं लेगा।
📍 सभी धर्मों को समान सम्मान और संरक्षण मिलेगा।
हालाँकि संविधान की धाराओं में पहले से ही धार्मिक स्वतंत्रता का प्रावधान था, लेकिन इस संशोधन ने इसे स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त किया।
🔹 3. “राष्ट्रीय एकता और अखंडता” (Unity and Integrity) का समावेश
मूल प्रस्तावना में केवल “राष्ट्रीय एकता” का उल्लेख था।
42वें संशोधन द्वारा “अखंडता” (Integrity) शब्द जोड़ा गया।
📍 इसका उद्देश्य देश की भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करना था।
📍 यह विशेष रूप से अलगाववादी प्रवृत्तियों और आंतरिक चुनौतियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण था।
संशोधनों का महत्व
🔸 1. सामाजिक न्याय की पुष्टि
“समाजवादी” शब्द जोड़ने से यह स्पष्ट हुआ कि भारत एक कल्याणकारी राज्य है।
📍 गरीबी उन्मूलन
📍 समान अवसर
📍 सामाजिक सुरक्षा
ये सभी नीतियाँ इसी विचारधारा से प्रेरित हैं।
🔹 2. धर्मनिरपेक्षता की स्पष्ट घोषणा
“धर्मनिरपेक्ष” शब्द ने भारत की धार्मिक विविधता को संवैधानिक मान्यता दी।
📌 इससे अल्पसंख्यकों में विश्वास की भावना मजबूत हुई।
📌 राज्य की निष्पक्षता स्पष्ट हुई।
🔸 3. राष्ट्रीय एकता की मजबूती
“अखंडता” शब्द ने राष्ट्रीय एकता को और अधिक सुदृढ़ किया।
📍 यह संदेश दिया गया कि देश की संप्रभुता और सीमाओं की रक्षा सर्वोपरि है।
आलोचनात्मक दृष्टिकोण
🔹 1. राजनीतिक उद्देश्य का आरोप
कुछ विद्वानों का मत है कि 42वाँ संशोधन आपातकाल के दौरान पारित हुआ, इसलिए इसमें राजनीतिक उद्देश्य निहित थे।
🔸 2. शब्दों का व्यावहारिक प्रभाव
कुछ लोगों का तर्क है कि “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्द पहले से ही संविधान की धाराओं में निहित थे, इसलिए इन्हें जोड़ना केवल औपचारिक परिवर्तन था।
🔹 3. न्यायपालिका की भूमिका
बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने “मूल संरचना सिद्धांत” (Basic Structure Doctrine) के माध्यम से स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है।
इससे यह सुनिश्चित हुआ कि प्रस्तावना के मूल तत्वों को बदला नहीं जा सकता।
समग्र मूल्यांकन
42वें संविधान संशोधन द्वारा प्रस्तावना में किए गए परिवर्तन प्रतीकात्मक होने के साथ-साथ वैचारिक रूप से महत्वपूर्ण थे।
📍 “समाजवादी” ने आर्थिक न्याय को बल दिया।
📍 “धर्मनिरपेक्ष” ने धार्मिक समानता को स्पष्ट किया।
📍 “अखंडता” ने राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ किया।
इन परिवर्तनों ने संविधान के उद्देश्यों को अधिक स्पष्ट और व्यापक बनाया।
🔹 निष्कर्ष — प्रस्तावना का विस्तृत और सुदृढ़ स्वरूप
42वाँ संविधान संशोधन भारतीय संविधान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। प्रस्तावना में जोड़े गए शब्दों ने संविधान के मूल आदर्शों को अधिक स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया।
हालाँकि इस संशोधन को लेकर विवाद भी हुए, लेकिन यह सत्य है कि “समाजवादी”, “धर्मनिरपेक्ष” और “अखंडता” जैसे शब्द आज भारतीय संविधान की पहचान बन चुके हैं।
अतः कहा जा सकता है कि 42वें संविधान संशोधन ने प्रस्तावना को वैचारिक रूप से अधिक सशक्त और स्पष्ट बनाया तथा भारतीय राज्य की प्रकृति को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया।
प्रश्न 04. केंद्र और राज्यों के मध्य विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय संबंधों पर प्रकाश डालिए।
🔹 परिचय — संघीय व्यवस्था में संतुलन का प्रश्न
भारत एक संघात्मक राज्य है, जहाँ शासन दो स्तरों पर संचालित होता है—केंद्र और राज्य। संविधान ने दोनों के अधिकारों, कर्तव्यों और सीमाओं को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया है। संघीय व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि केंद्र और राज्यों के बीच संबंध संतुलित, स्पष्ट और सहयोगपूर्ण हों।
