प्रश्न 01. शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट करते हुए किन्हीं दो प्रमुख संप्रदायों का वर्णन कीजिए।
शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षक, विद्यार्थी और सीखने की प्रक्रिया को समझने का विज्ञान है। जब हम कक्षा में पढ़ाते हैं, तब हर विद्यार्थी अलग होता है। किसी की बुद्धि तेज होती है। कोई धीरे सीखता है। कोई जल्दी भूल जाता है। कोई बहुत सक्रिय होता है। इन सब बातों को समझने में जो विज्ञान हमारी सहायता करता है, वही शिक्षा मनोविज्ञान है।
सरल शब्दों में कहें तो शिक्षा मनोविज्ञान वह शाखा है जो यह बताती है कि बच्चा कैसे सीखता है, शिक्षक कैसे पढ़ाए, और सीखने की प्रक्रिया को प्रभावी कैसे बनाया जाए। यह शिक्षा और मनोविज्ञान का मिलाजुला रूप है।
अब हम इसके अर्थ और फिर दो प्रमुख संप्रदायों को विस्तार से समझेंगे।
📌 शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ
शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जो शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का वैज्ञानिक अध्ययन करती है। यह जानने का प्रयास करती है कि सीखना कैसे होता है, किन परिस्थितियों में बेहतर होता है और किन कारणों से बाधित होता है।
🔹 शिक्षा मनोविज्ञान की सरल परिभाषा
शिक्षा मनोविज्ञान वह विज्ञान है जो विद्यार्थियों के व्यवहार, उनकी मानसिक क्षमताओं, रुचियों, अभिरुचियों और सीखने की प्रक्रिया का अध्ययन करता है।
🔹 शिक्षा मनोविज्ञान के मुख्य तत्व
🔸 1. बालक का अध्ययन
यह बालक की बुद्धि, स्मृति, कल्पना, ध्यान, भावनाएँ और व्यक्तित्व का अध्ययन करता है।
🔸 2. सीखने की प्रक्रिया
यह समझता है कि सीखना कैसे होता है। अभ्यास, अनुभव और वातावरण का क्या प्रभाव पड़ता है।
🔸 3. शिक्षक की भूमिका
एक शिक्षक किस प्रकार पढ़ाए कि छात्र अधिक समझें और याद रखें।
🔸 4. मूल्यांकन
विद्यार्थी की प्रगति को कैसे मापा जाए।
📌 शिक्षा मनोविज्ञान की आवश्यकता
शिक्षा मनोविज्ञान केवल सिद्धांत नहीं है। यह व्यवहार में उपयोगी है।
🔹 1. छात्र को समझने में सहायता
हर छात्र अलग होता है। शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षक को यह समझने में मदद करता है।
🔹 2. प्रभावी शिक्षण
कौन-सी विधि अधिक प्रभावी है, यह शिक्षा मनोविज्ञान बताता है।
🔹 3. अनुशासन की समस्या
विद्यार्थियों के व्यवहार को समझकर अनुशासन स्थापित किया जा सकता है।
🔹 4. पाठ्यक्रम निर्माण
विद्यार्थियों की आयु और क्षमता के अनुसार पाठ्यक्रम तैयार किया जाता है।
अब हम शिक्षा मनोविज्ञान के दो प्रमुख संप्रदायों का अध्ययन करेंगे।
📌 व्यवहारवादी संप्रदाय (Behaviorism)
यह संप्रदाय मानता है कि मनुष्य का व्यवहार ही अध्ययन का मुख्य विषय होना चाहिए। मन के अंदर क्या चल रहा है, यह दिखाई नहीं देता। इसलिए केवल दिखाई देने वाले व्यवहार का अध्ययन किया जाना चाहिए।
🔹 प्रमुख विचार
व्यवहार अभ्यास और अनुभव से बनता है। यदि किसी व्यवहार को पुरस्कार मिले तो वह मजबूत होता है। यदि दंड मिले तो वह कम होता है।
🔹 मुख्य विशेषताएँ
🔸 1. सीखना = आदत निर्माण
सीखना बार-बार अभ्यास करने से होता है।
🔸 2. पुरस्कार और दंड का महत्व
अच्छे व्यवहार को प्रोत्साहन दिया जाए। गलत व्यवहार को रोका जाए।
🔸 3. वातावरण की भूमिका
पर्यावरण सीखने में बहुत महत्वपूर्ण है।
🔹 शिक्षा में महत्व
शिक्षक अभ्यास पर जोर देता है।
सही उत्तर पर प्रशंसा करता है।
गलत उत्तर पर सुधार करवाता है।
इस प्रकार व्यवहारवादी संप्रदाय शिक्षा को अधिक व्यवस्थित और नियंत्रित बनाता है।
📌 गेस्टाल्ट संप्रदाय (Gestalt School)
गेस्टाल्ट शब्द का अर्थ है “पूर्ण रूप” या “समग्रता”। इस संप्रदाय का मानना है कि हम चीजों को टुकड़ों में नहीं, बल्कि पूरे रूप में समझते हैं।
🔹 मुख्य विचार
सीखना अचानक अंतर्दृष्टि से भी हो सकता है। जब छात्र को समस्या का हल अचानक समझ में आ जाता है, तो उसे अंतर्दृष्टि कहते हैं।
🔹 प्रमुख विशेषताएँ
🔸 1. समग्रता का सिद्धांत
पूरा चित्र समझे बिना सीखना अधूरा है।
🔸 2. अंतर्दृष्टि (Insight Learning)
सीखना केवल अभ्यास से नहीं, बल्कि समझ से भी होता है।
🔸 3. समस्या समाधान पर बल
छात्र को सोचने का अवसर दिया जाए।
🔹 शिक्षा में महत्व
शिक्षक पूरा पाठ पहले समझाता है।
उदाहरणों के माध्यम से समझ विकसित करता है।
छात्रों को सोचने और प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करता है।
इस प्रकार गेस्टाल्ट संप्रदाय रचनात्मक और समझ आधारित शिक्षा पर जोर देता है।
📌 व्यवहारवादी और गेस्टाल्ट संप्रदाय में अंतर
🔹 व्यवहारवादी संप्रदाय
अभ्यास और आदत पर जोर
पुरस्कार और दंड महत्वपूर्ण
बाहरी व्यवहार पर ध्यान
🔹 गेस्टाल्ट संप्रदाय
समझ और अंतर्दृष्टि पर जोर
समस्या समाधान महत्वपूर्ण
समग्र दृष्टिकोण
📌 निष्कर्ष
शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षा का वैज्ञानिक आधार है। यह शिक्षक को छात्र को समझने की दृष्टि देता है। इससे शिक्षण अधिक प्रभावी बनता है।
व्यवहारवादी संप्रदाय हमें सिखाता है कि अभ्यास और वातावरण से व्यवहार बनता है। गेस्टाल्ट संप्रदाय हमें बताता है कि समझ और अंतर्दृष्टि भी सीखने में महत्वपूर्ण हैं।
दोनों संप्रदाय शिक्षा के क्षेत्र में उपयोगी हैं। एक अभ्यास पर जोर देता है। दूसरा समझ पर। एक बाहरी व्यवहार को महत्व देता है। दूसरा आंतरिक सोच को।
प्रश्न 02. मानव विकास की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन कीजिए।
मानव विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। यह जन्म से पहले शुरू होती है और जीवन के अंतिम क्षण तक चलती रहती है। हर अवस्था में शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक परिवर्तन होते हैं। इसलिए मानव विकास को समझना बहुत आवश्यक है। विशेष रूप से शिक्षा और मनोविज्ञान के क्षेत्र में यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जब हम मानव विकास की अवस्थाओं की बात करते हैं, तो हम यह समझते हैं कि जीवन को अलग-अलग चरणों में बाँटकर अध्ययन करना आसान हो जाता है। हर अवस्था की अपनी विशेषताएँ, समस्याएँ और आवश्यकताएँ होती हैं।
अब हम मानव विकास की विभिन्न अवस्थाओं को क्रमबद्ध और सरल भाषा में समझेंगे।
📌 मानव विकास का अर्थ
मानव विकास का अर्थ है व्यक्ति के जीवन में होने वाले क्रमिक और निरंतर परिवर्तन। ये परिवर्तन शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर होते हैं।
🔹 विकास की मुख्य विशेषताएँ
🔸 1. निरंतर प्रक्रिया
विकास कभी रुकता नहीं है। यह जीवन भर चलता है।
🔸 2. क्रमबद्धता
विकास एक निश्चित क्रम में होता है। बच्चा पहले बैठना सीखता है, फिर चलना।
🔸 3. व्यक्तिगत भिन्नता
हर व्यक्ति की विकास गति अलग होती है।
🔸 4. समग्रता
विकास केवल शरीर का नहीं, बल्कि मन और व्यवहार का भी होता है।
अब हम मानव विकास की प्रमुख अवस्थाओं को समझते हैं।
📌 गर्भावस्था (Prenatal Stage)
यह अवस्था जन्म से पहले की होती है। यह गर्भधारण से लेकर जन्म तक लगभग नौ महीने की होती है।
🔹 मुख्य विशेषताएँ
🔸 1. तीव्र शारीरिक विकास
शिशु का शरीर बनता है। अंगों का निर्माण होता है।
🔸 2. माता के स्वास्थ्य का प्रभाव
माँ का भोजन, स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति शिशु के विकास को प्रभावित करते हैं।
