प्रश्न 01. राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन के लिए मार्क्सवादी दृष्टिकोण का विश्लेषण करें। इसके मुख्य विशेषताएँ और आलोचनाएँ क्या हैं?
🔰 भूमिका (Introduction)
राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन में विभिन्न विचारधारात्मक दृष्टिकोणों का विशेष महत्व रहा है। इन्हीं में से एक अत्यंत प्रभावशाली और विवादास्पद दृष्टिकोण मार्क्सवादी दृष्टिकोण है। यह दृष्टिकोण राजनीति को केवल सत्ता, सरकार या संविधान तक सीमित नहीं मानता, बल्कि उसे समाज की आर्थिक संरचना, वर्ग संघर्ष और उत्पादन संबंधों से जोड़कर देखता है। कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा प्रतिपादित यह दृष्टिकोण राजनीतिक घटनाओं की व्याख्या भौतिक परिस्थितियों के आधार पर करता है। राजनीतिक विज्ञान में मार्क्सवादी दृष्टिकोण ने राज्य, सत्ता, वर्ग, विचारधारा और परिवर्तन की एक नई व्याख्या प्रस्तुत की।
🧠 मार्क्सवादी दृष्टिकोण की दार्शनिक पृष्ठभूमि
मार्क्सवादी दृष्टिकोण का आधार ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism) है। इसके अनुसार समाज का विकास विचारों से नहीं, बल्कि भौतिक परिस्थितियों से होता है।
▪ ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा
मार्क्स के अनुसार समाज की आर्थिक संरचना (Base) ही राजनीतिक, कानूनी और वैचारिक संरचना (Superstructure) को निर्धारित करती है।
“मनुष्य का चेतन उसके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करता, बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व उसके चेतन को निर्धारित करता है।”
▪ द्वंद्वात्मक भौतिकवाद
समाज में परिवर्तन संघर्ष (Dialectics) के माध्यम से होता है। हर सामाजिक व्यवस्था अपने भीतर विरोधाभास समेटे होती है, जो अंततः परिवर्तन का कारण बनते हैं।
🏛️ राजनीति की मार्क्सवादी अवधारणा
मार्क्सवादी दृष्टिकोण में राजनीति को वर्ग संघर्ष का प्रतिबिंब माना गया है।
▪ राज्य की भूमिका
मार्क्स के अनुसार राज्य एक वर्गीय संस्था है, जो शासक वर्ग (पूंजीपति वर्ग) के हितों की रक्षा करता है।
राज्य तटस्थ नहीं होता, बल्कि यह आर्थिक रूप से शक्तिशाली वर्ग का उपकरण होता है।
▪ सत्ता और वर्ग
राजनीतिक सत्ता उसी वर्ग के हाथ में रहती है, जिसके पास आर्थिक साधन होते हैं। इसलिए राजनीति का वास्तविक आधार आर्थिक शक्ति है।
⚙️ वर्ग संघर्ष की अवधारणा
मार्क्सवादी राजनीतिक सिद्धांत का केंद्र बिंदु वर्ग संघर्ष है।
▪ वर्गों का निर्माण
समाज मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित होता है—
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शासक वर्ग (पूंजीपति)
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शोषित वर्ग (मजदूर / सर्वहारा)
▪ राजनीति और वर्ग संघर्ष
राजनीति इन वर्गों के बीच चलने वाले संघर्ष का मंच है। कानून, नीतियाँ और प्रशासनिक निर्णय शासक वर्ग के पक्ष में होते हैं।
🌍 राजनीतिक विज्ञान में मार्क्सवादी दृष्टिकोण का महत्व
मार्क्सवादी दृष्टिकोण ने राजनीतिक विज्ञान को एक नई दिशा प्रदान की।
▪ आर्थिक कारकों पर बल
इस दृष्टिकोण ने यह स्पष्ट किया कि राजनीतिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं को समझने के लिए आर्थिक संरचना का अध्ययन आवश्यक है।
▪ शक्ति और शोषण का विश्लेषण
इसने सत्ता के पीछे छिपे शोषणकारी संबंधों को उजागर किया।
▪ परिवर्तन और क्रांति की व्याख्या
मार्क्सवाद ने राजनीतिक परिवर्तन को आकस्मिक न मानकर उसे ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम बताया।
⭐ मार्क्सवादी दृष्टिकोण की मुख्य विशेषताएँ
मार्क्सवादी दृष्टिकोण की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
✔️ 1. आर्थिक निर्धारणवाद
राजनीति, कानून और संस्कृति को अर्थव्यवस्था से निर्धारित माना गया।
✔️ 2. वर्ग आधारित विश्लेषण
समाज और राजनीति का विश्लेषण वर्गों के आधार पर किया गया।
✔️ 3. राज्य की वर्गीय प्रकृति
राज्य को तटस्थ न मानकर शासक वर्ग का उपकरण माना गया।
✔️ 4. क्रांति की अवधारणा
राजनीतिक परिवर्तन सुधारों से नहीं, बल्कि क्रांति से संभव है।
✔️ 5. वैज्ञानिक दृष्टिकोण
मार्क्सवाद स्वयं को वैज्ञानिक समाजवाद के रूप में प्रस्तुत करता है।
⚖️ मार्क्सवादी दृष्टिकोण की आलोचनाएँ
यद्यपि मार्क्सवादी दृष्टिकोण प्रभावशाली रहा है, फिर भी इसकी कई आलोचनाएँ की गई हैं।
❌ 1. आर्थिक निर्धारणवाद की अति
आलोचकों का कहना है कि मार्क्सवाद राजनीति और संस्कृति की स्वतंत्र भूमिका को कम आँकता है और हर चीज को अर्थव्यवस्था से जोड़ देता है।
❌ 2. राज्य की सीमित व्याख्या
आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में राज्य केवल पूंजीपतियों का उपकरण नहीं रह गया है, बल्कि वह कल्याणकारी भूमिका भी निभाता है।
❌ 3. वर्ग संघर्ष की सार्वभौमिकता पर प्रश्न
हर समाज में वर्ग संघर्ष ही राजनीति का आधार हो, यह आवश्यक नहीं। जाति, धर्म और पहचान आधारित राजनीति भी महत्वपूर्ण है।
❌ 4. क्रांति की भविष्यवाणी असफल
मार्क्स ने जिन औद्योगिक देशों में क्रांति की भविष्यवाणी की थी, वहाँ क्रांति नहीं हुई, जबकि रूस जैसे पिछड़े देश में हुई।
❌ 5. व्यक्तिगत स्वतंत्रता की उपेक्षा
मार्क्सवादी शासन प्रणालियों में अक्सर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन देखा गया।
🔍 आधुनिक संदर्भ में मार्क्सवादी दृष्टिकोण
आज के वैश्वीकरण और नव-उदारवादी युग में भी मार्क्सवादी विश्लेषण की प्रासंगिकता बनी हुई है।
▪ असमानता और पूंजीवाद की आलोचना
आर्थिक असमानता, कॉर्पोरेट प्रभुत्व और श्रमिक शोषण की व्याख्या में मार्क्सवाद आज भी उपयोगी है।
▪ नव-मार्क्सवादी विचार
ग्राम्शी, अल्थूसर और फ्रैंकफर्ट स्कूल ने मार्क्सवाद को सांस्कृतिक और वैचारिक स्तर पर विस्तार दिया।
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन में मार्क्सवादी दृष्टिकोण ने एक क्रांतिकारी परिवर्तन प्रस्तुत किया। इसने राजनीति को आर्थिक संरचना और वर्ग संघर्ष से जोड़कर देखा तथा सत्ता के वास्तविक स्वरूप को उजागर किया। यद्यपि इसकी कुछ सीमाएँ और आलोचनाएँ हैं, फिर भी असमानता, शोषण और सत्ता संबंधों के विश्लेषण में इसकी उपयोगिता आज भी बनी हुई है। अतः मार्क्सवादी दृष्टिकोण राजनीतिक विज्ञान का एक अनिवार्य और प्रभावशाली अध्ययन क्षेत्र है।
प्रश्न 02. राज्य की उत्पत्ति के दैवीय सिद्धांत का मूल्यांकन करें। सामाजिक अनुबंध सिद्धांत से तुलना करें।
🔰 भूमिका (Introduction)
राज्य की उत्पत्ति राजनीतिक दर्शन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। यह प्रश्न कि राज्य कैसे और क्यों अस्तित्व में आया, राजनीतिक चिंतन की आधारशिला माना जाता है। विभिन्न राजनीतिक विचारकों ने राज्य की उत्पत्ति को समझाने के लिए अलग–अलग सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। इनमें दैवीय सिद्धांत (Divine Theory) और सामाजिक अनुबंध सिद्धांत (Social Contract Theory) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
जहाँ दैवीय सिद्धांत राज्य को ईश्वर की देन मानता है, वहीं सामाजिक अनुबंध सिद्धांत राज्य को मनुष्य की बुद्धि, समझौते और आवश्यकता का परिणाम मानता है। प्रस्तुत उत्तर में दैवीय सिद्धांत का मूल्यांकन किया गया है तथा उसकी सामाजिक अनुबंध सिद्धांत से विस्तृत तुलना की गई है।
🛐 राज्य की उत्पत्ति का दैवीय सिद्धांत
दैवीय सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति का सबसे प्राचीन और परंपरागत सिद्धांत माना जाता है।
▪ दैवीय सिद्धांत का अर्थ
इस सिद्धांत के अनुसार राज्य और शासक दोनों की उत्पत्ति ईश्वर की इच्छा से हुई है। राजा ईश्वर का प्रतिनिधि होता है और उसकी सत्ता को चुनौती देना ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध माना जाता है।
▪ “राजा ईश्वर का प्रतिनिधि”
इस सिद्धांत का मूल मंत्र यह है कि—
“राजा ईश्वर द्वारा नियुक्त होता है और उसकी सत्ता दैवीय होती है।”
📜 दैवीय सिद्धांत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
दैवीय सिद्धांत का विकास प्राचीन और मध्यकालीन समाजों में हुआ।
▪ प्राचीन सभ्यताओं में
मिस्र, बेबीलोन और चीन जैसी सभ्यताओं में राजा को देवता या देवता का पुत्र माना जाता था।
▪ मध्यकालीन यूरोप में
यूरोप में चर्च और राजा के गठबंधन ने इस सिद्धांत को अत्यधिक मजबूत बनाया।
जेम्स प्रथम (इंग्लैंड) इस सिद्धांत का प्रमुख समर्थक था।
👑 दैवीय सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएँ
दैवीय सिद्धांत की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
✔️ 1. ईश्वर प्रदत्त राज्य
राज्य की उत्पत्ति मानव प्रयास से नहीं, बल्कि ईश्वर की इच्छा से मानी जाती है।
✔️ 2. राजा की निरंकुश सत्ता
राजा की सत्ता सर्वोच्च और अपराजेय होती है।
✔️ 3. आज्ञापालन का सिद्धांत
प्रजा का कर्तव्य है कि वह राजा की आज्ञा का पालन करे।
✔️ 4. विद्रोह का निषेध
राजा के विरुद्ध विद्रोह को पाप माना जाता है।
⚖️ दैवीय सिद्धांत का मूल्यांकन (Evaluation)
दैवीय सिद्धांत लंबे समय तक प्रभावशाली रहा, किंतु आधुनिक युग में इसकी कई सीमाएँ स्पष्ट हो गई हैं।
🌟 दैवीय सिद्धांत की उपयोगिता
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इस सिद्धांत ने राजनीतिक स्थिरता प्रदान की
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समाज में अनुशासन और एकता बनाए रखने में सहायक रहा
-
मध्यकालीन परिस्थितियों में शासन को वैधता प्रदान की
❌ दैवीय सिद्धांत की आलोचनाएँ
दैवीय सिद्धांत की प्रमुख आलोचनाएँ इस प्रकार हैं—
▪ वैज्ञानिक आधार का अभाव
इस सिद्धांत का कोई तार्किक या ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
▪ निरंकुशता को बढ़ावा
इसने राजा को निरंकुश बना दिया और जनहित की उपेक्षा की।
▪ लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध
जनसहमति, अधिकार और स्वतंत्रता की कोई भूमिका नहीं।