भारतीय संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच संबंध तीन प्रमुख आधारों पर निर्धारित किए गए हैं:
विधायी संबंध
प्रशासनिक संबंध
वित्तीय संबंध
अब इन तीनों पहलुओं का क्रमबद्ध अध्ययन करते हैं।
विधायी संबंध (Legislative Relations)
🔸 1. शक्तियों का संवैधानिक विभाजन
संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का विभाजन किया गया है।
📍 संघ सूची (Union List) — ऐसे विषय जिन पर केवल संसद कानून बना सकती है, जैसे रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा, संचार आदि।
📍 राज्य सूची (State List) — ऐसे विषय जिन पर राज्य विधानमंडल कानून बना सकता है, जैसे पुलिस, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि, स्थानीय शासन आदि।
📍 समवर्ती सूची (Concurrent List) — ऐसे विषय जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं, जैसे शिक्षा, विवाह, वन, श्रम आदि।
यदि समवर्ती सूची में केंद्र और राज्य के कानूनों में टकराव हो, तो केंद्र का कानून प्रभावी होता है।
🔹 2. अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers)
जो विषय किसी भी सूची में शामिल नहीं हैं, वे अवशिष्ट शक्तियाँ कहलाते हैं।
📌 भारत में अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को प्रदान की गई हैं।
यह प्रावधान संघीय ढांचे में केंद्र को अधिक सशक्त बनाता है।
🔸 3. विशेष परिस्थितियों में संसद की शक्ति
कुछ स्थितियों में संसद राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है:
यदि राज्यसभा राष्ट्रीय हित में प्रस्ताव पारित करे।
आपातकाल की स्थिति में।
दो या दो से अधिक राज्यों के अनुरोध पर।
यह व्यवस्था राष्ट्रीय एकरूपता बनाए रखने के लिए बनाई गई है।
प्रशासनिक संबंध (Administrative Relations)
🔹 1. कार्यपालिका की शक्ति का विभाजन
केंद्र और राज्य दोनों अपनी-अपनी कार्यपालिका शक्तियों का प्रयोग करते हैं।
📍 राज्य सरकारें अपने क्षेत्र में प्रशासनिक कार्य करती हैं।
📍 केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर पर प्रशासन संचालित करती है।
🔸 2. केंद्र के निर्देश देने की शक्ति
संविधान के अनुसार केंद्र राज्य सरकारों को कुछ मामलों में निर्देश दे सकता है।
📌 यदि राज्य केंद्र के निर्देशों का पालन नहीं करता, तो राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है।
यह प्रावधान संघीय संतुलन को प्रभावित करता है।
🔹 3. अखिल भारतीय सेवाएँ (All India Services)
IAS, IPS जैसी सेवाएँ केंद्र और राज्य दोनों के अधीन कार्य करती हैं।
📍 ये अधिकारी राज्यों में नियुक्त होते हैं, लेकिन उनकी नियुक्ति और नियंत्रण केंद्र के पास होता है।
यह व्यवस्था प्रशासनिक एकरूपता बनाए रखने में सहायक है।
🔸 4. अंतर-राज्य परिषद और सहयोग
संविधान में अंतर-राज्य परिषद की व्यवस्था की गई है, जिससे राज्यों और केंद्र के बीच संवाद और सहयोग बढ़ाया जा सके।
यह सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बढ़ावा देता है।
वित्तीय संबंध (Financial Relations)
🔹 1. कराधान शक्तियों का विभाजन
संविधान ने करों को भी केंद्र और राज्यों के बीच बाँटा है।
📍 कुछ कर केवल केंद्र द्वारा लगाए जाते हैं, जैसे आयकर, सीमा शुल्क।
📍 कुछ कर केवल राज्य द्वारा लगाए जाते हैं, जैसे भूमि कर, राज्य उत्पाद शुल्क।
🔸 2. वित्त आयोग की भूमिका
हर पाँच वर्ष में वित्त आयोग का गठन किया जाता है।
📌 यह आयोग केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व के बंटवारे की सिफारिश करता है।
इससे वित्तीय संतुलन बनाए रखने में सहायता मिलती है।
🔹 3. अनुदान और सहायता (Grants-in-Aid)
केंद्र सरकार राज्यों को विभिन्न योजनाओं और विकास कार्यों के लिए अनुदान देती है।
📍 इससे पिछड़े राज्यों को आर्थिक सहायता मिलती है।
📍 लेकिन इससे राज्यों की वित्तीय निर्भरता भी बढ़ती है।
🔸 4. GST व्यवस्था
वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू होने के बाद कराधान प्रणाली में बड़ा परिवर्तन आया।
📌 GST परिषद में केंद्र और राज्यों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
📌 यह सहकारी संघवाद का एक उदाहरण है।
आलोचनात्मक समीक्षा
🔹 1. केंद्र की प्रधानता
भारत की संघीय व्यवस्था में केंद्र को अधिक शक्तियाँ दी गई हैं, विशेषकर अवशिष्ट शक्तियाँ और आपातकालीन प्रावधान।
🔸 2. वित्तीय निर्भरता
राज्य सरकारें अपने राजस्व के लिए काफी हद तक केंद्र पर निर्भर रहती हैं।
🔹 3. राष्ट्रपति शासन का दुरुपयोग
अतीत में कई बार राजनीतिक कारणों से राष्ट्रपति शासन लागू किया गया, जिससे संघीय भावना को आघात पहुँचा।
समग्र मूल्यांकन
भारतीय संघीय ढांचा एक संतुलित और व्यावहारिक व्यवस्था है।
📍 विधायी संबंध स्पष्ट और संरचित हैं।
📍 प्रशासनिक संबंध सहयोग और नियंत्रण दोनों का मिश्रण हैं।
📍 वित्तीय संबंध संसाधनों के संतुलित वितरण की दिशा में कार्य करते हैं।
हालाँकि केंद्र की प्रधानता स्पष्ट है, फिर भी सहकारी संघवाद की भावना लगातार मजबूत हो रही है।
🔹 निष्कर्ष — संतुलन और सहयोग की आवश्यकता
केंद्र और राज्यों के बीच विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय संबंध भारतीय संघीय ढांचे की रीढ़ हैं।
इन संबंधों का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता बनाए रखते हुए राज्यों को पर्याप्त स्वायत्तता देना है।
यदि केंद्र और राज्य सहयोग और समन्वय की भावना से कार्य करें, तो संघीय व्यवस्था अधिक प्रभावी और लोकतांत्रिक बन सकती है।
अतः कहा जा सकता है कि भारतीय संघवाद एक गतिशील प्रणाली है, जो संतुलन, सहयोग और संवैधानिक मर्यादा पर आधारित है।
प्रश्न 05. राज्य के नीति निदेशक तत्वों के उद्देश्य और प्रासंगिकता का मूल्यांकन कीजिए।
🔹 परिचय — कल्याणकारी राज्य की दिशा
भारतीय संविधान केवल शासन चलाने का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक आदर्श समाज की स्थापना का मार्गदर्शक भी है। इसी उद्देश्य से संविधान के भाग IV में राज्य के नीति निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy) का उल्लेख किया गया है। ये ऐसे सिद्धांत हैं जो सरकार को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय स्थापित करने की दिशा में मार्गदर्शन देते हैं।
यद्यपि ये तत्व न्यायालय द्वारा लागू नहीं कराए जा सकते, फिर भी ये शासन के मूल आधार हैं। इनका मुख्य उद्देश्य भारत को एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) के रूप में विकसित करना है।
अब हम इनके उद्देश्य और वर्तमान प्रासंगिकता का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
राज्य के नीति निदेशक तत्वों का उद्देश्य
🔸 1. सामाजिक और आर्थिक न्याय की स्थापना
नीति निदेशक तत्वों का प्रमुख उद्देश्य समाज में समानता और न्याय स्थापित करना है।
📍 धन और संसाधनों का समान वितरण
📍 निर्धनों और कमजोर वर्गों की सुरक्षा
📍 शोषण का अंत
ये तत्व सामाजिक असमानताओं को समाप्त करने की दिशा में कार्य करते हैं।
🔹 2. कल्याणकारी राज्य की स्थापना
संविधान निर्माताओं का लक्ष्य था कि भारत केवल राजनीतिक लोकतंत्र न रहे, बल्कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र भी स्थापित हो।
📌 राज्य को ऐसी नीतियाँ बनानी चाहिए जो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करें।
🔸 3. ग्रामीण विकास और पंचायती राज को प्रोत्साहन
नीति निदेशक तत्वों में ग्राम पंचायतों के संगठन और सशक्तिकरण का उल्लेख किया गया है।
📍 ग्रामीण क्षेत्रों का विकास
📍 स्थानीय स्वशासन को बढ़ावा
यह उद्देश्य लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक पहुँचाने का प्रयास है।
🔹 4. समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code)