🔸 3. संवेदनशील अवस्था
इस समय छोटी-सी लापरवाही भी हानिकारक हो सकती है।
यह अवस्था भविष्य के विकास की नींव रखती है।
📌 शैशवावस्था (Infancy) – जन्म से 2 वर्ष तक
यह जीवन की प्रारंभिक अवस्था है। बच्चा पूरी तरह दूसरों पर निर्भर होता है।
🔹 मुख्य विशेषताएँ
🔸 1. तीव्र शारीरिक वृद्धि
लंबाई और वजन तेजी से बढ़ते हैं।
🔸 2. इंद्रिय विकास
देखना, सुनना और छूना सीखता है।
🔸 3. भाषा की शुरुआत
बच्चा बोलना शुरू करता है।
🔸 4. भावनात्मक लगाव
माता-पिता से गहरा जुड़ाव बनता है।
यह अवस्था प्रेम और सुरक्षा की भावना विकसित करती है।
📌 बाल्यावस्था (Childhood) – 2 से 12 वर्ष
यह अवस्था दो भागों में बाँटी जाती है — प्रारंभिक बाल्यावस्था और उत्तर बाल्यावस्था।
🔹 प्रारंभिक बाल्यावस्था (2–6 वर्ष)
🔸 1. खेल की प्रधानता
बच्चा खेल के माध्यम से सीखता है।
🔸 2. कल्पनाशक्ति का विकास
कहानी और कल्पना में रुचि।
🔸 3. भाषा में वृद्धि
शब्दावली बढ़ती है।
🔹 उत्तर बाल्यावस्था (6–12 वर्ष)
🔸 1. विद्यालय जीवन
औपचारिक शिक्षा की शुरुआत।
🔸 2. तर्क शक्ति का विकास
सोचने और समझने की क्षमता बढ़ती है।
🔸 3. सामाजिक संबंध
दोस्त बनाना और समूह में रहना सीखता है।
यह अवस्था व्यक्तित्व निर्माण की आधारशिला रखती है।
📌 किशोरावस्था (Adolescence) – 12 से 18 वर्ष
यह अवस्था परिवर्तन की अवस्था कहलाती है। इसे “संक्रमण काल” भी कहते हैं।
🔹 मुख्य विशेषताएँ
🔸 1. शारीरिक परिवर्तन
कद बढ़ना, स्वर परिवर्तन, यौन परिपक्वता।
🔸 2. भावनात्मक उतार-चढ़ाव
मूड जल्दी बदलता है।
🔸 3. आत्म-चेतना
स्वयं की पहचान खोजने का प्रयास।
🔸 4. स्वतंत्रता की इच्छा
निर्णय स्वयं लेना चाहता है।
यह अवस्था चुनौतीपूर्ण होती है। सही मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है।
📌 युवावस्था (Adulthood) – 18 से 40 वर्ष
यह जीवन की सक्रिय अवस्था है। व्यक्ति जिम्मेदारियों को निभाना शुरू करता है।
🔹 मुख्य विशेषताएँ
🔸 1. शारीरिक पूर्णता
शरीर पूरी तरह विकसित होता है।
🔸 2. करियर और रोजगार
व्यवसाय या नौकरी की शुरुआत।
🔸 3. विवाह और परिवार
नए संबंधों की स्थापना।
🔸 4. सामाजिक जिम्मेदारी
समाज में सक्रिय भूमिका।
यह अवस्था स्थिरता और जिम्मेदारी की होती है।
📌 प्रौढ़ावस्था (Middle Age) – 40 से 60 वर्ष
यह अवस्था अनुभव और परिपक्वता की होती है।
🔹 मुख्य विशेषताएँ
🔸 1. शारीरिक परिवर्तन
शक्ति में धीरे-धीरे कमी।
🔸 2. अनुभव की समृद्धि
जीवन का गहरा अनुभव।
🔸 3. सामाजिक प्रतिष्ठा
समाज में सम्मान।
🔸 4. बच्चों का भविष्य
संतानों की शिक्षा और विवाह की चिंता।
यह अवस्था संतुलन और समझ की होती है।
📌 वृद्धावस्था (Old Age) – 60 वर्ष के बाद
यह जीवन का अंतिम चरण है।
🔹 मुख्य विशेषताएँ
🔸 1. शारीरिक कमजोरी
स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ सकती हैं।
🔸 2. अनुभव और ज्ञान
जीवन का व्यापक अनुभव।
🔸 3. सामाजिक निर्भरता
दूसरों पर निर्भरता बढ़ सकती है।
🔸 4. आत्मचिंतन
जीवन की उपलब्धियों पर विचार।
इस अवस्था में सम्मान और देखभाल की आवश्यकता होती है।
📌 मानव विकास का समग्र दृष्टिकोण
मानव विकास को केवल शारीरिक परिवर्तन तक सीमित नहीं समझना चाहिए। यह मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक परिवर्तन का भी अध्ययन है।
🔹 विकास के चार मुख्य आयाम
🔸 1. शारीरिक विकास
ऊँचाई, वजन और अंगों की वृद्धि।
🔸 2. मानसिक विकास
सोचने और समझने की क्षमता।
🔸 3. भावनात्मक विकास
भावनाओं को नियंत्रित करना।
🔸 4. सामाजिक विकास
समाज में व्यवहार और संबंध।
इन सभी आयामों का संतुलित विकास आवश्यक है।
📌 निष्कर्ष
मानव विकास एक सतत और क्रमबद्ध प्रक्रिया है। यह गर्भावस्था से शुरू होकर वृद्धावस्था तक चलता है। हर अवस्था की अपनी विशेषताएँ और आवश्यकताएँ होती हैं।
यदि हम प्रत्येक अवस्था को सही ढंग से समझें, तो हम बेहतर शिक्षा, उचित मार्गदर्शन और संतुलित जीवन प्रदान कर सकते हैं।
अतः मानव विकास की अवस्थाओं का ज्ञान केवल शिक्षकों के लिए ही नहीं, बल्कि माता-पिता और समाज के हर व्यक्ति के लिए आवश्यक है। यही ज्ञान हमें एक संवेदनशील और जागरूक समाज बनाने में सहायता करता है।
प्रश्न 03. व्यक्तित्व मापन की प्रक्षेपण प्रविधियों का उल्लेख कीजिए।
व्यक्तित्व मनुष्य के व्यवहार, सोच, भावनाओं और आदतों का समग्र रूप है। हर व्यक्ति अलग होता है। किसी का स्वभाव शांत होता है। कोई बहुत मिलनसार होता है। कोई जल्दी क्रोधित हो जाता है। इन सब विशेषताओं को मिलाकर हम उसके व्यक्तित्व की पहचान करते हैं।
अब प्रश्न उठता है कि व्यक्तित्व को कैसे मापा जाए? क्या केवल प्रश्न पूछकर व्यक्तित्व को समझा जा सकता है? कई बार व्यक्ति अपने बारे में सही उत्तर नहीं देता। कभी वह झिझकता है। कभी वह अपनी कमजोरियाँ छिपा लेता है। ऐसी स्थिति में मनोविज्ञान ने एक विशेष पद्धति विकसित की है जिसे प्रक्षेपण प्रविधि कहते हैं।
अब हम इसे सरल भाषा में विस्तार से समझते हैं।
📌 व्यक्तित्व मापन का अर्थ
व्यक्तित्व मापन का अर्थ है किसी व्यक्ति के स्वभाव, रुचि, भावना, सोच और व्यवहार का वैज्ञानिक ढंग से मूल्यांकन करना।
🔹 व्यक्तित्व मापन के उद्देश्य
🔸 1. व्यक्ति की विशेषताओं को जानना
उसकी ताकत और कमजोरियों को पहचानना।
🔸 2. परामर्श देना
छात्रों या व्यक्तियों को सही दिशा देना।
🔸 3. मानसिक समस्याओं की पहचान
छिपी हुई चिंताओं या संघर्षों को समझना।
📌 प्रक्षेपण प्रविधि का अर्थ
प्रक्षेपण का अर्थ है — अपने मन की भावनाओं और विचारों को बाहर की वस्तु पर डाल देना।
प्रक्षेपण प्रविधि में व्यक्ति को अस्पष्ट चित्र, शब्द या स्थिति दी जाती है। फिर उससे पूछा जाता है कि वह क्या देख रहा है या क्या सोचता है। व्यक्ति अपने अंदर की भावनाएँ अनजाने में उस चित्र या स्थिति पर प्रक्षेपित कर देता है।
इस प्रकार मन के गुप्त भाव सामने आ जाते हैं।
🔹 प्रक्षेपण प्रविधियों की विशेषताएँ
🔸 1. अस्पष्ट सामग्री का उपयोग
चित्र या स्थिति स्पष्ट नहीं होती।
🔸 2. स्वतंत्र प्रतिक्रिया
व्यक्ति अपनी इच्छा से उत्तर देता है।
🔸 3. अचेतन मन की अभिव्यक्ति
छिपी हुई भावनाएँ सामने आती हैं।
🔸 4. गहराई से विश्लेषण
उत्तर का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है।
अब हम प्रमुख प्रक्षेपण प्रविधियों का वर्णन करेंगे।
📌 रोर्शाक स्याही धब्बा परीक्षण (Rorschach Inkblot Test)
यह सबसे प्रसिद्ध प्रक्षेपण परीक्षण है। इसमें स्याही के दस धब्बों वाले कार्ड दिखाए जाते हैं।
🔹 प्रक्रिया
व्यक्ति से पूछा जाता है — “आपको इस चित्र में क्या दिखाई दे रहा है?”
वह जो भी बताता है, उसे लिख लिया जाता है।
🔹 विशेषताएँ
🔸 1. अस्पष्ट धब्बे
चित्र स्पष्ट नहीं होते।
🔸 2. कल्पनाशक्ति की भूमिका
व्यक्ति अपनी कल्पना से अर्थ निकालता है।
🔸 3. भावनात्मक स्थिति का संकेत
उत्तर से व्यक्ति के स्वभाव का पता चलता है।
यह परीक्षण अचेतन भावनाओं को समझने में सहायक है।
📌 थीमैटिक एपर्सेप्शन टेस्ट (TAT)
इस परीक्षण में व्यक्ति को कुछ चित्र दिखाए जाते हैं जिनमें कोई स्थिति या घटना दिखाई देती है।
🔹 प्रक्रिया
व्यक्ति से कहा जाता है कि वह उस चित्र पर एक कहानी बनाए।
वह बताए —
चित्र में क्या हो रहा है?
आगे क्या होगा?