▪ आधुनिक राज्य की व्याख्या में असमर्थ
संवैधानिक और लोकतांत्रिक राज्यों को यह सिद्धांत नहीं समझा सकता।
🤝 सामाजिक अनुबंध सिद्धांत : एक परिचय
दैवीय सिद्धांत के विरोध में सामाजिक अनुबंध सिद्धांत एक आधुनिक और तर्कसंगत सिद्धांत के रूप में उभरा।
▪ सामाजिक अनुबंध का अर्थ
इस सिद्धांत के अनुसार राज्य की उत्पत्ति मनुष्यों के आपसी समझौते (Contract) से हुई है।
▪ प्रमुख विचारक
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थॉमस हॉब्स
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जॉन लॉक
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जीन जैक्स रूसो
🧠 सामाजिक अनुबंध सिद्धांत की मुख्य विशेषताएँ
सामाजिक अनुबंध सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
✔️ 1. राज्य मानव निर्मित संस्था
राज्य ईश्वर की देन नहीं, बल्कि मानव आवश्यकता का परिणाम है।
✔️ 2. जनसहमति का महत्व
राज्य की वैधता जनता की सहमति पर आधारित होती है।
✔️ 3. अधिकारों की सुरक्षा
राज्य का उद्देश्य जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की रक्षा करना है।
✔️ 4. सीमित सत्ता
राज्य की सत्ता सीमित होती है और उसे जनता के प्रति उत्तरदायी होना पड़ता है।
🔄 दैवीय सिद्धांत और सामाजिक अनुबंध सिद्धांत की तुलना
अब दोनों सिद्धांतों की तुलनात्मक समीक्षा प्रस्तुत है—
📌 1. उत्पत्ति का आधार
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दैवीय सिद्धांत: ईश्वर की इच्छा
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सामाजिक अनुबंध: मानव समझौता
📌 2. राज्य की प्रकृति
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दैवीय सिद्धांत: दैवीय और पवित्र
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सामाजिक अनुबंध: लौकिक और मानव निर्मित
📌 3. सत्ता का स्रोत
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दैवीय सिद्धांत: राजा
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सामाजिक अनुबंध: जनता
📌 4. नागरिकों की भूमिका
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दैवीय सिद्धांत: आज्ञापालन
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सामाजिक अनुबंध: अधिकार और कर्तव्य दोनों
📌 5. विद्रोह का अधिकार
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दैवीय सिद्धांत: पूर्णतः निषिद्ध
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सामाजिक अनुबंध: अत्याचार की स्थिति में मान्य
🌍 आधुनिक राज्य के संदर्भ में दोनों सिद्धांत
आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में सामाजिक अनुबंध सिद्धांत अधिक प्रासंगिक माना जाता है।
▪ संविधान और जनसत्ता
आज राज्य की वैधता संविधान और जनमत से आती है, न कि दैवीय अधिकार से।
▪ दैवीय सिद्धांत की अप्रासंगिकता
दैवीय सिद्धांत आधुनिक लोकतंत्र, मानवाधिकार और विधि के शासन से मेल नहीं खाता।
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि राज्य की उत्पत्ति का दैवीय सिद्धांत ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अवश्य है, किंतु आधुनिक युग में यह अप्रासंगिक हो चुका है। इसके विपरीत सामाजिक अनुबंध सिद्धांत राज्य को एक मानव निर्मित, जनकल्याणकारी और उत्तरदायी संस्था के रूप में प्रस्तुत करता है। इसलिए राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन में सामाजिक अनुबंध सिद्धांत को अधिक तर्कसंगत, वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक माना जाता है, जबकि दैवीय सिद्धांत अब केवल ऐतिहासिक महत्व तक सीमित रह गया है।
प्रश्न 03. राज्य के कार्यों के लिए उदारवादी और मार्क्सवादी सिद्धांतों पर चर्चा करें। शासन के प्रति इनके दृष्टिकोण में क्या अंतर है?
🔰 भूमिका (Introduction)
राजनीतिक विज्ञान में राज्य के कार्यों को लेकर विभिन्न विचारधाराओं के बीच गहरा मतभेद पाया जाता है। विशेष रूप से उदारवादी (Liberal) और मार्क्सवादी (Marxist) सिद्धांत राज्य, शासन और सत्ता की भूमिका को बिल्कुल भिन्न दृष्टिकोणों से देखते हैं। जहाँ उदारवादी सिद्धांत राज्य को व्यक्ति की स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा करने वाला साधन मानता है, वहीं मार्क्सवादी सिद्धांत राज्य को वर्गीय शोषण का उपकरण मानता है।
प्रस्तुत उत्तर में राज्य के कार्यों के संदर्भ में उदारवादी एवं मार्क्सवादी सिद्धांतों की विवेचना की गई है तथा शासन के प्रति इनके दृष्टिकोणों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है।
🧠 राज्य और शासन : संक्षिप्त वैचारिक पृष्ठभूमि
राज्य के कार्यों को समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि उदारवादी और मार्क्सवादी विचारधाराएँ राज्य को किस रूप में देखती हैं।
▪ उदारवादी दृष्टिकोण
उदारवाद व्यक्ति को केंद्र में रखता है और राज्य को एक आवश्यक किंतु सीमित संस्था मानता है।
▪ मार्क्सवादी दृष्टिकोण
मार्क्सवाद समाज को वर्गों में विभाजित मानता है और राज्य को शासक वर्ग का साधन समझता है।
🟦 राज्य के कार्यों पर उदारवादी सिद्धांत
🌟 उदारवादी सिद्धांत की वैचारिक आधारभूमि
उदारवादी सिद्धांत का विकास 17वीं–18वीं शताब्दी में हुआ। इसके प्रमुख विचारक जॉन लॉक, एडम स्मिथ, जे. एस. मिल आदि थे।
▪ व्यक्ति की प्रधानता
उदारवाद के अनुसार राज्य व्यक्ति के लिए है, व्यक्ति राज्य के लिए नहीं।
⚙️ उदारवादी सिद्धांत के अनुसार राज्य के प्रमुख कार्य
✔️ 1. जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की रक्षा
राज्य का मुख्य कार्य नागरिकों के प्राकृतिक अधिकारों की सुरक्षा करना है।
✔️ 2. कानून एवं व्यवस्था की स्थापना
राज्य को समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखनी चाहिए।
✔️ 3. न्याय व्यवस्था का संचालन
स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका उदारवादी राज्य की अनिवार्य शर्त है।
✔️ 4. सीमित शासन की अवधारणा
उदारवादी राज्य न्यूनतम हस्तक्षेप (Laissez-faire) में विश्वास करता है।
✔️ 5. आर्थिक क्षेत्र में सीमित भूमिका
क्लासिकल उदारवाद राज्य को आर्थिक गतिविधियों से दूर रखना चाहता है।
🏛️ शासन के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण
उदारवादी विचारधारा शासन को एक संवैधानिक, उत्तरदायी और सीमित सत्ता के रूप में देखती है।
▪ विधि का शासन
शासन कानून के अधीन होता है, व्यक्ति के नहीं।
▪ लोकतंत्र और प्रतिनिधित्व
लोकतांत्रिक शासन को उदारवाद का सर्वश्रेष्ठ रूप माना जाता है।
🟥 राज्य के कार्यों पर मार्क्सवादी सिद्धांत
🔥 मार्क्सवादी सिद्धांत की वैचारिक पृष्ठभूमि
मार्क्सवादी सिद्धांत का विकास कार्ल मार्क्स और एंगेल्स ने किया। यह सिद्धांत ऐतिहासिक भौतिकवाद पर आधारित है।
▪ आर्थिक आधार
राजनीति और राज्य को आर्थिक संरचना से निर्धारित माना गया है।
⚙️ मार्क्सवादी सिद्धांत के अनुसार राज्य के कार्य
✔️ 1. शासक वर्ग के हितों की रक्षा
राज्य पूंजीपति वर्ग के हितों को सुरक्षित रखने का साधन है।
✔️ 2. वर्गीय शोषण को बनाए रखना
कानून और प्रशासन शोषणकारी व्यवस्था को वैधता प्रदान करते हैं।
✔️ 3. पूंजीवादी व्यवस्था का संरक्षण
राज्य पूंजीवाद की रक्षा करता है और श्रमिकों के विद्रोह को दबाता है।
✔️ 4. क्रांति का विरोध
पूंजीवादी राज्य क्रांतिकारी आंदोलनों को कुचलने का कार्य करता है।
✔️ 5. समाजवादी राज्य का संक्रमणकालीन कार्य
क्रांति के बाद राज्य अस्थायी रूप से सर्वहारा तानाशाही के रूप में कार्य करता है।
🏭 शासन के प्रति मार्क्सवादी दृष्टिकोण
मार्क्सवादी विचारधारा शासन को वर्गीय प्रभुत्व का उपकरण मानती है।
▪ तटस्थ शासन की अस्वीकृति
मार्क्सवाद शासन को कभी तटस्थ नहीं मानता।
▪ राज्य का लोप
अंततः वर्गविहीन समाज में राज्य और शासन दोनों समाप्त हो जाएंगे।
🔄 उदारवादी और मार्क्सवादी सिद्धांतों की तुलनात्मक समीक्षा
📌 1. राज्य की प्रकृति
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उदारवादी: जनकल्याणकारी एवं तटस्थ संस्था
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मार्क्सवादी: वर्गीय शोषण का उपकरण
📌 2. शासन का उद्देश्य
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उदारवादी: अधिकारों की रक्षा
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मार्क्सवादी: शासक वर्ग की सेवा
📌 3. स्वतंत्रता की अवधारणा
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उदारवादी: व्यक्तिगत स्वतंत्रता
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मार्क्सवादी: आर्थिक मुक्ति
📌 4. आर्थिक भूमिका
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उदारवादी: सीमित हस्तक्षेप
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मार्क्सवादी: पूंजीवाद का उन्मूलन
📌 5. शासन की वैधता
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उदारवादी: संविधान और जनसहमति
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मार्क्सवादी: वर्गीय प्रभुत्व
🌍 आधुनिक संदर्भ में दोनों सिद्धांत
आज के कल्याणकारी राज्यों में उदारवाद और मार्क्सवाद दोनों के तत्व देखे जा सकते हैं।
▪ नव-उदारवाद
राज्य की भूमिका को पुनः सीमित करने की प्रवृत्ति।
▪ समाजवादी नीतियाँ
कल्याणकारी योजनाओं में मार्क्सवादी प्रभाव।
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि राज्य के कार्यों के संदर्भ में उदारवादी और मार्क्सवादी सिद्धांत दो विपरीत ध्रुवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उदारवादी सिद्धांत राज्य को स्वतंत्रता का रक्षक मानता है, जबकि मार्क्सवादी सिद्धांत उसे शोषण का साधन समझता है। शासन के प्रति इनके दृष्टिकोणों में यही मौलिक अंतर है। आधुनिक राजनीतिक व्यवस्थाएँ इन दोनों विचारधाराओं के संतुलन से ही अधिक प्रभावी बन पाई हैं।
प्रश्न 04. स्वतंत्रता की अवधारणा और उसके विभिन्न आयामों पर विस्तार से चर्चा करें। यह समानता से कैसे भिन्न है?