नीति निदेशक तत्वों में राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करने का निर्देश दिया गया है।
📌 इसका उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए समान कानून सुनिश्चित करना है।
🔸 5. शिक्षा और बाल संरक्षण
राज्य को बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया।
📍 बाल श्रम का उन्मूलन
📍 बच्चों के समुचित विकास की व्यवस्था
बाद में शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया, जो नीति निदेशक तत्वों की ही प्रेरणा थी।
🔹 6. पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य
राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधारने के लिए नीतियाँ बनाने का निर्देश दिया गया है।
📌 स्वच्छ पर्यावरण
📌 पोषण और स्वास्थ्य सुविधाएँ
ये तत्व आज के समय में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
नीति निदेशक तत्वों की प्रासंगिकता
🔸 1. सामाजिक परिवर्तन का माध्यम
नीति निदेशक तत्व सामाजिक सुधार और परिवर्तन का आधार हैं।
📍 भूमि सुधार कानून
📍 शिक्षा और स्वास्थ्य योजनाएँ
📍 गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम
इन सभी का आधार नीति निदेशक तत्व ही रहे हैं।
🔹 2. न्यायपालिका द्वारा व्याख्या में उपयोग
हालाँकि ये तत्व न्यायालय में लागू नहीं किए जा सकते, फिर भी सर्वोच्च न्यायालय ने कई मामलों में इन्हें मौलिक अधिकारों के साथ जोड़कर व्याख्या की है।
📌 न्यायालय ने कहा कि मौलिक अधिकार और नीति निदेशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं।
🔸 3. कल्याणकारी योजनाओं का आधार
सरकार की अनेक योजनाएँ—जैसे रोजगार गारंटी, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा अधिकार—इन्हीं तत्वों से प्रेरित हैं।
📍 समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
🔹 4. लोकतंत्र की गहराई
नीति निदेशक तत्व लोकतंत्र को केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं रखते, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय की दिशा में भी आगे बढ़ाते हैं।
आलोचनात्मक मूल्यांकन
🔸 1. न्यायालय द्वारा लागू न होना
इन तत्वों की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि इन्हें न्यायालय में लागू नहीं कराया जा सकता।
📍 इससे इनकी प्रभावशीलता सीमित हो जाती है।
🔹 2. अस्पष्ट और आदर्शवादी स्वरूप
कुछ विद्वानों का मत है कि ये तत्व केवल आदर्श हैं, जिनकी पूर्ति पूरी तरह संभव नहीं है।
🔸 3. संसाधनों की कमी
नीति निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है, जो हमेशा उपलब्ध नहीं होते।
मौलिक अधिकार और नीति निदेशक तत्वों का संबंध
🔹 मौलिक अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।
🔸 नीति निदेशक तत्व समाज के सामूहिक कल्याण की दिशा में कार्य करते हैं।
दोनों मिलकर संविधान के उद्देश्यों को पूर्ण करते हैं।
समग्र मूल्यांकन
राज्य के नीति निदेशक तत्व भारतीय संविधान की आत्मा का महत्वपूर्ण भाग हैं।
📍 ये शासन को दिशा और उद्देश्य प्रदान करते हैं।
📍 सामाजिक और आर्थिक न्याय को बढ़ावा देते हैं।
📍 कल्याणकारी राज्य की स्थापना में सहायक हैं।
हालाँकि ये न्यायालय द्वारा लागू नहीं किए जा सकते, फिर भी सरकार की नीतियों और कानूनों में इनका व्यापक प्रभाव दिखाई देता है।
🔹 निष्कर्ष — आदर्श से वास्तविकता की ओर
राज्य के नीति निदेशक तत्व भारत को एक न्यायपूर्ण, समतामूलक और कल्याणकारी राष्ट्र बनाने की दिशा में मार्गदर्शन करते हैं।
इनकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है जितनी संविधान लागू होने के समय थी।
यदि सरकार और नागरिक मिलकर इन सिद्धांतों को व्यवहार में उतारें, तो भारत एक सच्चे अर्थों में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र बन सकता है।
प्रश्न 06. प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की विभिन्न शक्तियाँ एवं कार्य क्या हैं? इन दोनों के बीच क्या अंतर है?