🔹 विशेषताएँ
🔸 1. कहानी निर्माण
व्यक्ति अपनी सोच के अनुसार कहानी बनाता है।
🔸 2. आंतरिक इच्छाओं का पता
उसकी इच्छाएँ और संघर्ष सामने आते हैं।
🔸 3. व्यक्तित्व की दिशा
उसके जीवन दृष्टिकोण का पता चलता है।
यह परीक्षण विशेष रूप से किशोर और वयस्कों पर किया जाता है।
📌 वाक्य पूर्णता परीक्षण (Sentence Completion Test)
इस परीक्षण में व्यक्ति को अधूरे वाक्य दिए जाते हैं। जैसे —
“मुझे सबसे ज्यादा डर लगता है…”
“मेरा परिवार…”
🔹 प्रक्रिया
व्यक्ति को वाक्य पूरा करना होता है।
🔹 विशेषताएँ
🔸 1. सरल पद्धति
समझने और कराने में आसान।
🔸 2. वास्तविक विचार
व्यक्ति अपनी सच्ची भावना व्यक्त कर देता है।
🔸 3. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
उत्तर से मानसिक स्थिति का पता चलता है।
यह परीक्षण विद्यालयों में भी उपयोगी है।
📌 शब्द संघ परीक्षण (Word Association Test)
इसमें व्यक्ति को एक-एक शब्द सुनाया जाता है। फिर उससे तुरंत प्रतिक्रिया देने को कहा जाता है।
🔹 प्रक्रिया
जैसे शब्द दिया — “माँ”
व्यक्ति तुरंत जो शब्द बोलेगा, वह दर्ज किया जाता है।
🔹 विशेषताएँ
🔸 1. त्वरित प्रतिक्रिया
सोचने का समय कम होता है।
🔸 2. अचेतन विचार
पहली प्रतिक्रिया वास्तविक भावना दर्शाती है।
🔸 3. भावनात्मक स्थिति
शब्दों के चयन से मानसिक दशा स्पष्ट होती है।
📌 चित्रांकन परीक्षण (Draw-A-Person Test)
इस परीक्षण में व्यक्ति से कहा जाता है कि वह किसी व्यक्ति का चित्र बनाए।
🔹 प्रक्रिया
चित्र बनवाकर उसके आकार, रेखा और विवरण का विश्लेषण किया जाता है।
🔹 विशेषताएँ
🔸 1. बच्चों के लिए उपयोगी
छोटे बच्चे अपनी भावना चित्र में दिखाते हैं।
🔸 2. आत्मविश्वास का संकेत
चित्र का आकार और शैली व्यक्तित्व बताती है।
🔸 3. आंतरिक भावनाएँ
डर, चिंता या आत्मसम्मान का संकेत मिलता है।
📌 प्रक्षेपण प्रविधियों के लाभ
🔹 1. गहराई से अध्ययन
अचेतन मन को समझने में सहायक।
🔹 2. वास्तविक भावनाएँ
व्यक्ति झूठ कम बोल पाता है।
🔹 3. परामर्श में उपयोगी
काउंसलिंग में बहुत उपयोगी।
📌 प्रक्षेपण प्रविधियों की सीमाएँ
🔹 1. समय अधिक लगता है
विश्लेषण जटिल होता है।
🔹 2. विशेषज्ञ की आवश्यकता
प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक चाहिए।
🔹 3. परिणाम की निश्चितता कम
कभी-कभी अलग विशेषज्ञ अलग निष्कर्ष निकाल सकते हैं।
📌 निष्कर्ष
व्यक्तित्व मापन की प्रक्षेपण प्रविधियाँ मनुष्य के अचेतन मन को समझने का प्रभावी माध्यम हैं। जब सामान्य प्रश्नावली से सही जानकारी नहीं मिलती, तब ये प्रविधियाँ उपयोगी सिद्ध होती हैं।
रोर्शाक परीक्षण, थीमैटिक एपर्सेप्शन टेस्ट, वाक्य पूर्णता परीक्षण, शब्द संघ परीक्षण और चित्रांकन परीक्षण — ये सभी प्रक्षेपण प्रविधियाँ व्यक्तित्व के गहरे पहलुओं को उजागर करती हैं।
हालाँकि इनकी कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी मनोविज्ञान के क्षेत्र में इनका महत्व बहुत अधिक है। एक प्रशिक्षित विशेषज्ञ इन प्रविधियों के माध्यम से व्यक्ति के व्यक्तित्व को गहराई से समझ सकता है और उचित मार्गदर्शन दे सकता है।
अतः व्यक्तित्व मापन में प्रक्षेपण प्रविधियाँ एक महत्वपूर्ण और उपयोगी साधन हैं।
प्रश्न 04. सृजनात्मकता को परिभाषित करते हुए इसकी विशेषताओं की व्याख्या कीजिए।
मनुष्य को अन्य जीवों से अलग बनाने वाली सबसे महत्वपूर्ण क्षमता है – सृजनात्मकता। यही वह शक्ति है जिसके कारण मनुष्य नए विचार उत्पन्न करता है, नई खोज करता है, नई कविता लिखता है, नया आविष्कार करता है और समाज को आगे बढ़ाता है।
जब कोई बच्चा सामान्य प्रश्न का अलग ढंग से उत्तर देता है, जब कोई कलाकार साधारण दृश्य को सुंदर चित्र में बदल देता है, जब कोई वैज्ञानिक नई खोज करता है – तब हम कहते हैं कि उसमें सृजनात्मकता है।
अब हम सृजनात्मकता का अर्थ और उसकी विशेषताओं को सरल और स्पष्ट रूप में समझेंगे।
📌 सृजनात्मकता का अर्थ
सृजनात्मकता का सामान्य अर्थ है — नया और उपयोगी विचार उत्पन्न करने की क्षमता।
सृजनात्मकता केवल कला तक सीमित नहीं है। यह विज्ञान, साहित्य, शिक्षा, व्यवसाय, खेल – हर क्षेत्र में दिखाई देती है।
सरल शब्दों में कहें तो जब व्यक्ति किसी समस्या का नया और मौलिक समाधान प्रस्तुत करता है, तो उसे सृजनात्मक कहा जाता है।
🔹 प्रमुख परिभाषाएँ (सरल रूप में)
🔸 1. नया निर्माण
सृजनात्मकता वह क्षमता है जिससे व्यक्ति नया विचार या वस्तु उत्पन्न करता है।
🔸 2. मौलिकता
दूसरों से अलग सोचने की शक्ति।
🔸 3. उपयोगिता
सिर्फ नया होना पर्याप्त नहीं है। वह विचार उपयोगी भी होना चाहिए।
📌 सृजनात्मकता की आवश्यकता
आज का युग प्रतिस्पर्धा का युग है। केवल रटकर सीखना पर्याप्त नहीं है।
समस्या समाधान, नवाचार और नई सोच की आवश्यकता है।
🔹 शिक्षा में महत्व
🔸 1. समस्या समाधान में सहायता
छात्र नई परिस्थितियों में सही निर्णय ले पाता है।
🔸 2. आत्मविश्वास में वृद्धि
जब छात्र नया विचार देता है, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है।
🔸 3. समाज का विकास
नई खोज और आविष्कार समाज को आगे बढ़ाते हैं।
अब हम सृजनात्मकता की प्रमुख विशेषताओं को विस्तार से समझते हैं।
📌 सृजनात्मकता की प्रमुख विशेषताएँ
📍 1. मौलिकता (Originality)
मौलिकता सृजनात्मकता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
🔹 अर्थ
सामान्य से हटकर सोचना। नया और अलग विचार प्रस्तुत करना।
🔹 उदाहरण
यदि सभी छात्र एक ही प्रकार का उत्तर दें और एक छात्र अलग दृष्टिकोण से उत्तर दे, तो वह मौलिकता है।
मौलिकता व्यक्ति को भीड़ से अलग पहचान देती है।
📍 2. प्रवाह (Fluency)
प्रवाह का अर्थ है — कम समय में अधिक विचार उत्पन्न करने की क्षमता।
🔹 अर्थ
तेजी से कई विचार देना।
🔹 उदाहरण
यदि किसी विषय पर छात्र अनेक सुझाव दे सके, तो उसमें विचारों का प्रवाह है।
यह विशेषता समस्या समाधान में बहुत उपयोगी होती है।
📍 3. लचीलापन (Flexibility)
लचीलापन का अर्थ है — परिस्थिति के अनुसार सोच बदलने की क्षमता।
🔹 अर्थ
एक ही समस्या को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखना।
🔹 उदाहरण
यदि एक रास्ता काम न करे, तो दूसरा तरीका अपनाना।
लचीलापन व्यक्ति को जिद्दी होने से बचाता है और नई दिशा देता है।
📍 4. विस्तार (Elaboration)
विस्तार का अर्थ है — विचार को विस्तार से समझाना या विकसित करना।
🔹 अर्थ
छोटे विचार को बड़ा और स्पष्ट बनाना।
🔹 उदाहरण
केवल “मुझे कहानी लिखनी है” कहना पर्याप्त नहीं।
उसकी भूमिका, पात्र और घटनाओं का विस्तार करना ही सृजनात्मकता है।
📍 5. जिज्ञासा (Curiosity)
सृजनात्मक व्यक्ति हमेशा प्रश्न पूछता है।
🔹 अर्थ
“क्यों?”, “कैसे?”, “क्या होगा यदि?” जैसे प्रश्न पूछना।
🔹 महत्व
जिज्ञासा नई खोज की शुरुआत है।
📍 6. कल्पनाशक्ति (Imagination)
कल्पना सृजनात्मकता का आधार है।
🔹 अर्थ
जो सामने नहीं है, उसे मन में चित्रित करना।
🔹 उदाहरण
लेखक कहानी की दुनिया रचता है।
वैज्ञानिक भविष्य की कल्पना करता है।
📍 7. आत्मविश्वास (Self-Confidence)
सृजनात्मक व्यक्ति अपने विचारों पर विश्वास रखता है।
🔹 अर्थ
दूसरों की आलोचना से डरना नहीं।
🔹 महत्व
यदि आत्मविश्वास न हो, तो नया विचार सामने नहीं आएगा।
📍 8. स्वतंत्र सोच (Independent Thinking)
सृजनात्मक व्यक्ति दूसरों की नकल नहीं करता।
🔹 अर्थ
अपने अनुभव और विचार से निर्णय लेना।
🔹 महत्व
यह व्यक्ति को मौलिक बनाता है।
📌 सृजनात्मकता के विकास के उपाय
सृजनात्मकता जन्मजात ही नहीं होती। इसे विकसित भी किया जा सकता है।
🔹 1. स्वतंत्र वातावरण
छात्रों को खुलकर सोचने का अवसर देना।
🔹 2. प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहन
डाँटने के बजाय जिज्ञासा बढ़ाना।
🔹 3. विविध अनुभव
कला, खेल, विज्ञान – हर क्षेत्र का अनुभव देना।
🔹 4. आलोचना से बचाव
अत्यधिक आलोचना सृजनात्मकता को दबा देती है।
📌 सृजनात्मक व्यक्ति की पहचान
🔹 1. अलग सोच
भीड़ से अलग विचार।
🔹 2. समस्या समाधान में रुचि
चुनौतियों को अवसर समझना।
🔹 3. जोखिम लेने की क्षमता
नया प्रयोग करने का साहस।
📌 निष्कर्ष
सृजनात्मकता मनुष्य की वह विशेष शक्ति है जो उसे नई खोज, नया विचार और नया निर्माण करने में सक्षम बनाती है। यह केवल कला या साहित्य तक सीमित नहीं है। जीवन के हर क्षेत्र में इसकी आवश्यकता है।