🔰 भूमिका (Introduction)
राजनीतिक विज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों में स्वतंत्रता (Liberty) का स्थान अत्यंत केंद्रीय है। स्वतंत्रता को प्रायः मानव जीवन का प्राणतत्त्व कहा जाता है, क्योंकि इसके बिना व्यक्ति का नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक विकास संभव नहीं है। स्वतंत्रता केवल बंधनों की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को अपने जीवन के उद्देश्य चुनने और उन्हें प्राप्त करने का अवसर प्रदान करती है।
राजनीतिक चिंतन में स्वतंत्रता की अवधारणा समय के साथ विकसित हुई है और इसके विभिन्न आयाम सामने आए हैं। साथ ही, स्वतंत्रता को अक्सर समानता (Equality) से जोड़ा जाता है, किंतु दोनों अवधारणाएँ एक-दूसरे से भिन्न भी हैं। प्रस्तुत उत्तर में स्वतंत्रता की अवधारणा, उसके विविध आयामों तथा स्वतंत्रता और समानता के बीच अंतर को विस्तार से स्पष्ट किया गया है।
🧠 स्वतंत्रता की अवधारणा (Concept of Liberty)
स्वतंत्रता का सामान्य अर्थ है—व्यक्ति की इच्छा अनुसार कार्य करने की क्षमता, बशर्ते वह दूसरों की स्वतंत्रता में बाधा न डाले।
▪ स्वतंत्रता का मूल अर्थ
राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्रता का आशय है—
“व्यक्ति को समाज द्वारा मान्य सीमा के भीतर अपने विचारों, कार्यों और जीवन शैली को चुनने की आज़ादी।”
▪ स्वतंत्रता और अनुशासन
स्वतंत्रता अराजकता नहीं है। यह कानून, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ जुड़ी हुई अवधारणा है।
📜 स्वतंत्रता की दार्शनिक पृष्ठभूमि
स्वतंत्रता की अवधारणा का विकास विभिन्न राजनीतिक विचारकों द्वारा किया गया।
▪ जॉन लॉक का दृष्टिकोण
लॉक के अनुसार स्वतंत्रता का अर्थ है—कानून के अंतर्गत जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की रक्षा।
▪ जे. एस. मिल का दृष्टिकोण
मिल ने स्वतंत्रता को व्यक्ति के आत्म-विकास से जोड़ा और कहा कि समाज को व्यक्ति के निजी क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
🌈 स्वतंत्रता के विभिन्न आयाम (Dimensions of Liberty)
स्वतंत्रता एक बहुआयामी अवधारणा है, जिसे केवल एक रूप में नहीं समझा जा सकता।
🟢 1. नकारात्मक स्वतंत्रता (Negative Liberty)
यह स्वतंत्रता का पारंपरिक और उदारवादी रूप है।
▪ अर्थ
नकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ है—बाहरी बाधाओं का अभाव।
▪ मुख्य विशेषताएँ
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राज्य का न्यूनतम हस्तक्षेप
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व्यक्ति को निजी क्षेत्र में स्वतंत्रता
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“छोड़ दिए जाने की स्वतंत्रता”
▪ आलोचना
यह स्वतंत्रता आर्थिक और सामाजिक असमानताओं की उपेक्षा करती है।
🔵 2. सकारात्मक स्वतंत्रता (Positive Liberty)
यह स्वतंत्रता का आधुनिक और समाजोन्मुखी रूप है।
▪ अर्थ
सकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ है—कुछ करने की क्षमता।
▪ राज्य की भूमिका
राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी सुविधाएँ देकर व्यक्ति को स्वतंत्र बनाता है।
▪ महत्व
यह स्वतंत्रता वास्तविक और सार्थक मानी जाती है।
🏛️ 3. राजनीतिक स्वतंत्रता
राजनीतिक स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा मानी जाती है।
▪ प्रमुख तत्व
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मताधिकार
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चुनाव लड़ने का अधिकार
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सरकार की आलोचना की स्वतंत्रता
▪ महत्व
इसके बिना शासन निरंकुश बन जाता है।
🧍 4. व्यक्तिगत स्वतंत्रता
यह व्यक्ति के निजी जीवन से संबंधित स्वतंत्रता है।
▪ अंतर्गत आने वाले अधिकार
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विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
-
धर्म की स्वतंत्रता
-
आवागमन की स्वतंत्रता
▪ संविधान में स्थान
भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार इसी स्वतंत्रता का उदाहरण हैं।
💰 5. आर्थिक स्वतंत्रता
आर्थिक स्वतंत्रता के बिना अन्य स्वतंत्रताएँ अधूरी रह जाती हैं।
▪ अर्थ
व्यक्ति को आजीविका चुनने और आर्थिक सुरक्षा प्राप्त करने की स्वतंत्रता।
▪ महत्व
गरीबी व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर देती है।
🌍 6. सामाजिक स्वतंत्रता
सामाजिक स्वतंत्रता का संबंध सामाजिक भेदभाव से मुक्ति से है।
▪ मुख्य बिंदु
-
जाति, धर्म, लिंग के आधार पर भेदभाव का अभाव
-
सामाजिक समानता की स्थापना
⚖️ स्वतंत्रता और समानता का संबंध
स्वतंत्रता और समानता दोनों लोकतांत्रिक मूल्यों के स्तंभ हैं।
▪ पूरक संबंध
स्वतंत्रता बिना समानता के अर्थहीन हो सकती है और समानता बिना स्वतंत्रता के निरर्थक।
🔍 स्वतंत्रता और समानता में अंतर
📌 1. अवधारणा का अंतर
-
स्वतंत्रता: चयन और कार्य की आज़ादी
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समानता: सभी को समान अवसर और अधिकार
📌 2. उद्देश्य
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स्वतंत्रता: आत्म-विकास
-
समानता: न्याय और निष्पक्षता
📌 3. प्रकृति
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स्वतंत्रता: व्यक्तिगत केंद्रित
-
समानता: सामाजिक केंद्रित
📌 4. खतरे
-
अत्यधिक स्वतंत्रता → अराजकता
-
अत्यधिक समानता → स्वतंत्रता का ह्रास
📌 5. राजनीतिक संदर्भ
-
स्वतंत्रता: अधिकारों पर बल
-
समानता: अवसरों की समानता पर बल
🌍 आधुनिक लोकतंत्र में स्वतंत्रता और समानता
आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य दोनों के संतुलन पर आधारित होते हैं।
▪ कल्याणकारी राज्य
राज्य सकारात्मक स्वतंत्रता और समानता को बढ़ावा देता है।
▪ संवैधानिक व्यवस्था
संविधान स्वतंत्रता की रक्षा करता है और समानता सुनिश्चित करता है।
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता मानव जीवन का मूल आधार है और इसके बिना व्यक्ति का सर्वांगीण विकास संभव नहीं। स्वतंत्रता के विभिन्न आयाम—नकारात्मक, सकारात्मक, राजनीतिक, व्यक्तिगत, आर्थिक और सामाजिक—इसे एक व्यापक और गहन अवधारणा बनाते हैं। वहीं समानता स्वतंत्रता से भिन्न होते हुए भी उसकी पूरक है। स्वतंत्रता जहाँ व्यक्ति को उड़ान देती है, वहीं समानता उस उड़ान को न्यायपूर्ण दिशा प्रदान करती है। अतः एक आदर्श लोकतांत्रिक समाज वही है, जहाँ स्वतंत्रता और समानता के बीच संतुलन स्थापित हो।
प्रश्न 05. अभिजात वर्ग के सिद्धांत पर विस्तृत चर्चा करें। लोकतंत्र के कार्यकरण में यह कैसे योगदान देता है?
🔰 भूमिका (Introduction)
राजनीतिक विज्ञान में सत्ता के स्वरूप और उसके संचालन को समझने के लिए अभिजात वर्ग का सिद्धांत (Elite Theory) अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह सिद्धांत इस धारणा पर आधारित है कि किसी भी समाज या राजनीतिक व्यवस्था में सत्ता वास्तव में बहुसंख्यक जनता के हाथों में नहीं, बल्कि कुछ चुने हुए, संगठित और प्रभावशाली व्यक्तियों के समूह के हाथों में केंद्रित रहती है।
लोकतंत्र में जहाँ आदर्श रूप से जनता की सत्ता (लोकतंत्र = जनसत्ता) की बात की जाती है, वहीं अभिजात वर्ग का सिद्धांत यह प्रश्न उठाता है कि क्या वास्तव में जनता शासन करती है या सत्ता कुछ विशेष वर्गों तक ही सीमित रहती है। प्रस्तुत उत्तर में अभिजात वर्ग के सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या की गई है तथा लोकतंत्र के कार्यकरण में इसके योगदान का विश्लेषण किया गया है।
🧠 अभिजात वर्ग की अवधारणा (Concept of Elite)
अभिजात वर्ग से आशय समाज के उस छोटे से समूह से है जो—
-
राजनीतिक
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आर्थिक
-
सामाजिक
-
बौद्धिक
क्षेत्रों में असाधारण प्रभाव और शक्ति रखता है।
▪ अभिजात वर्ग की परिभाषा
इतालवी समाजशास्त्री विल्फ्रेडो पेरेटो के अनुसार—
“हर समाज दो वर्गों में विभाजित होता है—शासक अभिजात वर्ग और शासित बहुसंख्यक वर्ग।”
📜 अभिजात वर्ग सिद्धांत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अभिजात वर्ग के सिद्धांत का विकास मुख्यतः 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में हुआ।
▪ प्रमुख विचारक
अभिजात वर्ग सिद्धांत के तीन प्रमुख प्रवर्तक माने जाते हैं—
-
विल्फ्रेडो पेरेटो
-
गैटानो मोस्का
-
रॉबर्ट मिशेल्स
इन सभी ने लोकतंत्र की व्यवहारिक वास्तविकताओं का विश्लेषण किया।
🏛️ अभिजात वर्ग सिद्धांत के प्रमुख प्रतिपादक और उनके विचार
🟢 1. विल्फ्रेडो पेरेटो का दृष्टिकोण
पेरेटो ने समाज को दो वर्गों में विभाजित किया—
▪ शासक अभिजात वर्ग
जो सत्ता और निर्णय प्रक्रिया पर नियंत्रण रखता है।
▪ गैर-अभिजात वर्ग
जो शासित होता है।
🔄 अभिजात वर्ग का संचलन (Circulation of Elites)
पेरेटो के अनुसार अभिजात वर्ग स्थायी नहीं होता। समय-समय पर पुराने अभिजात वर्ग का पतन होता है और नया अभिजात वर्ग उभरता है।
🟡 2. गैटानो मोस्का का दृष्टिकोण
मोस्का ने राजनीतिक वर्ग (Political Class) की अवधारणा दी।
▪ अल्पसंख्यक शासन का सिद्धांत
हर समाज में एक संगठित अल्पसंख्यक वर्ग शासन करता है, जबकि असंगठित बहुसंख्यक वर्ग शासित होता है।
▪ संगठन का महत्व
मोस्का के अनुसार सत्ता का आधार संख्या नहीं, बल्कि संगठन है।
🔴 3. रॉबर्ट मिशेल्स का दृष्टिकोण
मिशेल्स ने अल्पतंत्रीय प्रवृत्ति का लौह नियम (Iron Law of Oligarchy) प्रतिपादित किया।
▪ लौह नियम का सार
“हर संगठन, चाहे वह कितना ही लोकतांत्रिक क्यों न हो, अंततः अल्पतंत्र में बदल जाता है।”
▪ लोकतंत्र की व्यावहारिक सीमा
लोकतांत्रिक संस्थाओं में भी नेतृत्व कुछ व्यक्तियों तक सीमित रह जाता है।
⭐ अभिजात वर्ग सिद्धांत की मुख्य विशेषताएँ
✔️ 1. अल्पसंख्यक शासन
वास्तविक सत्ता हमेशा अल्पसंख्यक अभिजात वर्ग के हाथों में रहती है।
✔️ 2. संगठन की प्रधानता
संगठित वर्ग असंगठित जनता पर शासन करता है।
✔️ 3. सत्ता का केंद्रीकरण
निर्णय प्रक्रिया सीमित लोगों तक केंद्रित रहती है।
✔️ 4. लोकतंत्र की आलोचनात्मक व्याख्या
यह सिद्धांत लोकतंत्र के आदर्श और व्यवहार में अंतर को उजागर करता है।
✔️ 5. अभिजात वर्ग का परिवर्तन
समय के साथ अभिजात वर्ग बदलता रहता है।
⚖️ अभिजात वर्ग सिद्धांत का मूल्यांकन
अभिजात वर्ग सिद्धांत की उपयोगिता और सीमाएँ दोनों हैं।
🌟 सकारात्मक पक्ष
-
राजनीतिक यथार्थ का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करता है
-
सत्ता के केंद्रीकरण को स्पष्ट करता है
-
लोकतंत्र के व्यवहारिक स्वरूप को समझने में सहायक
❌ आलोचनाएँ
-
जनता की भूमिका को कम आँकता है
-
लोकतांत्रिक सहभागिता की उपेक्षा
-
सत्ता परिवर्तन को केवल अभिजात वर्ग तक सीमित मानता है
🗳️ लोकतंत्र के कार्यकरण में अभिजात वर्ग का योगदान
यद्यपि अभिजात वर्ग सिद्धांत लोकतंत्र की आलोचना करता है, फिर भी यह लोकतंत्र के संचालन में कई प्रकार से योगदान देता है।
🏗️ 1. नेतृत्व प्रदान करना
लोकतंत्र में प्रभावी शासन के लिए कुशल नेतृत्व आवश्यक होता है।
▪ नीति निर्माण में भूमिका
अभिजात वर्ग नीति निर्धारण और प्रशासन में विशेषज्ञता प्रदान करता है।
🧩 2. प्रशासनिक दक्षता
सभी नागरिक शासन में प्रत्यक्ष भाग नहीं ले सकते।
▪ विशेषज्ञों की आवश्यकता
अभिजात वर्ग प्रशासनिक और तकनीकी निर्णयों को प्रभावी ढंग से लेता है।
⚙️ 3. निर्णय प्रक्रिया को स्थिरता
अत्यधिक जनसहभागिता से निर्णय प्रक्रिया धीमी हो सकती है।
▪ संतुलन की भूमिका
अभिजात वर्ग लोकतंत्र में स्थिरता और निरंतरता बनाए रखता है।
🧠 4. राजनीतिक समाजीकरण
अभिजात वर्ग राजनीतिक विचारधाराओं और मूल्यों को दिशा देता है।
▪ जनमत निर्माण
मीडिया, शिक्षा और राजनीति के माध्यम से जनमत प्रभावित होता है।
🛡️ 5. लोकतंत्र की सुरक्षा
कई बार अभिजात वर्ग लोकतंत्र को भीड़तंत्र से बचाने का कार्य करता है।
▪ संवैधानिक मूल्यों की रक्षा
संस्थागत अभिजात वर्ग लोकतांत्रिक परंपराओं की रक्षा करता है।
🔄 अभिजात वर्ग और लोकतंत्र : विरोध या पूरक?