🔹 परिचय — संसदीय शासन प्रणाली का मूल आधार
भारत में संसदीय शासन प्रणाली लागू है। इस व्यवस्था में राष्ट्रपति राष्ट्र का संवैधानिक प्रमुख (Constitutional Head) होता है, जबकि प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यपालिका का प्रमुख (Real Executive) होता है। संविधान के अनुसार सभी कार्य राष्ट्रपति के नाम से होते हैं, परंतु वास्तविक निर्णय प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद द्वारा लिए जाते हैं।
इस प्रकार राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों महत्वपूर्ण पद हैं, परंतु उनकी शक्तियों और कार्यों की प्रकृति अलग-अलग है। अब हम दोनों के अधिकारों और कार्यों का विस्तार से अध्ययन करेंगे तथा उनके मध्य अंतर स्पष्ट करेंगे।
राष्ट्रपति की शक्तियाँ एवं कार्य
🔸 1. कार्यपालिका संबंधी शक्तियाँ
राष्ट्रपति भारत के कार्यपालिका का औपचारिक प्रमुख है।
📍 प्रधानमंत्री और मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
📍 राज्यपालों, न्यायाधीशों, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, निर्वाचन आयुक्त आदि की नियुक्ति करता है।
📍 सशस्त्र बलों का सर्वोच्च कमांडर होता है।
हालाँकि ये कार्य प्रधानमंत्री की सलाह पर किए जाते हैं।
🔹 2. विधायी शक्तियाँ
राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग है।
📌 संसद के सत्र बुलाना और स्थगित करना।
📌 लोकसभा को भंग करना।
📌 संसद द्वारा पारित विधेयकों को स्वीकृति देना।
📌 अध्यादेश जारी करना (जब संसद सत्र में न हो)।
बिना राष्ट्रपति की स्वीकृति के कोई भी विधेयक कानून नहीं बन सकता।
🔸 3. वित्तीय शक्तियाँ
📍 वार्षिक बजट राष्ट्रपति की अनुमति से ही संसद में प्रस्तुत होता है।
📍 धन विधेयक (Money Bill) राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति से ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
🔹 4. न्यायिक शक्तियाँ
राष्ट्रपति को क्षमादान (Pardon), दंड स्थगन या दंड में कमी करने का अधिकार है।
यह शक्ति विशेष रूप से मृत्युदंड के मामलों में महत्वपूर्ण होती है।
🔸 5. आपातकालीन शक्तियाँ
राष्ट्रपति को तीन प्रकार के आपातकाल घोषित करने का अधिकार है:
राष्ट्रीय आपातकाल
राज्य आपातकाल
वित्तीय आपातकाल
इन परिस्थितियों में राष्ट्रपति की शक्तियाँ बढ़ जाती हैं।
प्रधानमंत्री की शक्तियाँ एवं कार्य
🔹 1. वास्तविक कार्यपालिका प्रमुख
प्रधानमंत्री सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है।
📍 मंत्रिपरिषद का गठन और नेतृत्व करता है।
📍 मंत्रियों के विभागों का निर्धारण करता है।
📍 मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता करता है।
🔸 2. राष्ट्रपति का मुख्य सलाहकार
प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को सलाह देता है।
📌 राष्ट्रपति सामान्यतः प्रधानमंत्री की सलाह के अनुसार कार्य करता है।
🔹 3. संसद में नेतृत्व
प्रधानमंत्री लोकसभा में बहुमत दल का नेता होता है।
📍 सरकार की नीतियाँ संसद में प्रस्तुत करता है।
📍 संसद के प्रति उत्तरदायी होता है।
🔸 4. नीति निर्माण और प्रशासनिक नियंत्रण
प्रधानमंत्री देश की नीतियों का निर्धारण करता है।
📌 विदेश नीति, रक्षा नीति और आर्थिक नीति में उसकी प्रमुख भूमिका होती है।
📌 सभी मंत्रालयों के कार्यों पर निगरानी रखता है।
🔹 5. राष्ट्रीय नेतृत्व और प्रतिनिधित्व
प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करता है।
📍 देश की जनता और सरकार के बीच सेतु का कार्य करता है।
राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के मध्य अंतर
🔸 1. पद की प्रकृति
राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख है।
प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यपालिका प्रमुख है।
🔹 2. शक्तियों का प्रयोग
राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है।
प्रधानमंत्री वास्तविक निर्णय लेने वाला होता है।
🔸 3. उत्तरदायित्व
राष्ट्रपति संसद के प्रति प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी नहीं होता।
प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होते हैं।
🔹 4. नियुक्ति और पद की अवधि