सृजनात्मकता की मुख्य विशेषताएँ हैं — मौलिकता, प्रवाह, लचीलापन, विस्तार, जिज्ञासा, कल्पनाशक्ति, आत्मविश्वास और स्वतंत्र सोच।
यदि शिक्षा प्रणाली बच्चों में सृजनात्मकता का विकास करे, तो समाज में नवाचार और प्रगति स्वतः बढ़ेगी।
अतः सृजनात्मकता केवल एक गुण नहीं है, बल्कि व्यक्तित्व का वह महत्वपूर्ण आयाम है जो जीवन को अर्थपूर्ण और समाज को प्रगतिशील बनाता है।
प्रश्न 05. सीखने से आप क्या समझते हैं? सीखने के क्रिया प्रसूत अनुबंध सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।
मनुष्य जन्म से बहुत कम ज्ञान लेकर आता है। वह धीरे-धीरे अनुभव, अभ्यास और वातावरण के संपर्क से सीखता है। चलना सीखता है, बोलना सीखता है, पढ़ना-लिखना सीखता है, और जीवन जीने के तरीके भी सीखता है। इसलिए सीखना मानव जीवन की मूल प्रक्रिया है।
यदि सीखना न हो, तो न शिक्षा संभव है और न ही व्यक्तित्व का विकास। इसी कारण शिक्षा मनोविज्ञान में सीखने के सिद्धान्तों का विशेष महत्व है।
📌 सीखने का अर्थ
सीखना वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति अनुभव और अभ्यास के आधार पर अपने व्यवहार में स्थायी परिवर्तन लाता है।
सरल शब्दों में कहें तो — अनुभव के कारण व्यवहार में होने वाला अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन ही सीखना है।
🔹 सीखने की मुख्य विशेषताएँ
🔸 1. व्यवहार में परिवर्तन
सीखने से व्यक्ति का व्यवहार बदलता है।
🔸 2. अनुभव पर आधारित
सीखना अनुभव और अभ्यास से होता है।
🔸 3. स्थायी प्रकृति
सीखना अस्थायी नहीं होता। यह लंबे समय तक रहता है।
🔸 4. उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया
सीखना किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए होता है।
📌 सीखने के प्रकार (संक्षेप में)
🔹 1. अनुकरण द्वारा सीखना
दूसरों को देखकर सीखना।
🔹 2. अभ्यास द्वारा सीखना
बार-बार दोहराने से सीखना।
🔹 3. अंतर्दृष्टि द्वारा सीखना
अचानक समझ में आ जाना।
🔹 4. अनुबंध द्वारा सीखना
उत्तेजना और प्रतिक्रिया के संबंध से सीखना।
इसी अनुबंध आधारित सीखने में एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है — क्रिया प्रसूत अनुबंध सिद्धान्त।
📌 क्रिया प्रसूत अनुबंध सिद्धान्त का परिचय
क्रिया प्रसूत अनुबंध सिद्धान्त को प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक बी. एफ. स्किनर ने प्रस्तुत किया।
इस सिद्धान्त का मुख्य विचार है —
व्यवहार उसके परिणामों से नियंत्रित होता है।
यदि किसी व्यवहार के बाद सुखद परिणाम मिले, तो वह व्यवहार दोहराया जाता है। यदि दंड मिले, तो वह व्यवहार कम हो जाता है।
📌 क्रिया प्रसूत अनुबंध का अर्थ
“क्रिया प्रसूत” का अर्थ है — वह व्यवहार जो व्यक्ति स्वयं करता है।
“अनुबंध” का अर्थ है — परिणाम के साथ संबंध।
अर्थात् जब व्यक्ति कोई क्रिया करता है और उसके बाद उसे पुरस्कार या दंड मिलता है, तो वह उसी अनुसार अपना व्यवहार बदलता है।
📌 स्किनर का प्रयोग
स्किनर ने चूहे पर प्रयोग किया।
उन्होंने एक विशेष डिब्बा बनाया जिसे “स्किनर बॉक्स” कहा गया।
उस डिब्बे में एक लीवर लगा था।
जब चूहा लीवर दबाता, तो उसे भोजन मिलता।
धीरे-धीरे चूहे ने सीख लिया कि लीवर दबाने से भोजन मिलता है।
इस प्रकार उसने उस व्यवहार को बार-बार दोहराया।
यही क्रिया प्रसूत अनुबंध का आधार है।
📌 क्रिया प्रसूत अनुबंध के मुख्य तत्व
📍 1. प्रबलन (Reinforcement)
प्रबलन का अर्थ है — वह प्रक्रिया जो किसी व्यवहार को मजबूत बनाती है।
🔹 सकारात्मक प्रबलन
जब किसी अच्छे व्यवहार के बाद पुरस्कार दिया जाए।
जैसे —
छात्र ने सही उत्तर दिया, तो शिक्षक ने उसकी प्रशंसा की।
इससे वह छात्र आगे भी सही उत्तर देने का प्रयास करेगा।
🔹 नकारात्मक प्रबलन
जब किसी अप्रिय स्थिति को हटाकर व्यवहार को मजबूत किया जाए।
जैसे —
होमवर्क पूरा करने पर अतिरिक्त कार्य से छुट्टी मिलना।
दोनों प्रकार के प्रबलन व्यवहार को बढ़ाते हैं।
📍 2. दंड (Punishment)
दंड का उद्देश्य व्यवहार को कम करना है।
🔹 उदाहरण
यदि छात्र शोर करे और शिक्षक उसे चेतावनी दे, तो वह शोर कम करेगा।
लेकिन अधिक दंड हानिकारक हो सकता है। इसलिए दंड का प्रयोग सावधानी से करना चाहिए।
📍 3. लोप (Extinction)
जब किसी व्यवहार के बाद कोई पुरस्कार न दिया जाए, तो वह धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।
🔹 उदाहरण
यदि बच्चे की गलत हरकत पर ध्यान न दिया जाए, तो वह धीरे-धीरे बंद हो सकती है।
📌 शिक्षा में क्रिया प्रसूत अनुबंध का महत्व
📍 1. प्रभावी शिक्षण
शिक्षक यदि सही उत्तर पर प्रशंसा करे, तो छात्र उत्साहित होते हैं।
📍 2. अनुशासन बनाए रखना
सकारात्मक प्रबलन से अनुशासन स्थापित किया जा सकता है।
📍 3. आदत निर्माण
अच्छी आदतों को पुरस्कार देकर मजबूत किया जा सकता है।
📍 4. व्यवहार सुधार
गलत व्यवहार को दंड या लोप से कम किया जा सकता है।
📌 क्रिया प्रसूत अनुबंध की विशेषताएँ
🔹 1. सक्रिय अधिगम
व्यक्ति स्वयं क्रिया करता है।
🔹 2. परिणाम पर आधारित
व्यवहार उसके परिणाम से नियंत्रित होता है।
🔹 3. व्यवहार संशोधन
इस सिद्धान्त से व्यवहार में सुधार किया जा सकता है।
📌 इस सिद्धान्त की सीमाएँ
🔹 1. आंतरिक भावनाओं की उपेक्षा
यह सिद्धान्त केवल बाहरी व्यवहार पर ध्यान देता है।
🔹 2. अधिक पुरस्कार पर निर्भरता
छात्र केवल पुरस्कार के लिए काम कर सकते हैं।
🔹 3. सृजनात्मकता में कमी
अत्यधिक नियंत्रण से स्वतंत्र सोच प्रभावित हो सकती है।
📌 निष्कर्ष
सीखना मानव जीवन की निरंतर प्रक्रिया है। यह अनुभव और अभ्यास से व्यवहार में स्थायी परिवर्तन लाता है।
क्रिया प्रसूत अनुबंध सिद्धान्त हमें यह सिखाता है कि व्यवहार उसके परिणामों से नियंत्रित होता है। यदि अच्छे व्यवहार को पुरस्कार मिले, तो वह बढ़ता है। यदि दंड मिले, तो वह कम होता है।
शिक्षा के क्षेत्र में यह सिद्धान्त अत्यंत उपयोगी है। इसके माध्यम से शिक्षक छात्रों में अच्छी आदतें विकसित कर सकते हैं और अनुशासन स्थापित कर सकते हैं।
अतः क्रिया प्रसूत अनुबंध सिद्धान्त सीखने की प्रक्रिया को समझने और व्यवहार सुधारने का एक प्रभावी और व्यावहारिक सिद्धान्त है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 01. शिक्षार्थियों हेतु शिक्षा मनोविज्ञान की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
शिक्षा केवल पुस्तकों का ज्ञान नहीं है। शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जो बालक के मन, व्यवहार, सोच, भावना और व्यक्तित्व को विकसित करती है। हर शिक्षार्थी अलग होता है। उसकी रुचि अलग होती है। उसकी समझने की गति अलग होती है। उसकी भावनाएँ और समस्याएँ भी अलग होती हैं।
इन्हीं सब बातों को समझने में जो विज्ञान हमारी सहायता करता है, वही शिक्षा मनोविज्ञान है। शिक्षा मनोविज्ञान केवल शिक्षक के लिए ही नहीं, बल्कि शिक्षार्थियों के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। यदि शिक्षार्थी अपने मन, अपनी क्षमता और अपनी सीखने की शैली को समझ ले, तो वह अधिक सफल हो सकता है।
अब हम विस्तार से समझेंगे कि शिक्षार्थियों के लिए शिक्षा मनोविज्ञान क्यों आवश्यक है।
📌 शिक्षा मनोविज्ञान का संक्षिप्त अर्थ
शिक्षा मनोविज्ञान मनोविज्ञान की वह शाखा है जो सीखने की प्रक्रिया, शिक्षण विधियों और शिक्षार्थियों के व्यवहार का अध्ययन करती है।
यह हमें बताता है कि बच्चा कैसे सीखता है, क्यों भूलता है, कब प्रेरित होता है और कब निराश होता है।
📌 शिक्षार्थियों हेतु शिक्षा मनोविज्ञान की आवश्यकता
📍 1. आत्म-समझ (Self-Understanding) में सहायता
शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षार्थी को स्वयं को समझने में मदद करता है।
🔹 अपनी क्षमताओं की पहचान
हर छात्र की बुद्धि, रुचि और योग्यता अलग होती है।
शिक्षा मनोविज्ञान यह सिखाता है कि अपनी ताकत और कमजोरी को कैसे पहचानें।
🔹 आत्मविश्वास का विकास
जब छात्र अपनी क्षमता समझता है, तो उसमें आत्मविश्वास बढ़ता है।
📍 2. सीखने की प्रक्रिया को समझना
कई छात्र शिकायत करते हैं कि वे पढ़ते तो हैं, पर याद नहीं रहता।
शिक्षा मनोविज्ञान बताता है कि सीखने के नियम क्या हैं।
🔹 अभ्यास का महत्व