प्रथम दृष्टया अभिजात वर्ग और लोकतंत्र विरोधी प्रतीत होते हैं, किंतु व्यवहार में दोनों सह-अस्तित्व में पाए जाते हैं।
▪ आधुनिक लोकतंत्र
आधुनिक लोकतंत्र वास्तव में अभिजात लोकतंत्र (Elite Democracy) के रूप में कार्य करता है।
▪ जनता की भूमिका
जनता अभिजात वर्ग का चयन चुनावों के माध्यम से करती है।
🌍 आधुनिक संदर्भ में अभिजात वर्ग सिद्धांत
आज के समय में—
-
राजनीतिक दलों का नेतृत्व
-
नौकरशाही
-
कॉर्पोरेट वर्ग
-
मीडिया
सभी मिलकर आधुनिक अभिजात वर्ग का निर्माण करते हैं।
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि अभिजात वर्ग का सिद्धांत लोकतंत्र की एक व्यावहारिक और यथार्थवादी व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह इस भ्रम को तोड़ता है कि सत्ता पूर्णतः जनता के हाथों में होती है। यद्यपि यह सिद्धांत लोकतांत्रिक आदर्शों को सीमित करता प्रतीत होता है, फिर भी लोकतंत्र के कार्यकरण में अभिजात वर्ग नेतृत्व, दक्षता, स्थिरता और नीति-निर्माण के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान देता है। अतः आधुनिक लोकतंत्र को समझने के लिए अभिजात वर्ग सिद्धांत को नकारना नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 01. राजनीतिक सिद्धांत को परिभाषित करें और यह राजनीतिक दर्शन से कैसे अलग है?
🔰 भूमिका (Introduction)
राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन केवल शासन, सत्ता और संस्थाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे छिपे विचारों, मूल्यों और अवधारणाओं को समझना भी उतना ही आवश्यक है। इसी संदर्भ में राजनीतिक सिद्धांत (Political Theory) का विशेष महत्व है। राजनीतिक सिद्धांत राजनीति के क्या, क्यों और कैसे जैसे मूल प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करता है।
अक्सर राजनीतिक सिद्धांत को राजनीतिक दर्शन (Political Philosophy) के समान समझ लिया जाता है, जबकि दोनों में सूक्ष्म किंतु महत्वपूर्ण अंतर है। प्रस्तुत उत्तर में राजनीतिक सिद्धांत की परिभाषा, प्रकृति और महत्व पर चर्चा की गई है तथा इसे राजनीतिक दर्शन से स्पष्ट रूप से भिन्न किया गया है।
🧠 राजनीतिक सिद्धांत की अवधारणा (Concept of Political Theory)
📌 राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ
राजनीतिक सिद्धांत से आशय उन सिद्धांतों, विचारों और अवधारणाओं के व्यवस्थित अध्ययन से है, जो राज्य, सत्ता, शासन, अधिकार, स्वतंत्रता, समानता, न्याय और कर्तव्य जैसे विषयों की व्याख्या करते हैं।
▪ सरल शब्दों में
राजनीतिक सिद्धांत राजनीति के मूलभूत सिद्धांतों का तार्किक और व्यवस्थित अध्ययन है।
📖 राजनीतिक सिद्धांत की परिभाषाएँ
विभिन्न विद्वानों ने राजनीतिक सिद्धांत को अलग–अलग ढंग से परिभाषित किया है—
▪ डेविड हेल्ड के अनुसार
“राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक विचारों और मूल्यों का आलोचनात्मक विश्लेषण है।”
▪ गेटेल के अनुसार
“राजनीतिक सिद्धांत राज्य के स्वभाव, उद्देश्यों और कार्यों का वैज्ञानिक अध्ययन है।”
इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि राजनीतिक सिद्धांत केवल विचारों का संग्रह नहीं, बल्कि उनका विश्लेषण और मूल्यांकन भी करता है।
🏛️ राजनीतिक सिद्धांत की प्रकृति (Nature of Political Theory)
🔹 1. मानकात्मक और व्यावहारिक
राजनीतिक सिद्धांत यह बताता है कि राज्य कैसा होना चाहिए और साथ ही यह भी कि वास्तव में वह कैसा है।
🔹 2. मूल्य-आधारित
यह स्वतंत्रता, समानता, न्याय और अधिकार जैसे नैतिक मूल्यों पर आधारित होता है।
🔹 3. आलोचनात्मक दृष्टिकोण
राजनीतिक सिद्धांत स्थापित व्यवस्थाओं और विचारों की आलोचना करता है।
🔹 4. गतिशील स्वरूप
यह समय और परिस्थितियों के साथ विकसित होता रहता है।
🌈 राजनीतिक सिद्धांत के प्रमुख विषय
🟢 राज्य और सत्ता
राज्य की उत्पत्ति, प्रकृति और औचित्य का अध्ययन।
🔵 स्वतंत्रता और समानता
व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन की व्याख्या।
🟣 न्याय और अधिकार
न्यायपूर्ण समाज की अवधारणा और अधिकारों की सीमा।
🟠 लोकतंत्र और शासन
शासन के सर्वोत्तम रूप की खोज।
⭐ राजनीतिक सिद्धांत का महत्व (Importance of Political Theory)
✔️ 1. राजनीतिक चेतना का विकास
राजनीतिक सिद्धांत नागरिकों में राजनीतिक जागरूकता पैदा करता है।
✔️ 2. लोकतंत्र की मजबूती
लोकतांत्रिक मूल्यों को समझने और लागू करने में सहायक।
✔️ 3. राजनीतिक सुधारों का आधार
नए विचार और सुधार इसी के माध्यम से सामने आते हैं।
✔️ 4. सत्ता पर नैतिक नियंत्रण
राज्य और शासन की शक्ति को नैतिक सीमाओं में बाँधता है।
🧩 राजनीतिक दर्शन की अवधारणा (Concept of Political Philosophy)
📌 राजनीतिक दर्शन का अर्थ
राजनीतिक दर्शन राजनीति के आदर्शवादी, नैतिक और दार्शनिक प्रश्नों से संबंधित है।
▪ मूल प्रश्न
-
राज्य क्यों होना चाहिए?
-
न्याय क्या है?
-
सर्वोत्तम शासन कैसा हो?
राजनीतिक दर्शन अधिक अमूर्त (Abstract) और गहन चिंतन पर आधारित होता है।
📜 राजनीतिक दर्शन के प्रमुख विचारक
-
प्लेटो
-
अरस्तू
-
हॉब्स
-
लॉक
-
रूसो
-
कांट
इन विचारकों ने राजनीति को नैतिकता और दर्शन से जोड़कर देखा।
⚖️ राजनीतिक सिद्धांत और राजनीतिक दर्शन में अंतर
अब दोनों के बीच मुख्य अंतरों को स्पष्ट किया जा सकता है—
📌 1. अध्ययन का स्वरूप
-
राजनीतिक सिद्धांत: विश्लेषणात्मक और व्यवस्थित
-
राजनीतिक दर्शन: दार्शनिक और नैतिक
📌 2. व्यावहारिकता
-
राजनीतिक सिद्धांत: व्यवहारिक राजनीति से जुड़ा
-
राजनीतिक दर्शन: अधिक सैद्धांतिक और आदर्शवादी
📌 3. विषय-वस्तु
-
राजनीतिक सिद्धांत: सत्ता, शासन, संस्थाएँ
-
राजनीतिक दर्शन: नैतिकता, आदर्श, मूल्य
📌 4. उद्देश्य
-
राजनीतिक सिद्धांत: राजनीतिक वास्तविकताओं को समझना
-
राजनीतिक दर्शन: आदर्श राज्य और समाज की कल्पना
📌 5. पद्धति
-
राजनीतिक सिद्धांत: तार्किक, आलोचनात्मक और वैज्ञानिक
-
राजनीतिक दर्शन: चिंतनशील और तात्त्विक
📌 6. समय के साथ संबंध
-
राजनीतिक सिद्धांत: समयानुकूल परिवर्तनशील
-
राजनीतिक दर्शन: अपेक्षाकृत स्थायी
🔄 परस्पर संबंध : विरोध नहीं, पूरकता
यद्यपि राजनीतिक सिद्धांत और राजनीतिक दर्शन में अंतर है, फिर भी दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
▪ दर्शन से सिद्धांत
राजनीतिक दर्शन सिद्धांत को वैचारिक आधार प्रदान करता है।
▪ सिद्धांत से व्यवहार
राजनीतिक सिद्धांत दर्शन को व्यावहारिक रूप देता है।
🌍 आधुनिक संदर्भ में राजनीतिक सिद्धांत
आधुनिक युग में राजनीतिक सिद्धांत—
-
मानवाधिकार
-
लैंगिक समानता
-
सामाजिक न्याय
-
पर्यावरणीय राजनीति
जैसे नए मुद्दों को शामिल कर चुका है, जो इसे राजनीतिक दर्शन से अधिक समकालीन और प्रासंगिक बनाता है।
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि राजनीतिक सिद्धांत राजनीति की आत्मा है, जो सत्ता, राज्य और शासन को नैतिक और तार्किक आधार प्रदान करता है। वहीं राजनीतिक दर्शन राजनीति के आदर्श और नैतिक पक्ष पर गहन चिंतन करता है। दोनों के बीच अंतर होने के बावजूद वे परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। राजनीतिक दर्शन जहाँ दिशा देता है, वहीं राजनीतिक सिद्धांत उस दिशा को व्यवहारिक राजनीति से जोड़ता है। अतः राजनीतिक विज्ञान के समग्र अध्ययन के लिए दोनों की समझ अनिवार्य है।
प्रश्न 02. राजनीतिक विज्ञान का इतिहास से क्या संबंध है? उदाहरण दें।
🔰 भूमिका (Introduction)
राजनीतिक विज्ञान और इतिहास दोनों ही सामाजिक विज्ञान की महत्वपूर्ण शाखाएँ हैं। यद्यपि इनका अध्ययन-क्षेत्र अलग-अलग प्रतीत होता है, फिर भी इनके बीच गहरा, घनिष्ठ और अनिवार्य संबंध पाया जाता है। इतिहास जहाँ अतीत की घटनाओं, संस्थाओं और व्यक्तियों का क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत करता है, वहीं राजनीतिक विज्ञान उन घटनाओं के पीछे छिपी राजनीतिक प्रक्रियाओं, सत्ता संबंधों और संस्थागत विकास का विश्लेषण करता है।