राष्ट्रपति का चुनाव निर्वाचन मंडल द्वारा 5 वर्षों के लिए होता है।
प्रधानमंत्री का पद लोकसभा में बहुमत पर निर्भर करता है।
🔸 5. पद की भूमिका
राष्ट्रपति औपचारिक और प्रतीकात्मक भूमिका निभाता है।
प्रधानमंत्री प्रशासनिक और नीतिगत भूमिका निभाता है।
समग्र मूल्यांकन
भारतीय संसदीय व्यवस्था में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों का महत्व है।
📍 राष्ट्रपति संविधान की गरिमा और स्थिरता का प्रतीक है।
📍 प्रधानमंत्री शासन की सक्रिय शक्ति और नेतृत्व का केंद्र है।
दोनों के बीच संतुलन लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक है।
🔹 निष्कर्ष — संवैधानिक संतुलन की व्यवस्था
भारतीय शासन प्रणाली में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की भूमिकाएँ अलग होते हुए भी एक-दूसरे की पूरक हैं।
राष्ट्रपति संविधान की मर्यादा और औपचारिकता का प्रतीक है, जबकि प्रधानमंत्री वास्तविक शासन का संचालन करता है।
अतः कहा जा सकता है कि इन दोनों पदों के बीच स्पष्ट अंतर होते हुए भी उनका समन्वय भारतीय लोकतंत्र की मजबूती और स्थिरता का आधार है। 🔹📌
प्रश्न 07. "राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच अक्सर टकराव होता है" ऐसा क्यों कहा जाता है? समझाइए।
🔹 परिचय — संघीय ढांचे में दो प्रमुख पदों की भूमिका
भारतीय संघीय व्यवस्था में राज्य स्तर पर दो महत्वपूर्ण पद होते हैं—राज्यपाल और मुख्यमंत्री। राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख (Constitutional Head) होता है, जबकि मुख्यमंत्री वास्तविक कार्यपालिका का प्रमुख (Real Executive) होता है। संविधान के अनुसार राज्यपाल को अपने अधिकांश कार्य मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर करने होते हैं।
फिर भी व्यवहारिक राजनीति में कई बार राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच टकराव देखने को मिलता है। यह टकराव राजनीतिक, संवैधानिक और प्रशासनिक कारणों से उत्पन्न होता है। अब हम इन कारणों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
राज्यपाल और मुख्यमंत्री की संवैधानिक स्थिति
🔸 1. राज्यपाल की स्थिति
राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। वह राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है।
📍 मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है।
📍 राज्य विधानसभा का सत्र बुलाता और स्थगित करता है।
📍 विधेयकों को स्वीकृति देता है या राष्ट्रपति के पास भेज सकता है।
📍 विशेष परिस्थितियों में विवेकाधिकार (Discretionary Powers) का प्रयोग कर सकता है।
🔹 2. मुख्यमंत्री की स्थिति
मुख्यमंत्री राज्य की वास्तविक कार्यपालिका का प्रमुख होता है।
📌 वह विधानसभा में बहुमत दल का नेता होता है।
📌 मंत्रिपरिषद का गठन और नेतृत्व करता है।
📌 राज्य की नीतियों और प्रशासन का संचालन करता है।
मुख्यमंत्री विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होता है।
टकराव के प्रमुख कारण
🔸 1. राजनीतिक दलों में भिन्नता
अक्सर ऐसा होता है कि राज्यपाल केंद्र सरकार की सिफारिश पर नियुक्त होता है और वह केंद्र में सत्तारूढ़ दल से जुड़ा होता है, जबकि राज्य में कोई अन्य दल सत्ता में होता है।
📍 इससे राजनीतिक मतभेद उत्पन्न होते हैं।
📍 राज्यपाल पर पक्षपात का आरोप लगाया जाता है।
🔹 2. विवेकाधिकार शक्तियों का प्रयोग
राज्यपाल को कुछ मामलों में विवेकाधिकार प्राप्त है, जैसे—
📌 मुख्यमंत्री की नियुक्ति (जब स्पष्ट बहुमत न हो)।
📌 विधानसभा भंग करने की सिफारिश।
📌 राष्ट्रपति शासन की रिपोर्ट भेजना।
इन शक्तियों के प्रयोग में यदि निष्पक्षता न दिखाई दे, तो विवाद उत्पन्न हो सकता है।
🔸 3. विधेयकों को लंबित रखना
राज्यपाल किसी विधेयक को स्वीकृति देने में विलंब कर सकता है या उसे राष्ट्रपति के पास भेज सकता है।
📍 इससे राज्य सरकार की नीतियों के क्रियान्वयन में बाधा आती है।
📍 मुख्यमंत्री इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप मान सकता है।
🔹 4. राष्ट्रपति शासन की सिफारिश
यदि राज्यपाल यह रिपोर्ट देता है कि राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है, तो राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है।