बार-बार दोहराने से स्मृति मजबूत होती है।
🔹 ध्यान की भूमिका
ध्यान केंद्रित न होने पर सीखना संभव नहीं।
🔹 प्रेरणा का प्रभाव
जिस विषय में रुचि हो, उसे जल्दी सीखा जाता है।
इस प्रकार छात्र सही तरीके से पढ़ना सीखता है।
📍 3. मानसिक स्वास्थ्य का संरक्षण
आज के समय में छात्रों पर पढ़ाई का दबाव अधिक है।
तनाव, चिंता और भय सामान्य समस्या बन गए हैं।
🔹 तनाव को समझना
शिक्षा मनोविज्ञान सिखाता है कि तनाव क्यों होता है।
🔹 भावनात्मक संतुलन
छात्र अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना सीखता है।
🔹 सकारात्मक सोच
निराशा से बाहर निकलने की शक्ति मिलती है।
इससे छात्र मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है।
📍 4. व्यक्तित्व विकास में सहायता
शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं है।
व्यक्तित्व का विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
🔹 सामाजिक व्यवहार
कैसे बात करें, कैसे सहयोग करें।
🔹 नेतृत्व क्षमता
समूह में आगे बढ़कर जिम्मेदारी लेना।
🔹 निर्णय क्षमता
सही और गलत में अंतर समझना।
शिक्षा मनोविज्ञान इन गुणों के विकास में सहायक है।
📍 5. रुचि और अभिरुचि की पहचान
हर छात्र हर विषय में समान रूप से अच्छा नहीं होता।
🔹 करियर चयन में सहायता
अपनी रुचि समझकर सही विषय का चयन।
🔹 अनावश्यक दबाव से बचाव
दूसरों की तुलना से बचना।
इससे छात्र अपनी दिशा स्वयं तय कर सकता है।
📍 6. अनुशासन और आत्म-नियंत्रण
शिक्षा मनोविज्ञान व्यवहार को समझाता है।
🔹 आदत निर्माण
अच्छी आदतों को विकसित करना।
🔹 बुरी आदतों से छुटकारा
गलत व्यवहार को सुधारना।
इससे छात्र में आत्म-नियंत्रण विकसित होता है।
📍 7. प्रेरणा का महत्व समझना
प्रेरणा के बिना सीखना संभव नहीं।
🔹 आंतरिक प्रेरणा
स्वयं आगे बढ़ने की इच्छा।
🔹 बाहरी प्रेरणा
पुरस्कार और प्रशंसा का प्रभाव।
शिक्षा मनोविज्ञान बताता है कि किस प्रकार प्रेरणा से सफलता प्राप्त की जा सकती है।
📍 8. व्यक्तिगत भिन्नताओं को समझना
कक्षा में सभी छात्र समान नहीं होते।
🔹 बुद्धि में अंतर
कुछ छात्र तेज होते हैं, कुछ धीमे।
🔹 सीखने की शैली में अंतर
कोई देखकर सीखता है, कोई सुनकर।
जब छात्र यह समझता है कि भिन्नता सामान्य है, तो वह हीन भावना से बचता है।
📍 9. समस्या समाधान क्षमता
शिक्षा मनोविज्ञान तर्क और विश्लेषण की क्षमता बढ़ाता है।
🔹 सोचने की शक्ति
समस्या को समझना और समाधान खोजना।
🔹 निर्णय लेना
परिस्थिति के अनुसार सही निर्णय।
यह जीवन भर काम आता है।
📍 10. सफल जीवन की तैयारी
शिक्षा केवल विद्यालय तक सीमित नहीं है।
यह जीवन की तैयारी है।
🔹 सामाजिक समायोजन
समाज में मिल-जुलकर रहना।
🔹 जिम्मेदारी की भावना
कर्तव्यों को निभाना।
🔹 नैतिक विकास
सही मूल्यों को अपनाना।
शिक्षा मनोविज्ञान जीवन को संतुलित बनाता है।
📌 शिक्षार्थियों के लिए व्यावहारिक लाभ
🔹 परीक्षा की तैयारी में मदद
स्मृति और अभ्यास के नियमों का उपयोग।
🔹 समय प्रबंधन
पढ़ाई का सही समय निर्धारण।
🔹 आत्म-मूल्यांकन
अपनी प्रगति को समझना।
📌 शिक्षा मनोविज्ञान और आधुनिक युग
आज का युग प्रतियोगिता का युग है।
नई-नई तकनीकें और चुनौतियाँ सामने हैं।
ऐसी स्थिति में केवल रटने से काम नहीं चलेगा।
समझ, विश्लेषण और सृजनात्मक सोच की आवश्यकता है।
शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षार्थी को इन सभी गुणों से सशक्त बनाता है।
📌 निष्कर्ष
शिक्षार्थियों के लिए शिक्षा मनोविज्ञान अत्यंत आवश्यक है। यह उन्हें स्वयं को समझने, सही ढंग से सीखने, मानसिक संतुलन बनाए रखने और अपने व्यक्तित्व का विकास करने में सहायता करता है।
यह छात्र को आत्मविश्वासी, अनुशासित और जिम्मेदार बनाता है। साथ ही उसे जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करता है।
प्रश्न 02. शाब्दिक व अशाब्दिक बुद्धि परीक्षणों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
बुद्धि मनुष्य की वह मानसिक क्षमता है जिसके द्वारा वह सोचता है, समझता है, निर्णय लेता है और समस्याओं का समाधान करता है। हर व्यक्ति की बुद्धि समान नहीं होती। इसलिए मनोविज्ञान में बुद्धि को मापने के लिए विभिन्न प्रकार के परीक्षण बनाए गए हैं।
इन परीक्षणों में दो प्रमुख प्रकार हैं — शाब्दिक बुद्धि परीक्षण और अशाब्दिक बुद्धि परीक्षण।
दोनों का उद्देश्य बुद्धि को मापना है, परंतु उनकी विधि, प्रश्नों का स्वरूप और उपयोग अलग-अलग होता है। अब हम इन दोनों को विस्तार से समझेंगे और फिर इनके बीच का अंतर स्पष्ट करेंगे।
📌 बुद्धि परीक्षण का संक्षिप्त अर्थ
बुद्धि परीक्षण वह वैज्ञानिक विधि है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता को मापा जाता है।
यह परीक्षण यह जानने में मदद करता है कि व्यक्ति की सोचने, तर्क करने, समझने और समस्या हल करने की क्षमता कितनी है।
📌 शाब्दिक बुद्धि परीक्षण (Verbal Intelligence Test)
शाब्दिक का अर्थ है — शब्दों से संबंधित।
इस प्रकार के परीक्षण में प्रश्न शब्दों, भाषा और वाक्यों के माध्यम से पूछे जाते हैं।
🔹 मुख्य विशेषताएँ
🔸 1. भाषा आधारित प्रश्न
प्रश्न लिखित या मौखिक रूप में होते हैं।
🔸 2. शब्द ज्ञान पर आधारित
शब्दों का अर्थ, पर्यायवाची, विलोम आदि पूछे जाते हैं।
🔸 3. तर्क एवं गणितीय प्रश्न
कुछ प्रश्न संख्यात्मक और तार्किक भी होते हैं।
🔹 उदाहरण
समानार्थी शब्द बताइए।
वाक्य पूरा कीजिए।
संख्या श्रेणी पूरी कीजिए।
दो वस्तुओं में समानता बताइए।
इन प्रश्नों को हल करने के लिए भाषा का ज्ञान आवश्यक होता है।
🔹 उपयोग
शिक्षित व्यक्तियों के लिए अधिक उपयुक्त।
विद्यालय और प्रतियोगी परीक्षाओं में उपयोगी।
📌 अशाब्दिक बुद्धि परीक्षण (Non-Verbal Intelligence Test)
अशाब्दिक का अर्थ है — बिना शब्दों के।
इस प्रकार के परीक्षण में चित्र, आकृति, संकेत या प्रतीकों के माध्यम से प्रश्न पूछे जाते हैं।
🔹 मुख्य विशेषताएँ
🔸 1. चित्र आधारित प्रश्न
शब्दों के स्थान पर चित्र या आकृतियाँ दी जाती हैं।
🔸 2. भाषा का कम महत्व
भाषा का ज्ञान आवश्यक नहीं।
🔸 3. अवलोकन और तर्क पर आधारित
आकृतियों में समानता या अंतर पहचानना।
🔹 उदाहरण
अधूरी आकृति पूरी करना।
चित्रों में अंतर ढूँढ़ना।
क्रम में अगली आकृति चुनना।
पैटर्न पहचानना।
इन प्रश्नों को हल करने के लिए दृश्य निरीक्षण और तार्किक सोच की आवश्यकता होती है।
🔹 उपयोग
छोटे बच्चों के लिए उपयोगी।
अशिक्षित या कम भाषा ज्ञान वाले व्यक्तियों के लिए उपयुक्त।
बहुभाषी क्षेत्रों में अधिक प्रभावी।
📌 शाब्दिक व अशाब्दिक बुद्धि परीक्षणों में अंतर
अब हम दोनों के बीच मुख्य अंतर स्पष्ट रूप से समझते हैं।
📍 1. आधार
🔹 शाब्दिक परीक्षण
भाषा और शब्दों पर आधारित।
🔹 अशाब्दिक परीक्षण
चित्र और आकृतियों पर आधारित।
📍 2. भाषा का महत्व
🔹 शाब्दिक परीक्षण
भाषा का ज्ञान आवश्यक।
🔹 अशाब्दिक परीक्षण
भाषा का ज्ञान आवश्यक नहीं।
📍 3. उपयुक्तता
🔹 शाब्दिक परीक्षण
शिक्षित और भाषा जानने वाले व्यक्तियों के लिए।
🔹 अशाब्दिक परीक्षण
छोटे बच्चों और अशिक्षित व्यक्तियों के लिए।
📍 4. प्रश्नों का स्वरूप
🔹 शाब्दिक परीक्षण
वाक्य, शब्द, गणितीय प्रश्न।
🔹 अशाब्दिक परीक्षण
चित्र, संकेत, आकृतियाँ।
📍 5. सांस्कृतिक प्रभाव
🔹 शाब्दिक परीक्षण
भाषा और संस्कृति का प्रभाव अधिक।
🔹 अशाब्दिक परीक्षण
सांस्कृतिक प्रभाव कम।
📍 6. मापन का क्षेत्र
🔹 शाब्दिक परीक्षण
शब्द ज्ञान और तार्किक सोच का मापन।
🔹 अशाब्दिक परीक्षण
दृश्य-स्थानिक और तर्क क्षमता का मापन।
📌 दोनों परीक्षणों का महत्व
दोनों प्रकार के परीक्षण महत्वपूर्ण हैं।
🔹 शाब्दिक परीक्षण
शैक्षिक उपलब्धि का अच्छा संकेत देता है।
🔹 अशाब्दिक परीक्षण
निष्पक्ष और सार्वभौमिक मापन प्रदान करता है।
कई बार दोनों को मिलाकर भी उपयोग किया जाता है ताकि अधिक सटीक परिणाम प्राप्त हो सकें।
📌 शिक्षा में उपयोग
विद्यालयों में छात्रों की बौद्धिक क्षमता जानने के लिए इन परीक्षणों का उपयोग किया जाता है।
इनसे शिक्षक यह समझ सकते हैं —
कौन-सा छात्र किस क्षेत्र में मजबूत है।
किसे अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता है।
किस प्रकार की शिक्षण विधि उपयुक्त होगी।
📌 निष्कर्ष
शाब्दिक और अशाब्दिक बुद्धि परीक्षण दोनों ही बुद्धि मापन के महत्वपूर्ण साधन हैं।