यह कहा जा सकता है कि इतिहास राजनीतिक विज्ञान की प्रयोगशाला है, क्योंकि राजनीतिक सिद्धांतों और अवधारणाओं की परीक्षा ऐतिहासिक घटनाओं के माध्यम से ही संभव होती है। प्रस्तुत उत्तर में राजनीतिक विज्ञान और इतिहास के संबंध को स्पष्ट करते हुए उपयुक्त उदाहरणों के माध्यम से उसकी व्याख्या की गई है।
🧠 इतिहास और राजनीतिक विज्ञान : आधारभूत अवधारणा
📌 इतिहास का अर्थ
इतिहास मानव समाज के अतीत की घटनाओं, संस्थाओं और परिवर्तनों का तथ्यात्मक एवं क्रमबद्ध अध्ययन है।
📌 राजनीतिक विज्ञान का अर्थ
राजनीतिक विज्ञान राज्य, सत्ता, शासन, कानून, राजनीतिक संस्थाओं और राजनीतिक व्यवहार का सैद्धांतिक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन है।
👉 स्पष्ट है कि राजनीतिक विज्ञान जिन विषयों का अध्ययन करता है, वे सभी किसी न किसी रूप में इतिहास में घटित हो चुके होते हैं।
🔗 राजनीतिक विज्ञान और इतिहास का घनिष्ठ संबंध
🏛️ 1. राज्य और राजनीतिक संस्थाओं का ऐतिहासिक विकास
राज्य, सरकार, संसद, न्यायपालिका जैसी संस्थाएँ अचानक नहीं बनीं, बल्कि इनका विकास एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है।
▪ उदाहरण
-
ब्रिटिश संसद का विकास मैग्ना कार्टा (1215) से शुरू होकर आज के लोकतांत्रिक स्वरूप तक पहुँचा।
-
भारतीय राज्य व्यवस्था को समझने के लिए औपनिवेशिक इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन का अध्ययन आवश्यक है।
📜 2. राजनीतिक सिद्धांतों की ऐतिहासिक जड़ें
राजनीतिक सिद्धांत इतिहास की परिस्थितियों की उपज होते हैं।
▪ उदाहरण
-
हॉब्स का निरंकुश राज्य सिद्धांत इंग्लैंड के गृहयुद्ध की पृष्ठभूमि में विकसित हुआ।
-
मार्क्सवाद औद्योगिक क्रांति और पूंजीवादी शोषण की ऐतिहासिक परिस्थितियों से जन्मा।
👉 बिना इतिहास जाने इन सिद्धांतों को समझना अधूरा है।
⚖️ 3. संविधान और कानूनों का ऐतिहासिक आधार
संविधान किसी भी देश के ऐतिहासिक अनुभवों का परिणाम होता है।
▪ उदाहरण
-
भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों का समावेश औपनिवेशिक दमन के ऐतिहासिक अनुभव से प्रेरित है।
-
अमेरिका का संविधान वहाँ की स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि से जुड़ा है।
🗳️ 4. राजनीतिक व्यवस्थाओं की तुलना में इतिहास की भूमिका
तुलनात्मक राजनीति में इतिहास का विशेष महत्व है।
▪ उदाहरण
-
ब्रिटेन में संवैधानिक राजतंत्र का शांतिपूर्ण विकास
-
फ्रांस में 1789 की क्रांति के माध्यम से गणराज्य की स्थापना
इन ऐतिहासिक घटनाओं से राजनीतिक विज्ञान विभिन्न शासन प्रणालियों की तुलना करता है।
🧩 इतिहास : राजनीतिक विज्ञान के लिए स्रोत सामग्री
📚 1. ऐतिहासिक तथ्य और अनुभव
इतिहास राजनीतिक विज्ञान को वास्तविक उदाहरण और अनुभव प्रदान करता है।
▪ सत्ता के प्रयोग के उदाहरण
-
हिटलर का जर्मनी → तानाशाही का अध्ययन
-
सोवियत संघ → समाजवादी राज्य की प्रकृति
🔍 2. कारण–परिणाम संबंध की समझ
इतिहास यह स्पष्ट करता है कि कौन-सी राजनीतिक नीतियाँ क्यों सफल या असफल रहीं।
▪ उदाहरण
-
वर्साय की संधि → द्वितीय विश्व युद्ध
-
औपनिवेशिक शोषण → राष्ट्रवादी आंदोलन
🌍 राजनीतिक व्यवहार और इतिहास
राजनीतिक व्यवहार (Political Behaviour) को समझने में भी इतिहास सहायक है।
🧠 जनआंदोलन और ऐतिहासिक चेतना
-
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन
-
नागरिक अधिकार आंदोलन (USA)
इन आंदोलनों ने राजनीतिक भागीदारी और जनसत्ता की अवधारणा को मजबूत किया।
🔄 इतिहास और राजनीतिक विज्ञान : अंतर के बावजूद संबंध
⚖️ अंतर
-
इतिहास: क्या हुआ?
-
राजनीतिक विज्ञान: क्यों हुआ और उसका राजनीतिक अर्थ क्या है?
🤝 संबंध
इतिहास तथ्य देता है, राजनीतिक विज्ञान उन तथ्यों की व्याख्या और सिद्धांत निर्माण करता है।
📌 विद्वानों के विचार
🧑🏫 गिलक्राइस्ट के अनुसार
“इतिहास अतीत की राजनीति है और राजनीति वर्तमान का इतिहास है।”
🧑🏫 सीले का कथन
“इतिहास बिना राजनीति के अधूरा है और राजनीति बिना इतिहास के अंधी।”
🧠 आधुनिक राजनीतिक विज्ञान में इतिहास का स्थान
आधुनिक राजनीतिक विज्ञान में—
-
ऐतिहासिक संस्थागतवाद (Historical Institutionalism)
-
विकासात्मक अध्ययन (Development Studies)
जैसे दृष्टिकोण इतिहास को केंद्रीय महत्व देते हैं।
📝 उदाहरणों द्वारा संबंध की स्पष्टता
📍 उदाहरण 1: फ्रांसीसी क्रांति (1789)
-
राजनीतिक विज्ञान → लोकतंत्र, नागरिक अधिकार
-
इतिहास → राजशाही का पतन, क्रांति की प्रक्रिया
📍 उदाहरण 2: भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन
-
राजनीतिक विज्ञान → राष्ट्रवाद, संविधान, लोकतंत्र
-
इतिहास → आंदोलनों, नेताओं और घटनाओं का विवरण
📍 उदाहरण 3: शीत युद्ध
-
राजनीतिक विज्ञान → अंतरराष्ट्रीय राजनीति, शक्ति संतुलन
-
इतिहास → अमेरिका-सोवियत संघर्ष की घटनाएँ
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि राजनीतिक विज्ञान और इतिहास के बीच अटूट और पूरक संबंध है। इतिहास राजनीतिक विज्ञान को तथ्य, अनुभव और संदर्भ प्रदान करता है, जबकि राजनीतिक विज्ञान इतिहास को अर्थ, विश्लेषण और सिद्धांत प्रदान करता है। इतिहास के बिना राजनीतिक विज्ञान केवल कल्पना बन जाता है और राजनीतिक विज्ञान के बिना इतिहास मात्र घटनाओं का संग्रह रह जाता है। अतः राजनीतिक जीवन और संस्थाओं की गहन समझ के लिए इतिहास और राजनीतिक विज्ञान का संयुक्त अध्ययन अनिवार्य है।
प्रश्न 03. राजनीतिक विज्ञान में व्यवहारवादी दृष्टिकोण की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
🔰 भूमिका (Introduction)
20वीं शताब्दी के मध्य तक राजनीतिक विज्ञान मुख्यतः संस्थागत, दार्शनिक और ऐतिहासिक अध्ययन तक सीमित था। संविधान, सरकार और कानूनों का अध्ययन तो होता था, किंतु यह समझने का प्रयास कम था कि राजनीति वास्तव में कैसे काम करती है और लोग राजनीतिक प्रक्रिया में कैसे व्यवहार करते हैं। इसी कमी को पूरा करने के लिए व्यवहारवादी दृष्टिकोण (Behavioural Approach) का उदय हुआ।
व्यवहारवादी दृष्टिकोण ने राजनीतिक विज्ञान को अधिक वैज्ञानिक, अनुभवजन्य और यथार्थवादी बनाया। इसने राजनीतिक संस्थाओं की बजाय राजनीतिक व्यवहार—जैसे मतदाता का व्यवहार, दलों की भूमिका और नेतृत्व की कार्यशैली—पर बल दिया। प्रस्तुत उत्तर में राजनीतिक विज्ञान में व्यवहारवादी दृष्टिकोण की प्रमुख विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा की गई है।
🧠 व्यवहारवादी दृष्टिकोण की अवधारणा (Concept of Behavioural Approach)
📌 व्यवहारवादी दृष्टिकोण का अर्थ
व्यवहारवादी दृष्टिकोण राजनीति को नियमों और संस्थाओं के बजाय मनुष्यों के वास्तविक व्यवहार के माध्यम से समझने का प्रयास करता है।
▪ सरल शब्दों में
राजनीतिक विज्ञान में व्यवहारवादी दृष्टिकोण का अर्थ है—
“राजनीति का अध्ययन इस आधार पर करना कि लोग वास्तव में क्या करते हैं, न कि केवल यह कि उन्हें क्या करना चाहिए।”
📜 व्यवहारवादी दृष्टिकोण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस दृष्टिकोण का विकास मुख्यतः 1950–1960 के दशक में हुआ।
▪ प्रमुख प्रेरणास्रोत
-
मनोविज्ञान
-
समाजशास्त्र
-
सांख्यिकी
-
वैज्ञानिक पद्धति
▪ प्रमुख विचारक
-
चार्ल्स मेरियम
-
डेविड ईस्टन
-
गेब्रियल आलमंड
-
हेरॉल्ड लासवेल
⭐ व्यवहारवादी दृष्टिकोण की प्रमुख विशेषताएँ
🔬 1. वैज्ञानिक पद्धति पर बल
व्यवहारवादी दृष्टिकोण राजनीतिक अध्ययन को वैज्ञानिक बनाना चाहता है।
▪ तथ्य और प्रमाण
अनुमान और दर्शन के स्थान पर तथ्य, आँकड़े और प्रमाणों का प्रयोग।
▪ परिकल्पना परीक्षण
राजनीतिक व्यवहार के बारे में परिकल्पनाएँ बनाकर उनका परीक्षण किया जाता है।
📊 2. अनुभवजन्य अध्ययन (Empirical Research)
व्यवहारवादी दृष्टिकोण अनुभवजन्य तथ्यों पर आधारित होता है।
▪ सर्वेक्षण और आँकड़े
मतदाता व्यवहार, जनमत और राजनीतिक सहभागिता को सर्वेक्षणों से समझा जाता है।
▪ उदाहरण
चुनावों में मतदान प्रतिशत और दलों की लोकप्रियता का विश्लेषण।
🧍 3. मानव व्यवहार पर केंद्रित अध्ययन
यह दृष्टिकोण संस्थाओं के बजाय व्यक्ति और समूह के व्यवहार को प्राथमिकता देता है।
▪ राजनीतिक व्यवहार
-
मतदाता का निर्णय
-
नेता का व्यवहार
-
दबाव समूहों की गतिविधियाँ
🔄 4. मूल्य-तटस्थता (Value Neutrality)
व्यवहारवादी विद्वान राजनीति का अध्ययन नैतिक निर्णयों से मुक्त होकर करना चाहते हैं।