📌 अतीत में कई बार इस प्रावधान का राजनीतिक कारणों से उपयोग किया गया।
📌 इससे संघीय भावना को ठेस पहुँची।
🔸 5. प्रशासनिक हस्तक्षेप
कुछ मामलों में राज्यपाल विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में नियुक्तियाँ करते हैं या प्रशासनिक मामलों में हस्तक्षेप करते हैं।
📍 मुख्यमंत्री इसे राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप मानते हैं।
न्यायपालिका की भूमिका
🔹 सर्वोच्च न्यायालय ने कई मामलों में स्पष्ट किया है कि राज्यपाल को संविधान की मर्यादा में रहकर कार्य करना चाहिए।
🔸 न्यायालय ने यह भी कहा है कि राज्यपाल का पद राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक है।
इससे राज्यपाल की भूमिका पर कुछ हद तक नियंत्रण स्थापित हुआ है।
आलोचनात्मक विश्लेषण
🔹 1. संवैधानिक अस्पष्टता
राज्यपाल की विवेकाधिकार शक्तियों की स्पष्ट सीमा निर्धारित नहीं है, जिससे विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है।
🔸 2. संघीय संतुलन का प्रश्न
राज्यपाल केंद्र और राज्य के बीच सेतु का कार्य करता है, लेकिन यदि वह केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करे, तो संघीय संतुलन प्रभावित होता है।
🔹 3. राजनीतिक संस्कृति
भारतीय राजनीति में दलगत हितों को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति भी टकराव का कारण बनती है।
समग्र मूल्यांकन
राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच टकराव का मुख्य कारण संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या और राजनीतिक परिस्थितियाँ हैं।
📍 यदि राज्यपाल निष्पक्ष और संविधान के अनुरूप कार्य करे, तो टकराव की संभावना कम हो जाती है।
📍 सहकारी संघवाद की भावना से कार्य करने पर संबंध बेहतर हो सकते हैं।
🔹 निष्कर्ष — संवैधानिक मर्यादा और सहयोग की आवश्यकता
राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों राज्य शासन के महत्वपूर्ण अंग हैं।
राज्यपाल का दायित्व है कि वह संविधान की मर्यादा का पालन करे और निष्पक्ष रहे, जबकि मुख्यमंत्री को भी संवैधानिक सीमाओं का सम्मान करना चाहिए।
टकराव की स्थिति तभी उत्पन्न होती है जब राजनीतिक हित संवैधानिक मर्यादाओं पर हावी हो जाते हैं।
अतः कहा जा सकता है कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच समन्वय, संवाद और संविधान के प्रति निष्ठा ही राज्य की सुचारु और प्रभावी शासन व्यवस्था सुनिश्चित कर सकती है।
प्रश्न 08. भारतीय संसद के संगठन व शक्तियों की विवेचना कीजिए।
🔹 परिचय — लोकतंत्र का सर्वोच्च विधायी मंच
भारतीय लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च विधायी संस्था है। यह जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है और देश की नीतियों, कानूनों तथा शासन की दिशा तय करती है। संविधान के अनुसार संघ की विधायी शक्ति संसद में निहित है।
भारतीय संसद केवल कानून बनाने वाली संस्था नहीं है, बल्कि यह कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है, वित्तीय मामलों की देखरेख करती है और राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार-विमर्श का मंच प्रदान करती है।
अब हम संसद के संगठन (संरचना) और उसकी शक्तियों का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
भारतीय संसद का संगठन
🔸 1. संसद की संरचना
संविधान के अनुसार संसद तीन अंगों से मिलकर बनी है:
📍 राष्ट्रपति
📍 लोकसभा (निम्न सदन)
📍 राज्यसभा (उच्च सदन)
राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग है, क्योंकि उसके बिना कोई विधेयक कानून नहीं बन सकता।
🔹 2. लोकसभा (House of the People)
लोकसभा जनता का प्रतिनिधित्व करती है।
📌 इसके सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं।
📌 इसका कार्यकाल सामान्यतः 5 वर्ष होता है।
📌 अधिकतम सदस्य संख्या 552 निर्धारित की गई है (वर्तमान में 543 निर्वाचित सदस्य)।
लोकसभा को अधिक शक्तिशाली सदन माना जाता है, विशेषकर वित्तीय मामलों में।
🔸 3. राज्यसभा (Council of States)
राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है।