शाब्दिक परीक्षण भाषा आधारित होता है, जबकि अशाब्दिक परीक्षण चित्र और संकेतों पर आधारित होता है।
जहाँ भाषा ज्ञान आवश्यक हो, वहाँ शाब्दिक परीक्षण उपयोगी है।
जहाँ भाषा बाधा बन सकती है, वहाँ अशाब्दिक परीक्षण अधिक प्रभावी है।
अतः दोनों परीक्षण अपनी-अपनी विशेषताओं के कारण महत्वपूर्ण हैं और बुद्धि मापन में संतुलित दृष्टिकोण प्रदान करते हैं।
प्रश्न 03. व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करने वाले पर्यावरण कारकों का वर्णन कीजिए।
व्यक्तित्व किसी व्यक्ति के संपूर्ण व्यवहार, सोच, भावनाओं, आदतों और दृष्टिकोण का समग्र रूप है। कोई व्यक्ति शांत होता है, कोई क्रोधी। कोई मिलनसार होता है, तो कोई एकांतप्रिय। ये सभी विशेषताएँ मिलकर उसके व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं।
व्यक्तित्व के विकास में दो मुख्य तत्व माने जाते हैं — वंशानुक्रम (Heredity) और पर्यावरण (Environment)। वंशानुक्रम हमें जन्म से कुछ गुण देता है, लेकिन पर्यावरण उन गुणों को दिशा देता है। इसलिए कहा जाता है कि व्यक्तित्व का वास्तविक निर्माण पर्यावरण से होता है।
अब हम विस्तार से समझेंगे कि कौन-कौन से पर्यावरणीय कारक व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करते हैं।
📌 पर्यावरण का अर्थ
पर्यावरण से तात्पर्य उन सभी बाहरी परिस्थितियों और प्रभावों से है जो व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करते हैं।
इसमें परिवार, विद्यालय, समाज, मित्र, संस्कृति, आर्थिक स्थिति आदि सभी शामिल हैं।
📌 व्यक्तित्व विकास में पर्यावरण का महत्व
व्यक्ति जैसा वातावरण पाता है, वैसा ही उसका व्यवहार बनता है।
यदि वातावरण सकारात्मक हो, तो व्यक्तित्व संतुलित और आत्मविश्वासी बनता है।
यदि वातावरण नकारात्मक हो, तो व्यक्तित्व में असुरक्षा और तनाव आ सकता है।
इसलिए पर्यावरण की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अब हम प्रमुख पर्यावरणीय कारकों का क्रमबद्ध वर्णन करेंगे।
📍 1. परिवार (Family)
परिवार व्यक्तित्व विकास का पहला और सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है।
🔹 प्रारंभिक सीख
बच्चा सबसे पहले बोलना, चलना और व्यवहार करना परिवार से सीखता है।
🔹 माता-पिता का व्यवहार
यदि माता-पिता स्नेही और सहयोगी हों, तो बच्चा आत्मविश्वासी बनता है।
यदि घर में झगड़ा और तनाव हो, तो बच्चा असुरक्षित महसूस करता है।
🔹 अनुशासन का प्रभाव
संतुलित अनुशासन व्यक्तित्व को मजबूत बनाता है।
अत्यधिक कठोरता या अत्यधिक ढीलापन हानिकारक हो सकता है।
परिवार की भूमिका जीवन भर प्रभाव डालती है।
📍 2. विद्यालय (School)
विद्यालय व्यक्तित्व विकास का दूसरा प्रमुख केंद्र है।
🔹 शिक्षक का प्रभाव
शिक्षक का व्यवहार, प्रोत्साहन और मार्गदर्शन छात्र के आत्मविश्वास को बढ़ाता है।
🔹 सहपाठी समूह
दोस्तों के साथ रहने से सामाजिक कौशल विकसित होते हैं।
🔹 सहगामी गतिविधियाँ
खेल, वाद-विवाद, सांस्कृतिक कार्यक्रम से नेतृत्व क्षमता बढ़ती है।
विद्यालय व्यक्ति को सामाजिक जीवन के लिए तैयार करता है।
📍 3. मित्र समूह (Peer Group)
किशोरावस्था में मित्रों का प्रभाव बहुत अधिक होता है।
🔹 आदतों पर प्रभाव
अच्छे मित्र अच्छी आदतें सिखाते हैं।
गलत संगति गलत व्यवहार सिखा सकती है।
🔹 आत्मसम्मान
मित्रों से स्वीकृति मिलने पर आत्मसम्मान बढ़ता है।
मित्र समूह व्यक्ति के दृष्टिकोण और सोच को प्रभावित करता है।
📍 4. सामाजिक वातावरण (Social Environment)
समाज की मान्यताएँ, नियम और परंपराएँ भी व्यक्तित्व को प्रभावित करती हैं।
🔹 सामाजिक मूल्य
ईमानदारी, सहयोग और अनुशासन जैसे मूल्य समाज से सीखते हैं।
🔹 सामाजिक स्थिति
समाज में सम्मान या भेदभाव व्यक्ति के आत्मविश्वास को प्रभावित करता है।
समाज व्यक्ति को एक दिशा देता है।
📍 5. सांस्कृतिक कारक (Cultural Factors)
संस्कृति व्यक्ति की सोच और व्यवहार को आकार देती है।
🔹 भाषा और परंपराएँ
भाषा, त्योहार और रीति-रिवाज व्यक्तित्व में गहराई से जुड़े होते हैं।
🔹 जीवन शैली
संस्कृति जीवन जीने का तरीका सिखाती है।
संस्कृति व्यक्ति की पहचान का आधार बनती है।
📍 6. आर्थिक स्थिति (Economic Status)
आर्थिक स्थिति भी व्यक्तित्व पर प्रभाव डालती है।
🔹 संसाधनों की उपलब्धता
अच्छी आर्थिक स्थिति से शिक्षा और अवसर अधिक मिलते हैं।
🔹 असुरक्षा की भावना
आर्थिक कठिनाई से तनाव और चिंता बढ़ सकती है।
आर्थिक स्थिति आत्मविश्वास और जीवन दृष्टिकोण को प्रभावित करती है।
📍 7. मीडिया और तकनीक (Media and Technology)
आज के समय में मीडिया और इंटरनेट का प्रभाव बहुत अधिक है।
🔹 सकारात्मक प्रभाव
ज्ञान और जानकारी प्राप्त होती है।
🔹 नकारात्मक प्रभाव
गलत सामग्री से व्यवहार प्रभावित हो सकता है।
मीडिया सोच और दृष्टिकोण को बदल सकता है।
📍 8. भौतिक वातावरण (Physical Environment)
आसपास का भौतिक वातावरण भी प्रभाव डालता है।
🔹 स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण
ऐसा वातावरण मानसिक शांति देता है।
🔹 असुरक्षित या प्रदूषित वातावरण
तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है।
भौतिक वातावरण स्वास्थ्य और व्यवहार दोनों को प्रभावित करता है।
📍 9. धार्मिक और नैतिक वातावरण
धार्मिक और नैतिक शिक्षाएँ भी व्यक्तित्व को दिशा देती हैं।
🔹 नैतिक मूल्य
सत्य, अहिंसा और करुणा जैसे गुण विकसित होते हैं।
🔹 आत्मनियंत्रण
धार्मिक वातावरण आत्मसंयम सिखाता है।
यह व्यक्ति को नैतिक रूप से मजबूत बनाता है।
📌 पर्यावरणीय कारकों की समग्र भूमिका
व्यक्तित्व एक दिन में नहीं बनता। यह धीरे-धीरे विकसित होता है।
पर्यावरण के सभी कारक मिलकर व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
यदि परिवार, विद्यालय और समाज मिलकर सकारात्मक वातावरण दें, तो व्यक्तित्व संतुलित और मजबूत बनता है।
📌 निष्कर्ष
व्यक्तित्व के विकास में पर्यावरण की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। परिवार, विद्यालय, मित्र, समाज, संस्कृति, आर्थिक स्थिति, मीडिया और भौतिक वातावरण — ये सभी मिलकर व्यक्ति के व्यवहार और सोच को प्रभावित करते हैं।
सकारात्मक और सहयोगी वातावरण व्यक्ति को आत्मविश्वासी, जिम्मेदार और नैतिक बनाता है।
नकारात्मक वातावरण व्यक्तित्व में असुरक्षा और तनाव उत्पन्न कर सकता है।
अतः कहा जा सकता है कि व्यक्तित्व का विकास केवल जन्मजात गुणों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि पर्यावरण की गुणवत्ता पर भी निर्भर करता है।
इसलिए हमें ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जो व्यक्तित्व के संतुलित और सकारात्मक विकास में सहायक हो।
प्रश्न 04. बालकों को अनुशासित करने में साक्षात्कार विधि किस प्रकार उपयोगी है ?
विद्यालय में अनुशासन केवल नियमों से नहीं बनता। अनुशासन समझ, संवाद और विश्वास से बनता है। कई बार बालक गलत व्यवहार करता है, पर उसके पीछे कोई कारण होता है। यदि हम केवल दंड दें, तो समस्या दब सकती है, समाप्त नहीं होती।
ऐसी स्थिति में साक्षात्कार विधि बहुत उपयोगी सिद्ध होती है। साक्षात्कार का अर्थ है – शिक्षक और बालक के बीच आमने-सामने बैठकर बातचीत करना। यह बातचीत औपचारिक भी हो सकती है और अनौपचारिक भी। इसका उद्देश्य बालक के मन को समझना है।
📌 साक्षात्कार विधि का अर्थ
साक्षात्कार वह प्रक्रिया है जिसमें शिक्षक या परामर्शदाता बालक से सीधे संवाद करता है और उसके विचार, भावनाएँ तथा समस्याएँ जानने का प्रयास करता है।
यह केवल प्रश्न-उत्तर नहीं है। यह समझने और समझाने की प्रक्रिया है।
📌 अनुशासन का वास्तविक अर्थ
अनुशासन का अर्थ केवल दंड देना नहीं है।
अनुशासन का अर्थ है —
आत्म-नियंत्रण
नियमों का पालन
जिम्मेदारी की भावना
सच्चा अनुशासन भीतर से आता है। साक्षात्कार विधि उसी आंतरिक अनुशासन को विकसित करती है।
📌 बालकों को अनुशासित करने में साक्षात्कार विधि की उपयोगिता
📍 1. समस्या के वास्तविक कारण को समझना
कई बार बालक कक्षा में शोर करता है।
कभी वह होमवर्क नहीं करता।
कभी झगड़ा करता है।
यदि हम केवल दंड दें, तो कारण नहीं समझ पाएंगे।
🔹 साक्षात्कार से लाभ
शिक्षक बालक से पूछ सकता है —
तुम्हें पढ़ाई में कठिनाई कहाँ आ रही है?