▪ “क्या होना चाहिए” नहीं
बल्कि “क्या है” पर ध्यान।
📐 5. मापन और सामान्यीकरण
राजनीतिक घटनाओं को मापने योग्य बनाने पर बल।
▪ सामान्य नियमों की खोज
व्यवहारवादी दृष्टिकोण राजनीति में सामान्य सिद्धांत स्थापित करना चाहता है।
🧪 6. अंतर-विषयी दृष्टिकोण (Interdisciplinary Approach)
यह दृष्टिकोण अन्य सामाजिक विज्ञानों से विधियाँ ग्रहण करता है।
▪ मनोविज्ञान से
व्यक्ति के राजनीतिक दृष्टिकोण और प्रेरणा की समझ।
▪ समाजशास्त्र से
समूह व्यवहार और सामाजिक संरचना का विश्लेषण।
🏛️ 7. संस्थाओं की बजाय प्रक्रियाओं पर ध्यान
व्यवहारवादी दृष्टिकोण यह देखता है कि संस्थाएँ वास्तव में कैसे कार्य करती हैं।
▪ उदाहरण
संसद की संरचना से अधिक, सांसदों का व्यवहार।
🗳️ 8. राजनीतिक सहभागिता का अध्ययन
लोकतंत्र में जनता की भूमिका को समझने पर विशेष बल।
▪ अध्ययन के क्षेत्र
-
मतदान व्यवहार
-
राजनीतिक दलों में सहभागिता
-
जनआंदोलन
🌍 9. तुलनात्मक अध्ययन
व्यवहारवादी दृष्टिकोण विभिन्न देशों की राजनीतिक प्रक्रियाओं की तुलना करता है।
▪ उद्देश्य
राजनीतिक व्यवहार में समानताओं और भिन्नताओं की पहचान।
🧠 10. राजनीति को प्रणाली के रूप में देखना
डेविड ईस्टन ने राजनीति को प्रणाली (System) के रूप में प्रस्तुत किया।
▪ इनपुट–आउटपुट मॉडल
माँगें और समर्थन → निर्णय और नीतियाँ।
⚖️ व्यवहारवादी दृष्टिकोण का मूल्यांकन
🌟 सकारात्मक पक्ष
-
राजनीतिक विज्ञान को वैज्ञानिक बनाया
-
व्यवहारिक यथार्थ को समझने में सहायक
-
लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अध्ययन में उपयोगी
❌ आलोचनाएँ
-
मूल्यों और नैतिकता की उपेक्षा
-
अत्यधिक आँकड़ों पर निर्भरता
-
सत्ता और विचारधारा की गहरी व्याख्या का अभाव
🔄 व्यवहारोत्तर (Post-Behavioural) प्रतिक्रिया
1960 के बाद विद्वानों ने व्यवहारवाद की सीमाओं की ओर ध्यान दिलाया।
▪ डेविड ईस्टन का योगदान
उन्होंने कहा कि राजनीतिक विज्ञान को सामाजिक समस्याओं से जुड़ा होना चाहिए।
🌍 आधुनिक राजनीतिक विज्ञान में व्यवहारवादी दृष्टिकोण
आज भी—
-
चुनाव अध्ययन
-
जनमत सर्वेक्षण
-
राजनीतिक सहभागिता
जैसे क्षेत्रों में व्यवहारवादी दृष्टिकोण अत्यंत प्रासंगिक है।
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि व्यवहारवादी दृष्टिकोण ने राजनीतिक विज्ञान को एक नई वैज्ञानिक दिशा प्रदान की। इसने राजनीति को अमूर्त विचारों और संस्थागत विवरणों से निकालकर वास्तविक मानवीय व्यवहार के अध्ययन तक पहुँचाया। यद्यपि इसकी कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी आधुनिक राजनीतिक विज्ञान के विकास में व्यवहारवादी दृष्टिकोण की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। अतः यह दृष्टिकोण राजनीतिक विज्ञान को अधिक यथार्थवादी, विश्लेषणात्मक और अनुभवजन्य बनाने में सफल रहा है।
प्रश्न 04. राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत को समझाएँ।
🔰 भूमिका (Introduction)
राज्य की उत्पत्ति राजनीतिक विज्ञान का एक मूलभूत और जटिल प्रश्न है। यह जानने का प्रयास किया गया है कि मानव समाज ने किस प्रकार परिवार से जनजाति, जनजाति से कबीला और अंततः राज्य का रूप धारण किया। इसी क्रमिक विकास को स्पष्ट करने के लिए विकासवादी सिद्धांत (Evolutionary Theory) प्रस्तुत किया गया।
विकासवादी सिद्धांत के अनुसार राज्य किसी एक व्यक्ति, ईश्वर या अनुबंध का परिणाम नहीं है, बल्कि यह मानव समाज के प्राकृतिक और क्रमिक विकास का नतीजा है। यह सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति को एक दीर्घ ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समझाता है। प्रस्तुत उत्तर में राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या की गई है।
🧠 विकासवादी सिद्धांत की अवधारणा (Concept of Evolutionary Theory)
📌 विकासवादी सिद्धांत का अर्थ
विकासवादी सिद्धांत के अनुसार राज्य—
“मानव समाज के निरंतर, स्वाभाविक और क्रमिक विकास का परिणाम है।”
यह सिद्धांत राज्य को किसी अचानक घटना या समझौते का परिणाम नहीं मानता।
📜 विकासवादी सिद्धांत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस सिद्धांत का विकास 19वीं शताब्दी में हुआ।
▪ प्रमुख प्रेरणास्रोत
-
चार्ल्स डार्विन का विकासवाद
-
मानवशास्त्रीय अध्ययन
-
ऐतिहासिक अनुसंधान
▪ प्रमुख विचारक
-
हेनरी मेन
-
एडवर्ड जेंक्स
-
हर्बर्ट स्पेंसर
🌱 समाज से राज्य तक : विकास की प्रक्रिया
विकासवादी सिद्धांत के अनुसार राज्य की उत्पत्ति निम्नलिखित क्रमिक चरणों से होकर हुई—
👨👩👧 1. परिवार (Family)
मानव समाज की सबसे प्रारंभिक इकाई परिवार थी।
▪ पितृसत्तात्मक परिवार
हेनरी मेन के अनुसार प्रारंभिक समाज पितृसत्तात्मक था।
▪ परिवार में सत्ता
परिवार का मुखिया नियम बनाता और उनका पालन कराता था।
🏘️ 2. कुल (Clan)
कई परिवार मिलकर कुल का निर्माण करते थे।
▪ रक्त संबंध
कुल का आधार रक्त संबंध होता था।
▪ सामाजिक नियंत्रण
कुल प्रमुख के पास सीमित सत्ता होती थी।
🏕️ 3. जनजाति (Tribe)
कई कुल मिलकर जनजाति बनाते थे।
▪ क्षेत्रीय विस्तार
जनजाति एक निश्चित क्षेत्र में निवास करती थी।
▪ प्रथागत नियम
यहाँ परंपराएँ और रीति-रिवाज कानून का रूप लेते थे।
🏰 4. कबीला और ग्राम
जनजातियों के स्थायी होने से ग्राम और कबीले अस्तित्व में आए।
▪ भूमि स्वामित्व
भूमि और संसाधनों का महत्व बढ़ा।
▪ प्रशासनिक आवश्यकता
विवाद निपटारे और सुरक्षा के लिए नेतृत्व आवश्यक हुआ।
🏛️ 5. राज्य (State)
अंततः प्रशासनिक, सैन्य और न्यायिक संरचनाओं के विकास से राज्य का उदय हुआ।
▪ संगठित सत्ता
राज्य में सत्ता संस्थागत और स्थायी हो गई।
▪ कानून और शासन
परंपराएँ विधि का रूप लेने लगीं।
⭐ विकासवादी सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएँ
✔️ 1. क्रमिक विकास
राज्य का विकास अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे हुआ।
✔️ 2. प्राकृतिक प्रक्रिया
यह विकास मानव आवश्यकताओं के कारण स्वाभाविक रूप से हुआ।
✔️ 3. सामाजिक आधार
राज्य की जड़ें सामाजिक संस्थाओं में हैं।
✔️ 4. ऐतिहासिक प्रमाण
यह सिद्धांत ऐतिहासिक और मानवशास्त्रीय तथ्यों पर आधारित है।
✔️ 5. राज्य को जीवित संस्था मानना
राज्य को एक विकसित होने वाली संस्था माना गया।
🧩 विकासवादी सिद्धांत का महत्व
🌟 1. वैज्ञानिक दृष्टिकोण
यह सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति को वैज्ञानिक और तार्किक रूप में समझाता है।
🌟 2. अन्य सिद्धांतों का पूरक
दैवीय और सामाजिक अनुबंध सिद्धांत की सीमाओं को दूर करता है।
🌟 3. संस्थागत विकास की समझ
राज्य की संस्थाओं के विकास को स्पष्ट करता है।
⚖️ विकासवादी सिद्धांत की आलोचनाएँ
❌ 1. एकरूप विकास की धारणा
सभी समाजों में विकास का क्रम समान नहीं रहा।
❌ 2. अत्यधिक सामान्यीकरण
कुछ ऐतिहासिक उदाहरणों के आधार पर सार्वभौमिक निष्कर्ष।
❌ 3. सत्ता और संघर्ष की उपेक्षा
युद्ध और विजय जैसे कारकों को कम महत्व।
❌ 4. आधुनिक राज्य की जटिलता
आधुनिक राष्ट्र-राज्य की उत्पत्ति को पूरी तरह नहीं समझा पाता।
🌍 विकासवादी सिद्धांत और आधुनिक संदर्भ
आधुनिक शोध यह मानता है कि राज्य की उत्पत्ति में—
-
सामाजिक विकास
-
आर्थिक परिवर्तन
-
युद्ध और विजय
-
प्रशासनिक आवश्यकता
सभी का योगदान रहा है।
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि राज्य की उत्पत्ति का विकासवादी सिद्धांत राज्य को मानव समाज के स्वाभाविक और क्रमिक विकास का परिणाम मानता है। यह सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति को रहस्य या ईश्वरीय कृपा के बजाय सामाजिक आवश्यकताओं और ऐतिहासिक परिस्थितियों से जोड़ता है। यद्यपि इसकी कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी राज्य की उत्पत्ति को समझने में यह सिद्धांत एक ठोस और वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है। अतः राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन में विकासवादी सिद्धांत का महत्वपूर्ण स्थान है।
प्रश्न 5. राजनीतिक विज्ञान में संप्रभुता की अवधारणा का महत्व क्या है?