📍 इसके सदस्य राज्य विधानसभाओं द्वारा चुने जाते हैं।
📍 यह स्थायी सदन है, जो कभी भंग नहीं होता।
📍 प्रत्येक 2 वर्ष में इसके 1/3 सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं।
राज्यसभा संघीय ढांचे को सुदृढ़ करती है।
भारतीय संसद की शक्तियाँ
1. विधायी शक्तियाँ
🔹 संसद को संघ सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है।
📌 साधारण विधेयक (Ordinary Bill)
📌 धन विधेयक (Money Bill)
📌 संविधान संशोधन विधेयक
यदि दोनों सदनों में मतभेद हो, तो संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है।
संविधान संशोधन के माध्यम से संसद संविधान में परिवर्तन कर सकती है, जिससे उसकी विधायी शक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
2. कार्यपालिका पर नियंत्रण
🔸 संसद मंत्रिपरिषद को उत्तरदायी बनाती है।
📍 प्रश्नकाल (Question Hour)
📍 शून्यकाल (Zero Hour)
📍 अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion)
इन साधनों के माध्यम से संसद सरकार से जवाब मांगती है।
यदि लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाए, तो सरकार को इस्तीफा देना पड़ता है।
3. वित्तीय शक्तियाँ
🔹 संसद को देश के वित्त पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त है।
📌 वार्षिक बजट संसद में प्रस्तुत होता है।
📌 कोई भी कर संसद की स्वीकृति के बिना नहीं लगाया जा सकता।
📌 धन विधेयक केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है।
इस प्रकार वित्तीय मामलों में लोकसभा की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
4. संविधान संशोधन की शक्ति
🔸 संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार है।
📍 कुछ संशोधन साधारण बहुमत से।
📍 कुछ विशेष बहुमत से।
📍 कुछ मामलों में राज्यों की स्वीकृति आवश्यक होती है।
यह शक्ति संसद को अत्यंत प्रभावशाली बनाती है।
5. न्यायिक शक्तियाँ
🔹 संसद राष्ट्रपति के महाभियोग की प्रक्रिया आरंभ कर सकती है।
🔹 सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया भी संसद के माध्यम से होती है।
इससे संसद को एक प्रकार की न्यायिक भूमिका भी प्राप्त होती है।
6. निर्वाचन संबंधी शक्तियाँ
🔸 संसद राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेती है।
📍 लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचन मंडल का हिस्सा होते हैं।
7. आपातकालीन शक्तियाँ
🔹 संसद आपातकाल की घोषणा को स्वीकृति देती है।
📌 आपातकाल के दौरान संसद की शक्तियाँ और बढ़ जाती हैं।
📌 संसद राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है।
संसद की सीमाएँ
🔸 संसद की शक्तियाँ व्यापक हैं, परंतु असीमित नहीं।
📍 संविधान सर्वोच्च है।
📍 न्यायपालिका न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के माध्यम से संसद के कानूनों की समीक्षा कर सकती है।
इस प्रकार संसद संविधान की मर्यादा में रहकर कार्य करती है।
समग्र मूल्यांकन
भारतीय संसद लोकतंत्र का केंद्रीय स्तंभ है।
📍 यह जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है।
📍 कानून निर्माण और नीति निर्धारण करती है।
📍 कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है।
📍 वित्तीय और संवैधानिक मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
हालाँकि कभी-कभी राजनीतिक गतिरोध और हंगामे के कारण कार्यक्षमता प्रभावित होती है, फिर भी संसद भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है।
🔹 निष्कर्ष — लोकतांत्रिक शासन की धुरी
भारतीय संसद का संगठन संघीय और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। लोकसभा और राज्यसभा मिलकर कानून निर्माण की प्रक्रिया को पूर्ण करते हैं, जबकि राष्ट्रपति की स्वीकृति इसे वैधता प्रदान करती है।
संसद की विधायी, वित्तीय, कार्यपालिका पर नियंत्रण तथा संविधान संशोधन संबंधी शक्तियाँ इसे अत्यंत प्रभावशाली बनाती हैं।
अतः कहा जा सकता है कि भारतीय संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं, बल्कि लोकतंत्र की धुरी है, जो राष्ट्र के शासन और विकास को दिशा प्रदान करती है।
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