क्या घर में कोई समस्या है?
इससे वास्तविक कारण सामने आता है।
📍 2. विश्वास का निर्माण
जब शिक्षक बालक की बात ध्यान से सुनता है, तो बालक को लगता है कि उसकी बात का महत्व है।
🔹 परिणाम
बालक खुलकर अपनी समस्या बताता है।
शिक्षक और छात्र के बीच विश्वास बढ़ता है।
विश्वास अनुशासन की पहली सीढ़ी है।
📍 3. भावनात्मक संतुलन में सहायता
कई बार अनुशासनहीनता का कारण भावनात्मक तनाव होता है।
🔹 उदाहरण
घर में झगड़ा
परीक्षा का भय
मित्रों से विवाद
साक्षात्कार के माध्यम से बालक अपनी भावनाएँ व्यक्त कर सकता है।
इससे उसका तनाव कम होता है।
📍 4. आत्म-अनुशासन का विकास
दंड से बालक डर सकता है, परंतु सुधार भीतर से नहीं आता।
साक्षात्कार के माध्यम से शिक्षक बालक को यह समझा सकता है कि उसका व्यवहार क्यों गलत है।
🔹 परिणाम
बालक स्वयं निर्णय लेता है कि वह अपना व्यवहार सुधारेगा।
यह सच्चा अनुशासन है।
📍 5. सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास
साक्षात्कार में शिक्षक केवल गलतियों पर ध्यान नहीं देता, बल्कि बालक की अच्छाइयों की भी प्रशंसा करता है।
🔹 लाभ
बालक का आत्मविश्वास बढ़ता है।
वह सुधार के लिए प्रेरित होता है।
सकारात्मक प्रेरणा अनुशासन को मजबूत बनाती है।
📍 6. व्यक्तिगत भिन्नताओं का ध्यान
हर बालक अलग होता है।
किसी को समझाने से सुधार होता है।
किसी को मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।
साक्षात्कार विधि प्रत्येक बालक के अनुसार समाधान खोजने में सहायता करती है।
📍 7. परामर्श और मार्गदर्शन
साक्षात्कार केवल समस्या जानने का माध्यम नहीं है।
यह परामर्श देने का भी माध्यम है।
🔹 उदाहरण
समय प्रबंधन सिखाना
क्रोध नियंत्रण की विधि बताना
अध्ययन तकनीक समझाना
इससे बालक का समग्र विकास होता है।
📍 8. गलत धारणाओं का सुधार
कभी-कभी बालक शिक्षक या साथियों के बारे में गलत सोच बना लेता है।
साक्षात्कार के माध्यम से इन गलतफहमियों को दूर किया जा सकता है।
📌 साक्षात्कार विधि की प्रमुख विशेषताएँ
🔹 1. आमने-सामने संवाद
प्रत्यक्ष बातचीत से स्पष्टता आती है।
🔹 2. गोपनीयता
बालक अपनी बात निःसंकोच कह सकता है।
🔹 3. सहानुभूति
शिक्षक को सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।
🔹 4. सक्रिय सुनना
केवल बोलना नहीं, बल्कि ध्यान से सुनना भी आवश्यक है।
📌 साक्षात्कार लेते समय सावधानियाँ
🔹 1. शांत वातावरण
बातचीत एकांत और शांत स्थान पर हो।
🔹 2. कठोर भाषा से बचें
डराने या डाँटने के बजाय समझाएँ।
🔹 3. निष्पक्ष दृष्टिकोण
पूर्वाग्रह न रखें।
🔹 4. धैर्य
बालक को अपनी बात पूरी कहने दें।
📌 साक्षात्कार विधि के लाभ
अनुशासन की समस्या का स्थायी समाधान
बालक का मानसिक संतुलन
आत्म-नियंत्रण का विकास
शिक्षक-छात्र संबंधों में सुधार
📌 साक्षात्कार विधि की सीमाएँ
समय अधिक लगता है।
सभी शिक्षक प्रशिक्षित नहीं होते।
कभी-कभी बालक खुलकर बात नहीं करता।
फिर भी, यह विधि अत्यंत प्रभावी मानी जाती है।
📌 निष्कर्ष
बालकों को अनुशासित करने में साक्षात्कार विधि एक अत्यंत उपयोगी और मानवीय तरीका है। यह केवल बाहरी अनुशासन नहीं लाती, बल्कि आंतरिक सुधार को प्रोत्साहित करती है।
दंड भय पैदा कर सकता है, परंतु साक्षात्कार समझ और विश्वास पैदा करता है। जब बालक अपनी समस्या स्वयं समझकर सुधार करता है, तभी वास्तविक अनुशासन स्थापित होता है।
अतः विद्यालयों में अनुशासन बनाए रखने के लिए साक्षात्कार विधि का उपयोग अत्यंत आवश्यक और लाभकारी है।
प्रश्न 05. सृजनात्मकता विकसित करने हेतु विद्यालयों में क्या प्रावधान किए जाने चाहिए ? स्पष्ट कीजिए।
सृजनात्मकता वह क्षमता है जिसके द्वारा छात्र नए और मौलिक विचार प्रस्तुत करता है। केवल किताबों को रटना सृजनात्मकता नहीं है। सृजनात्मकता तब विकसित होती है जब छात्र सोचता है, प्रश्न पूछता है, प्रयोग करता है और नए समाधान खोजता है।
आज का युग प्रतियोगिता और नवाचार का युग है। ऐसे समय में विद्यालयों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। यदि विद्यालय केवल परीक्षा केंद्र बन जाएँ, तो सृजनात्मकता दब जाती है। इसलिए विद्यालयों में ऐसे प्रावधान होने चाहिए जो बच्चों की कल्पनाशक्ति और मौलिक सोच को बढ़ाएँ।
अब हम विस्तार से समझेंगे कि सृजनात्मकता के विकास हेतु विद्यालयों में कौन-कौन से प्रावधान किए जाने चाहिए।
📌 सृजनात्मकता का महत्व
सृजनात्मकता व्यक्ति को भीड़ से अलग पहचान देती है।
🔹 क्यों आवश्यक है?
🔸 1. समस्या समाधान की क्षमता
सृजनात्मक छात्र कठिन परिस्थितियों में नए समाधान खोजता है।
🔸 2. आत्मविश्वास का विकास
नया विचार प्रस्तुत करने से आत्मविश्वास बढ़ता है।
🔸 3. समाज का विकास
नवाचार से समाज प्रगति करता है।
इसलिए विद्यालयों में सृजनात्मक वातावरण आवश्यक है।
📌 विद्यालयों में सृजनात्मकता विकसित करने हेतु आवश्यक प्रावधान
📍 1. स्वतंत्र और खुला वातावरण
विद्यालय का वातावरण भयमुक्त होना चाहिए।
🔹 क्या करें?
🔸 1. प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता
छात्रों को “क्यों” और “कैसे” पूछने के लिए प्रेरित किया जाए।
🔸 2. गलती को सीखने का अवसर मानें
गलत उत्तर पर डाँटने के बजाय मार्गदर्शन दें।
खुला वातावरण सृजनात्मक सोच को प्रोत्साहित करता है।
📍 2. गतिविधि आधारित शिक्षण
केवल व्याख्यान पद्धति से सृजनात्मकता नहीं बढ़ती।
🔹 आवश्यक कदम
🔸 1. प्रोजेक्ट कार्य
छात्रों को शोध और खोज का अवसर दें।
🔸 2. प्रयोगात्मक शिक्षण
विज्ञान, गणित और अन्य विषयों में प्रयोग करवाएँ।
🔸 3. समूह चर्चा
विचारों का आदान-प्रदान कराएँ।
गतिविधि आधारित शिक्षण सोचने की शक्ति बढ़ाता है।
📍 3. सहगामी गतिविधियों को महत्व
सृजनात्मकता केवल कक्षा में नहीं, बल्कि सहगामी गतिविधियों में भी विकसित होती है।
🔹 उदाहरण
🔸 1. चित्रकला और संगीत
कलात्मक अभिव्यक्ति को अवसर।
🔸 2. नाटक और वाद-विवाद
अभिनय और तर्क शक्ति का विकास।
🔸 3. खेल प्रतियोगिताएँ
टीमवर्क और नेतृत्व क्षमता।
इन गतिविधियों से छात्र की छिपी प्रतिभा सामने आती है।
📍 4. पुस्तकालय और संसाधनों की उपलब्धता
अच्छा पुस्तकालय सृजनात्मकता का केंद्र होता है।
🔹 क्या होना चाहिए?
🔸 1. विविध पुस्तकों का संग्रह
कहानी, विज्ञान, इतिहास और सामान्य ज्ञान।
🔸 2. इंटरनेट और डिजिटल संसाधन
नई जानकारी और शोध के लिए।
विविध जानकारी सृजनात्मक सोच को प्रेरित करती है।
📍 5. प्रेरणादायक शिक्षक
शिक्षक सृजनात्मकता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
🔹 शिक्षक की भूमिका
🔸 1. प्रोत्साहन देना
नए विचारों की सराहना करें।
🔸 2. उदाहरण प्रस्तुत करना
स्वयं सृजनात्मक कार्य करें।
🔸 3. व्यक्तिगत ध्यान
हर छात्र की क्षमता को पहचानें।
प्रेरक शिक्षक छात्रों को नई दिशा देता है।
📍 6. समस्या आधारित शिक्षण
छात्रों को वास्तविक जीवन की समस्याएँ दी जाएँ।
🔹 लाभ
🔸 1. विश्लेषण क्षमता बढ़ती है
छात्र सोचने पर मजबूर होता है।
🔸 2. समाधान खोजने की आदत
नवीन विचार उत्पन्न होते हैं।
इससे सृजनात्मकता व्यवहारिक रूप में विकसित होती है।
📍 7. पुरस्कार और मान्यता
नए विचारों को सम्मान देना चाहिए।
🔹 क्यों आवश्यक?