🔰 भूमिका (Introduction)
राजनीतिक विज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों में संप्रभुता (Sovereignty) की अवधारणा को केंद्रीय स्थान प्राप्त है। संप्रभुता के बिना राज्य की कल्पना अधूरी मानी जाती है, क्योंकि यही वह तत्व है जो राज्य को अन्य सामाजिक संस्थाओं से अलग करता है। संप्रभुता यह निर्धारित करती है कि किसी राज्य में सर्वोच्च सत्ता किसके पास है, उसकी सीमा क्या है और वह सत्ता किस प्रकार प्रयोग की जाती है।
इतिहास में संप्रभुता की अवधारणा ने राजतंत्र से लोकतंत्र, साम्राज्य से राष्ट्र-राज्य और औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र राज्यों तक की यात्रा में निर्णायक भूमिका निभाई है। प्रस्तुत उत्तर में राजनीतिक विज्ञान में संप्रभुता की अवधारणा के महत्व को विभिन्न आयामों में समझाया गया है।
🧠 संप्रभुता की अवधारणा (Concept of Sovereignty)
📌 संप्रभुता का अर्थ
संप्रभुता से आशय है—
“राज्य के भीतर सर्वोच्च, अंतिम और निरपेक्ष सत्ता।”
यह सत्ता किसी भी आंतरिक या बाह्य शक्ति के अधीन नहीं होती।
📖 संप्रभुता की परिभाषाएँ
विभिन्न राजनीतिक विचारकों ने संप्रभुता को भिन्न-भिन्न रूपों में परिभाषित किया है—
▪ जीन बोडिन के अनुसार
“संप्रभुता राज्य की स्थायी और निरपेक्ष शक्ति है।”
▪ ऑस्टिन के अनुसार
“संप्रभु वह है जिसकी आज्ञा का सामान्यतः पालन किया जाता है और जो स्वयं किसी की आज्ञा का पालन नहीं करता।”
इन परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि संप्रभुता राज्य की सर्वोच्च सत्ता का प्रतीक है।
⭐ संप्रभुता की प्रमुख विशेषताएँ
✔️ 1. सर्वोच्चता
संप्रभु सत्ता राज्य के भीतर सभी शक्तियों से ऊपर होती है।
✔️ 2. निरपेक्षता
संप्रभुता पर कोई आंतरिक प्रतिबंध नहीं होता।
✔️ 3. स्थायित्व
सरकार बदलने पर भी संप्रभुता बनी रहती है।
✔️ 4. सार्वभौमिकता
राज्य के सभी नागरिक और संस्थाएँ संप्रभु सत्ता के अधीन होती हैं।
🌍 राजनीतिक विज्ञान में संप्रभुता का महत्व
🏛️ 1. राज्य की पहचान का आधार
संप्रभुता राज्य की मौलिक विशेषता है।
▪ राज्य बनाम अन्य संगठन
परिवार, समाज या निगम संप्रभु नहीं होते।
⚖️ 2. कानून की वैधता का स्रोत
सभी कानूनों की वैधता संप्रभु सत्ता से आती है।
▪ विधि निर्माण
विधानमंडल संप्रभु शक्ति का प्रयोग करता है।
🗳️ 3. शासन व्यवस्था की स्पष्टता
संप्रभुता यह तय करती है कि शासन का अंतिम निर्णयकर्ता कौन है।
▪ लोकतंत्र में
जनता या संविधान को संप्रभु माना जाता है।
🛡️ 4. राष्ट्रीय स्वतंत्रता और संप्रभुता
संप्रभुता किसी भी राज्य की स्वतंत्रता का प्रतीक है।
▪ औपनिवेशिक शासन
संप्रभुता के अभाव में राज्य पराधीन हो जाता है।
🌐 5. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्व
संप्रभुता अंतरराष्ट्रीय संबंधों की आधारशिला है।
▪ समानता का सिद्धांत
सभी संप्रभु राज्य अंतरराष्ट्रीय कानून में समान माने जाते हैं।
🧠 6. राजनीतिक स्थिरता और व्यवस्था
संप्रभु सत्ता अराजकता को रोकने में सहायक होती है।
▪ सत्ता का केंद्रीकरण
अंतिम सत्ता होने से निर्णय स्पष्ट और प्रभावी होते हैं।
📜 7. संविधान और संप्रभुता
संप्रभुता संविधान में निहित होती है।
▪ भारतीय संदर्भ
भारतीय संविधान में “हम भारत के लोग” संप्रभुता का प्रतीक है।
🔄 8. संप्रभुता और लोकतंत्र
लोकतंत्र में संप्रभुता जनता से जुड़ी होती है।
▪ जनसंप्रभुता
शासन की वैधता जनसहमति पर आधारित होती है।
⚖️ संप्रभुता की आलोचनाएँ और सीमाएँ
❌ 1. निरपेक्षता की अवधारणा पर प्रश्न
आधुनिक युग में संप्रभुता पूर्णतः निरपेक्ष नहीं रह गई है।
❌ 2. वैश्वीकरण का प्रभाव
अंतरराष्ट्रीय संगठन संप्रभुता को सीमित करते हैं।
❌ 3. मानवाधिकार और संप्रभुता
राज्य मानवाधिकारों के नाम पर अपनी शक्ति सीमित करता है।
🌍 आधुनिक संदर्भ में संप्रभुता
🔹 साझा संप्रभुता
यूरोपीय संघ जैसे संगठन संप्रभुता के नए रूप प्रस्तुत करते हैं।
🔹 संवैधानिक संप्रभुता
संप्रभुता कानून और संविधान से नियंत्रित होती है।
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि संप्रभुता राजनीतिक विज्ञान की केन्द्रीय अवधारणा है, जिसके बिना राज्य और शासन की कल्पना संभव नहीं। यह राज्य को वैधता, स्वतंत्रता और स्थायित्व प्रदान करती है। यद्यपि आधुनिक युग में संप्रभुता की प्रकृति बदली है और उस पर कई सीमाएँ आई हैं, फिर भी उसका महत्व समाप्त नहीं हुआ है। अतः संप्रभुता आज भी राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन में एक अनिवार्य और मूलभूत सिद्धांत बनी हुई है।
प्रश्न 6. उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण के मुख्य विचारों का वर्णन करें।
🔰 भूमिका (Introduction)
20वीं शताब्दी के मध्य में व्यवहारवादी दृष्टिकोण (Behavioural Approach) ने राजनीतिक विज्ञान को वैज्ञानिक, अनुभवजन्य और वस्तुनिष्ठ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परंतु समय के साथ यह स्पष्ट होने लगा कि व्यवहारवाद राजनीति को केवल आँकड़ों, सर्वेक्षणों और तथ्यों तक सीमित कर रहा है तथा मूल्य, नैतिकता, सामाजिक समस्याओं और जनहित जैसे प्रश्नों की उपेक्षा कर रहा है।
इसी पृष्ठभूमि में 1960 के दशक के उत्तरार्ध में उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण (Post-Behavioural Approach) का उदय हुआ। यह दृष्टिकोण व्यवहारवाद की आलोचना करते हुए यह मानता है कि राजनीतिक विज्ञान केवल “क्या है” तक सीमित न रहे, बल्कि “क्या होना चाहिए” पर भी विचार करे। प्रस्तुत उत्तर में उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण के मुख्य विचारों का विस्तार से वर्णन किया गया है।
🧠 उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण की अवधारणा
(Concept of Post-Behavioural Approach)
📌 उत्तर-व्यवहारवाद का अर्थ
उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण का आशय उस वैचारिक आंदोलन से है, जो व्यवहारवाद के अत्यधिक वैज्ञानिकता, मूल्य-तटस्थता और सामाजिक निरपेक्षता के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया।
▪ सरल शब्दों में
उत्तर-व्यवहारवाद कहता है—
“राजनीतिक विज्ञान केवल तथ्यों का अध्ययन नहीं, बल्कि समाज की समस्याओं के समाधान का माध्यम भी होना चाहिए।”
📜 उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण की पृष्ठभूमि
उत्तर-व्यवहारवादी आंदोलन का विकास विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों में हुआ।
▪ 1960 का दशक
-
नागरिक अधिकार आंदोलन
-
वियतनाम युद्ध
-
नस्लीय भेदभाव
-
गरीबी और असमानता
इन समस्याओं ने यह प्रश्न खड़ा किया कि यदि राजनीतिक विज्ञान समाज की वास्तविक समस्याओं से मुँह मोड़ ले, तो उसकी उपयोगिता क्या रह जाती है?
🧑🏫 डेविड ईस्टन की भूमिका
उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण के प्रमुख प्रवर्तक डेविड ईस्टन माने जाते हैं।
▪ ईस्टन का कथन
डेविड ईस्टन ने 1969 में कहा—
“Political science must be relevant and action-oriented.”
उन्होंने व्यवहारवाद की सीमाओं को उजागर करते हुए उत्तर-व्यवहारवाद की बुनियाद रखी।
⭐ उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण के मुख्य विचार
🟢 1. प्रासंगिकता पर बल (Relevance)
उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण का सबसे महत्वपूर्ण विचार यह है कि राजनीतिक विज्ञान समाज के लिए प्रासंगिक होना चाहिए।
▪ सामाजिक समस्याओं से जुड़ाव
राजनीतिक अध्ययन का उद्देश्य—
-
गरीबी
-
असमानता
-
शोषण
-
हिंसा
जैसी समस्याओं को समझना और उनके समाधान सुझाना होना चाहिए।
🔵 2. मूल्य-तटस्थता की अस्वीकृति
व्यवहारवादी दृष्टिकोण मूल्य-तटस्थता पर जोर देता था, जिसे उत्तर-व्यवहारवाद ने अस्वीकार किया।
▪ मूल्य और नैतिकता का महत्व
उत्तर-व्यवहारवादी मानते हैं कि—
-
राजनीति मूलतः मूल्य-आधारित है
-
न्याय, स्वतंत्रता और समानता जैसे मूल्यों की अनदेखी नहीं की जा सकती
🟣 3. कार्योन्मुख राजनीतिक विज्ञान (Action-Oriented)
उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण केवल विश्लेषण तक सीमित नहीं रहता।
▪ सिद्धांत से व्यवहार
राजनीतिक सिद्धांतों को—
-
नीतियों में
-
सामाजिक सुधारों में
-
लोकतांत्रिक आंदोलनों में
लागू किया जाना चाहिए।
🟠 4. मानव कल्याण पर बल
इस दृष्टिकोण में राजनीतिक विज्ञान का अंतिम लक्ष्य मानव कल्याण माना गया है।
▪ सत्ता नहीं, समाज केंद्र में
राजनीति का उद्देश्य—
-
मानव गरिमा
-
सामाजिक न्याय
-
जीवन की गुणवत्ता
को बेहतर बनाना होना चाहिए।
🔴 5. सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना
उत्तर-व्यवहारवादी विद्वान राजनीतिक वैज्ञानिक को समाज के प्रति उत्तरदायी बुद्धिजीवी मानते हैं।
▪ विद्वानों की भूमिका
राजनीतिक वैज्ञानिक—
-
केवल प्रेक्षक न बनें
-
बल्कि अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाएँ
🟡 6. व्यवहारवाद की विधियों का सीमित उपयोग
उत्तर-व्यवहारवाद व्यवहारवाद को पूर्णतः अस्वीकार नहीं करता।
▪ संतुलित दृष्टिकोण
-
आँकड़े और सर्वेक्षण उपयोगी हैं
-
परंतु वे साधन हैं, उद्देश्य नहीं
🧠 7. समग्र दृष्टिकोण (Holistic Approach)
उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण राजनीति को केवल एक प्रणाली के रूप में नहीं देखता।
▪ व्यापक अध्ययन
इसमें शामिल हैं—
-
सामाजिक संरचना
-
आर्थिक असमानता
-
सांस्कृतिक संदर्भ
-
ऐतिहासिक अनुभव
🌍 8. लोकतंत्र और भागीदारी पर बल
उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण लोकतंत्र को केवल संस्थागत ढाँचे तक सीमित नहीं मानता।
▪ सक्रिय नागरिक
-
जनभागीदारी
-
जनआंदोलन
-
सामाजिक चेतना
लोकतंत्र के अनिवार्य तत्व माने जाते हैं।
⚖️ उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण का महत्व
🌟 सकारात्मक योगदान
-
राजनीतिक विज्ञान को सामाजिक सरोकारों से जोड़ा
-
नैतिकता और मूल्यों को पुनः स्थापित किया
-
व्यवहारवाद की एकांगी सोच को संतुलित किया
❌ आलोचनाएँ
उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण की भी कुछ सीमाएँ हैं—
▪ अत्यधिक आदर्शवाद
कुछ विद्वानों के अनुसार यह दृष्टिकोण व्यावहारिक राजनीति से दूर चला जाता है।
▪ वैज्ञानिकता में कमी
मूल्यों पर अधिक बल देने से वस्तुनिष्ठता प्रभावित हो सकती है।
🔄 व्यवहारवाद और उत्तर-व्यवहारवाद : तुलनात्मक संकेत
▪ व्यवहारवाद
-
तथ्य और आँकड़े
-
मूल्य-तटस्थता
-
वैज्ञानिक पद्धति
▪ उत्तर-व्यवहारवाद
-
मूल्य और नैतिकता
-
सामाजिक प्रासंगिकता
-
मानव कल्याण
🌍 आधुनिक राजनीतिक विज्ञान में उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण
आज के समय में—
-
मानवाधिकार
-
पर्यावरण राजनीति
-
लैंगिक समानता
-
सामाजिक न्याय
जैसे विषय उत्तर-व्यवहारवादी सोच से प्रेरित हैं।
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण राजनीतिक विज्ञान के विकास की एक महत्वपूर्ण और आवश्यक अवस्था है। इसने राजनीतिक विज्ञान को केवल तथ्यों और आँकड़ों के अध्ययन से निकालकर मानव, समाज और नैतिक मूल्यों से जोड़ा। यद्यपि यह व्यवहारवाद की वैज्ञानिकता को पूरी तरह अस्वीकार नहीं करता, फिर भी यह स्पष्ट करता है कि राजनीतिक विज्ञान तब तक पूर्ण नहीं हो सकता, जब तक वह समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान में योगदान न दे। अतः उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण ने राजनीतिक विज्ञान को अधिक मानवीय, प्रासंगिक और उद्देश्यपूर्ण बनाया है।
प्रश्न 07. राजनीतिक संदर्भ में अधिकार और शक्ति में क्या अंतर है?
🔰 भूमिका (Introduction)
राजनीतिक विज्ञान में अधिकार (Authority) और शक्ति (Power) दो ऐसी मूलभूत अवधारणाएँ हैं, जिनके बिना राजनीति, राज्य और शासन की सही समझ संभव नहीं है। अक्सर दैनिक भाषा में इन दोनों शब्दों का प्रयोग एक-दूसरे के स्थान पर कर लिया जाता है, परंतु राजनीतिक संदर्भ में अधिकार और शक्ति समान नहीं हैं।
जहाँ शक्ति बल, प्रभाव या क्षमता से जुड़ी होती है, वहीं अधिकार वैधता, स्वीकृति और नैतिकता से संबंधित होता है। किसी भी राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता और वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि शक्ति को अधिकार में किस हद तक परिवर्तित किया गया है। प्रस्तुत उत्तर में राजनीतिक दृष्टि से अधिकार और शक्ति की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए इनके बीच के अंतर का विस्तार से विश्लेषण किया गया है।
🧠 शक्ति की अवधारणा (Concept of Power)
📌 शक्ति का अर्थ
राजनीतिक विज्ञान में शक्ति से आशय है—
“दूसरों के व्यवहार को प्रभावित करने या नियंत्रित करने की क्षमता।”
शक्ति का प्रयोग सहमति से भी हो सकता है और बलपूर्वक भी।
📖 शक्ति की परिभाषाएँ
▪ मैक्स वेबर के अनुसार
“शक्ति वह संभावना है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति सामाजिक संबंधों में दूसरों की इच्छा के विरुद्ध भी अपनी इच्छा थोप सकता है।”
▪ रॉबर्ट डाहल के अनुसार
“A has power over B to the extent that A can get B to do something B would not otherwise do.”
इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि शक्ति का संबंध प्रभाव, दबाव और नियंत्रण से है।
⚙️ शक्ति के स्रोत
राजनीतिक शक्ति विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न हो सकती है—
▪ बल और दमन
सेना, पुलिस और हिंसा।
▪ आर्थिक संसाधन
धन, उद्योग और संपत्ति।
▪ सामाजिक प्रभाव
जाति, वर्ग, धर्म या मीडिया।
▪ संगठन और संख्या
राजनीतिक दल, आंदोलन और समूह।
🏛️ शक्ति की विशेषताएँ
-
यह वैध भी हो सकती है और अवैध भी
-
यह अस्थायी हो सकती है
-
इसका प्रयोग दबाव या भय से किया जा सकता है
🧩 अधिकार की अवधारणा (Concept of Authority)
📌 अधिकार का अर्थ
अधिकार से आशय है—
“वैध और स्वीकृत शक्ति, जिसका पालन लोग स्वेच्छा से करते हैं।”
अधिकार में शक्ति तो होती है, परंतु उसके साथ वैधता (Legitimacy) भी जुड़ी होती है।
📖 अधिकार की परिभाषाएँ
▪ मैक्स वेबर के अनुसार
“अधिकार वह शक्ति है जिसे वैध मानकर लोग स्वेच्छा से स्वीकार करते हैं।”
▪ लास्की के अनुसार
“अधिकार वह शक्ति है जिसे समाज द्वारा मान्यता प्राप्त हो।”
🏛️ अधिकार के प्रकार (मैक्स वेबर के अनुसार)
🟢 1. परंपरागत अधिकार
रीति-रिवाज और परंपरा पर आधारित
▪ उदाहरण: राजा, मुखिया
🔵 2. करिश्माई अधिकार
व्यक्तित्व और नेतृत्व क्षमता पर आधारित
▪ उदाहरण: गांधी, नेल्सन मंडेला
🟣 3. कानूनी–तार्किक अधिकार
कानून और संविधान पर आधारित
▪ उदाहरण: लोकतांत्रिक सरकार
⭐ अधिकार की विशेषताएँ
-
वैधता पर आधारित
-
स्वीकृति और सहमति से जुड़ा
-
स्थिर और दीर्घकालिक
-
दमन की आवश्यकता कम
⚖️ अधिकार और शक्ति के बीच संबंध
अधिकार और शक्ति परस्पर जुड़े हुए हैं, किंतु समान नहीं।
▪ शक्ति + वैधता = अधिकार
▪ वैधता के बिना शक्ति = दमन
राज्य का लक्ष्य यही होता है कि शक्ति को अधिकार में परिवर्तित किया जाए।
🔍 राजनीतिक संदर्भ में अधिकार और शक्ति का अंतर
📌 1. वैधता का आधार
-
शक्ति: वैध हो भी सकती है, नहीं भी
-
अधिकार: अनिवार्य रूप से वैध
📌 2. स्वीकृति बनाम दबाव
-
शक्ति: भय, दबाव या बल पर आधारित
-
अधिकार: सहमति और स्वीकृति पर आधारित
📌 3. स्थायित्व
-
शक्ति: अस्थायी और परिवर्तनशील
-
अधिकार: अपेक्षाकृत स्थायी
📌 4. शासन में भूमिका
-
शक्ति: शासन चलाने का साधन
-
अधिकार: शासन को वैध बनाने का आधार
📌 5. लोकतांत्रिक संदर्भ
-
शक्ति: चुनाव, धन या बल से प्राप्त हो सकती है
-
अधिकार: संविधान और जनता की सहमति से प्राप्त
📌 6. नैतिक आधार
-
शक्ति: नैतिक हो भी सकती है, नहीं भी
-
अधिकार: नैतिक और वैधानिक दोनों
📌 7. उदाहरण द्वारा स्पष्टता
-
तानाशाह के पास शक्ति होती है, पर अधिकार नहीं
-
लोकतांत्रिक सरकार के पास शक्ति भी होती है और अधिकार भी
🏛️ लोकतंत्र में अधिकार और शक्ति
लोकतांत्रिक शासन का आधार ही यह है कि—
▪ शक्ति जनता से आती है
▪ अधिकार संविधान से मिलता है
यदि सरकार शक्ति का प्रयोग करे पर अधिकार खो दे, तो वह शासन अवैध और अस्थिर हो जाता है।
🌍 आधुनिक राजनीति में अधिकार और शक्ति
🔹 वैश्वीकरण
राज्य की शक्ति सीमित हुई है, पर अधिकार बना हुआ है।
🔹 मीडिया और जनमत
मीडिया के पास शक्ति है, पर हमेशा अधिकार नहीं।
🔹 जनआंदोलन
जनआंदोलनों के पास नैतिक अधिकार हो सकता है, भले ही संस्थागत शक्ति न हो।
⚖️ शक्ति बिना अधिकार : परिणाम
-
दमन
-
अस्थिरता
-
विद्रोह
-
वैधता संकट
🌟 अधिकार बिना शक्ति : परिणाम
-
निर्णय लागू करने में असमर्थता
-
कमजोर शासन
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि शक्ति और अधिकार राजनीतिक जीवन के दो अलग किंतु परस्पर संबंधित तत्व हैं। शक्ति केवल दूसरों को नियंत्रित करने की क्षमता है, जबकि अधिकार उस शक्ति को वैधता और स्वीकृति प्रदान करता है। राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता, प्रभावशीलता और नैतिकता इस बात पर निर्भर करती है कि शक्ति को अधिकार में किस हद तक बदला गया है। अतः एक आदर्श राजनीतिक व्यवस्था वही है, जहाँ शक्ति का प्रयोग अधिकार के रूप में, न कि दमन के रूप में किया जाए।
प्रश्न 08. अभिजात वर्ग के सिद्धांत के अनुसार लोकतंत्र की अवधारणा का संक्षेप में वर्णन करें।
🔰 भूमिका (Introduction)
लोकतंत्र की परंपरागत अवधारणा में यह माना जाता है कि सत्ता जनता के हाथों में निहित होती है और जनता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शासन करती है। किंतु अभिजात वर्ग का सिद्धांत (Elite Theory) इस आदर्श लोकतांत्रिक धारणा को चुनौती देता है। इस सिद्धांत के अनुसार व्यवहार में लोकतंत्र कभी भी पूर्ण रूप से “जनशासन” नहीं होता, बल्कि यह कुछ चुने हुए प्रभावशाली व्यक्तियों या समूहों द्वारा संचालित होता है।
अतः अभिजात वर्ग के सिद्धांत में लोकतंत्र को एक आदर्श नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक व्यवस्था के रूप में समझा जाता है।
🧠 अभिजात वर्ग सिद्धांत का आधार
अभिजात वर्ग सिद्धांत इस मान्यता पर आधारित है कि—
-
हर समाज में एक अल्पसंख्यक संगठित वर्ग होता है
-
वही वास्तविक सत्ता और निर्णय प्रक्रिया पर नियंत्रण रखता है
-
बहुसंख्यक जनता अपेक्षाकृत असंगठित होती है
इस दृष्टिकोण को प्रमुख रूप से पेरेटो, मोस्का और रॉबर्ट मिशेल्स ने विकसित किया।
🏛️ अभिजात वर्ग के अनुसार लोकतंत्र की अवधारणा
🔹 1. लोकतंत्र = अभिजात वर्गों के बीच प्रतिस्पर्धा
अभिजात वर्ग सिद्धांत के अनुसार लोकतंत्र का अर्थ जनता का प्रत्यक्ष शासन नहीं, बल्कि—
“विभिन्न अभिजात वर्गों के बीच सत्ता के लिए शांतिपूर्ण प्रतिस्पर्धा।”
जनता इस प्रतिस्पर्धा में निर्णायक नहीं, बल्कि चयनकर्ता की भूमिका निभाती है।
🔹 2. जनता की सीमित भूमिका
इस सिद्धांत के अनुसार—
-
जनता नीतियाँ नहीं बनाती
-
वह केवल चुनावों के माध्यम से
-
एक अभिजात वर्ग को हटाकर
-
दूसरे अभिजात वर्ग को सत्ता सौंपती है
-
अतः लोकतंत्र में जनता की भूमिका सक्रिय शासनकर्ता की नहीं, बल्कि अनुमोदक (Approver) की होती है।
🔹 3. नेतृत्व का केंद्रीकरण
अभिजात वर्ग सिद्धांत मानता है कि—
-
शासन चलाने के लिए
-
विशेषज्ञता, अनुभव और संगठन आवश्यक है
ये गुण सामान्य जनता में नहीं, बल्कि अभिजात वर्ग में पाए जाते हैं।
इसलिए लोकतंत्र में भी सत्ता नेतृत्व के हाथों में केंद्रित रहती है।
🔹 4. “अभिजात लोकतंत्र” की अवधारणा
अभिजात वर्ग सिद्धांत लोकतंत्र को एक विशेष रूप में परिभाषित करता है, जिसे कहा जाता है—
Elite Democracy (अभिजात लोकतंत्र)
इसमें—
-
लोकतांत्रिक संस्थाएँ मौजूद रहती हैं
-
चुनाव होते हैं
-
परंतु वास्तविक निर्णय सीमित समूह द्वारा लिए जाते हैं
🔹 5. लौह नियम और लोकतंत्र
रॉबर्ट मिशेल्स का “अल्पतंत्र का लौह नियम” इस अवधारणा को और स्पष्ट करता है।
“हर लोकतांत्रिक संगठन अंततः अल्पतंत्र में बदल जाता है।”
अर्थात् राजनीतिक दल, संसद और संगठन—सभी में सत्ता कुछ नेताओं तक सिमट जाती है।
⚖️ अभिजात वर्ग सिद्धांत की लोकतंत्र पर दृष्टि
🌟 सकारात्मक पक्ष
-
लोकतंत्र की व्यावहारिक वास्तविकता को उजागर करता है
-
नेतृत्व और संगठन के महत्व को स्पष्ट करता है
-
भीड़तंत्र से लोकतंत्र की रक्षा करता है
❌ सीमाएँ
-
जनता की राजनीतिक क्षमता को कम आँकता है
-
लोकतंत्र के आदर्श पक्ष की उपेक्षा करता है
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में कहा जा सकता है कि अभिजात वर्ग के सिद्धांत के अनुसार लोकतंत्र जनता का प्रत्यक्ष शासन नहीं, बल्कि अभिजात वर्गों के बीच प्रतिस्पर्धा की व्यवस्था है। इसमें जनता सत्ता का प्रयोग नहीं करती, बल्कि समय-समय पर शासक अभिजात वर्ग का चयन करती है। इस प्रकार अभिजात वर्ग सिद्धांत लोकतंत्र को एक आदर्श नहीं, बल्कि यथार्थवादी और व्यावहारिक व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करता है।
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