🔸 1. आत्मविश्वास बढ़ता है
छात्र को प्रेरणा मिलती है।
🔸 2. प्रतिस्पर्धात्मक भावना
अन्य छात्र भी प्रेरित होते हैं।
पुरस्कार सृजनात्मक प्रयासों को बढ़ावा देता है।
📍 8. परीक्षा प्रणाली में सुधार
केवल रटने पर आधारित परीक्षा सृजनात्मकता को दबाती है।
🔹 सुधार के उपाय
🔸 1. वर्णनात्मक प्रश्न
छात्र को अपने शब्दों में उत्तर लिखने का अवसर।
🔸 2. प्रोजेक्ट आधारित मूल्यांकन
व्यावहारिक कार्य को महत्व।
ऐसी परीक्षा प्रणाली सृजनात्मक सोच को बढ़ाती है।
📍 9. विविध अनुभव प्रदान करना
विद्यालय में विभिन्न अनुभवों का अवसर मिलना चाहिए।
🔹 उदाहरण
🔸 1. शैक्षिक भ्रमण
नई जगहों का अनुभव।
🔸 2. कार्यशालाएँ
विशेषज्ञों से सीखने का अवसर।
अनुभवों की विविधता कल्पनाशक्ति को बढ़ाती है।
📍 10. सकारात्मक और सहयोगी वातावरण
सृजनात्मकता दबाव में नहीं पनपती।
🔹 आवश्यक बातें
🔸 1. सहयोग की भावना
प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग भी हो।
🔸 2. आलोचना का संतुलन
रचनात्मक आलोचना करें।
सकारात्मक वातावरण छात्र को खुलकर सोचने का अवसर देता है।
📌 समग्र दृष्टिकोण
सृजनात्मकता विकसित करना केवल एक कार्यक्रम नहीं है।
यह विद्यालय की सोच और संस्कृति पर निर्भर करता है।
यदि विद्यालय छात्रों को सोचने, प्रश्न करने और प्रयोग करने की स्वतंत्रता देता है, तो सृजनात्मकता स्वतः विकसित होती है।
📌 निष्कर्ष
विद्यालयों में सृजनात्मकता विकसित करने के लिए स्वतंत्र वातावरण, गतिविधि आधारित शिक्षण, सहगामी गतिविधियाँ, प्रेरक शिक्षक, संसाधनों की उपलब्धता, समस्या आधारित शिक्षण और परीक्षा प्रणाली में सुधार जैसे प्रावधान आवश्यक हैं।
सृजनात्मकता केवल प्रतिभाशाली छात्रों के लिए नहीं है। हर छात्र में यह क्षमता होती है। आवश्यकता है सही मार्गदर्शन और उचित वातावरण की।
अतः विद्यालयों का कर्तव्य है कि वे ऐसे प्रावधान करें जिससे छात्र केवल ज्ञान प्राप्त न करें, बल्कि नए विचार उत्पन्न करने की क्षमता भी विकसित करें। यही सच्ची शिक्षा है और यही भविष्य की आवश्यकता है।
प्रश्न 06. मानसिक बुद्धि लब्धि पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
मानव जीवन में बुद्धि का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। बुद्धि के माध्यम से ही व्यक्ति सोचता है, समझता है, तर्क करता है और समस्याओं का समाधान करता है। लेकिन केवल यह जान लेना पर्याप्त नहीं कि कोई व्यक्ति बुद्धिमान है या नहीं। यह भी जानना आवश्यक है कि उसकी बुद्धि का स्तर कितना है।
इसी स्तर को मापने के लिए “मानसिक बुद्धि लब्धि” की संकल्पना सामने आई। मानसिक बुद्धि लब्धि को सामान्यतः “आई.क्यू.” (IQ) के रूप में जाना जाता है। यह किसी व्यक्ति की मानसिक क्षमता को संख्यात्मक रूप में व्यक्त करती है।
अब हम मानसिक बुद्धि लब्धि को सरल और क्रमबद्ध ढंग से समझेंगे।
📌 मानसिक बुद्धि लब्धि का अर्थ
मानसिक बुद्धि लब्धि का अर्थ है — व्यक्ति की मानसिक आयु और वास्तविक आयु के अनुपात के आधार पर प्राप्त बुद्धि स्तर।
सरल शब्दों में कहें तो, यह एक संख्या है जो बताती है कि किसी व्यक्ति की बुद्धि औसत से कम है, बराबर है या अधिक है।
📌 मानसिक आयु और वास्तविक आयु
मानसिक बुद्धि लब्धि को समझने से पहले दो शब्दों को समझना आवश्यक है।
📍 1. मानसिक आयु (Mental Age)
मानसिक आयु से तात्पर्य उस आयु स्तर से है जिस स्तर के प्रश्न व्यक्ति हल कर सकता है।
यदि 8 वर्ष का बच्चा 10 वर्ष के स्तर के प्रश्न हल कर लेता है, तो उसकी मानसिक आयु 10 वर्ष मानी जाएगी।
📍 2. वास्तविक आयु (Chronological Age)
वास्तविक आयु से तात्पर्य जन्म से अब तक की आयु है।
जैसे — यदि बच्चा 8 वर्ष का है, तो उसकी वास्तविक आयु 8 वर्ष है।
📌 मानसिक बुद्धि लब्धि (IQ) का सूत्र
मानसिक बुद्धि लब्धि की गणना इस प्रकार की जाती है —
बुद्धि लब्धि (IQ) = (मानसिक आयु ÷ वास्तविक आयु) × 100
उदाहरण के लिए —
यदि किसी बच्चे की मानसिक आयु 10 वर्ष है और वास्तविक आयु 8 वर्ष है, तो
IQ = (10 ÷ 8) × 100 = 125
इसका अर्थ है कि उसकी बुद्धि औसत से अधिक है।
📌 बुद्धि लब्धि का वर्गीकरण
IQ के आधार पर व्यक्तियों को विभिन्न श्रेणियों में बाँटा जाता है।
📍 1. 90 से 110 – औसत बुद्धि
यह सामान्य स्तर है। अधिकांश लोग इसी श्रेणी में आते हैं।
📍 2. 110 से ऊपर – उच्च बुद्धि
ऐसे व्यक्ति अधिक तेज और प्रतिभाशाली माने जाते हैं।
📍 3. 90 से कम – सामान्य से कम
ऐसे व्यक्तियों को विशेष सहायता की आवश्यकता हो सकती है।
📍 4. 130 से अधिक – अत्यंत प्रतिभाशाली
ऐसे व्यक्तियों को प्रतिभाशाली या मेधावी माना जाता है।
📌 मानसिक बुद्धि लब्धि का महत्व
📍 1. शैक्षिक मार्गदर्शन
IQ के आधार पर छात्र की क्षमता का अनुमान लगाया जाता है।
शिक्षक यह समझ सकते हैं कि किस छात्र को अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता है।
📍 2. विशेष शिक्षा
मानसिक रूप से कमजोर या अत्यधिक प्रतिभाशाली छात्रों के लिए विशेष कार्यक्रम बनाए जाते हैं।
📍 3. करियर मार्गदर्शन
बुद्धि स्तर के अनुसार विषय और क्षेत्र का चयन किया जा सकता है।
📍 4. अनुसंधान कार्य
मनोवैज्ञानिक अध्ययन में IQ का व्यापक उपयोग होता है।
📌 मानसिक बुद्धि लब्धि की सीमाएँ
हालाँकि IQ महत्वपूर्ण है, पर इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं।
📍 1. केवल बौद्धिक क्षमता का मापन
यह भावनात्मक बुद्धि, सृजनात्मकता या सामाजिक कौशल को नहीं मापता।
📍 2. सांस्कृतिक प्रभाव
कभी-कभी परीक्षण भाषा और संस्कृति से प्रभावित हो सकता है।
📍 3. पूर्ण व्यक्तित्व का मापन नहीं
IQ केवल बुद्धि का एक पक्ष बताता है, संपूर्ण व्यक्तित्व नहीं।
📌 आधुनिक दृष्टिकोण
आज के समय में केवल IQ को ही बुद्धि का अंतिम मापदंड नहीं माना जाता।
भावनात्मक बुद्धि (EQ), सामाजिक बुद्धि और सृजनात्मक बुद्धि भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
इसलिए व्यक्ति का मूल्यांकन करते समय समग्र दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
📌 निष्कर्ष
मानसिक बुद्धि लब्धि (IQ) व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता का संख्यात्मक मापन है। यह मानसिक आयु और वास्तविक आयु के अनुपात पर आधारित है।
यह शिक्षा, परामर्श और अनुसंधान के क्षेत्र में अत्यंत उपयोगी है। परंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि IQ व्यक्ति की संपूर्ण योग्यता का माप नहीं है।
अतः मानसिक बुद्धि लब्धि महत्वपूर्ण होते हुए भी इसे संतुलित और व्यापक दृष्टिकोण से समझना चाहिए।
प्रश्न 07. होवार्ड गार्डनर के बहुबुद्धि सिद्धान्त का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
बुद्धि को लंबे समय तक केवल एक ही क्षमता माना जाता था। लोगों को उनकी आई.क्यू. (IQ) के आधार पर बुद्धिमान या कम बुद्धिमान कहा जाता था। लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि हर व्यक्ति अलग प्रकार से प्रतिभाशाली होता है। कोई गणित में अच्छा होता है, कोई संगीत में, कोई खेल में, तो कोई लोगों से संबंध बनाने में।
इसी विचार को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक होवार्ड गार्डनर ने। उन्होंने बहुबुद्धि सिद्धान्त (Multiple Intelligence Theory) दिया। इस सिद्धान्त के अनुसार बुद्धि केवल एक नहीं होती, बल्कि कई प्रकार की होती है।
📌 बहुबुद्धि सिद्धान्त का अर्थ
बहुबुद्धि सिद्धान्त के अनुसार हर व्यक्ति में विभिन्न प्रकार की बुद्धियाँ होती हैं। सभी लोग समान प्रकार से बुद्धिमान नहीं होते।
गार्डनर ने कहा कि विद्यालयों में केवल भाषा और गणित को ही बुद्धि का मापदंड नहीं माना जाना चाहिए। कला, संगीत, खेल और सामाजिक क्षमता भी बुद्धि के रूप हैं।
📌 बहुबुद्धि सिद्धान्त की आवश्यकता
पहले बुद्धि को केवल IQ से मापा जाता था।
लेकिन कई बच्चे पढ़ाई में औसत होते हुए भी संगीत, चित्रकला या खेल में असाधारण होते हैं।
इसलिए बुद्धि की परिभाषा को व्यापक बनाना आवश्यक था। गार्डनर ने यही कार्य किया।
📌 गार्डनर द्वारा बताई गई प्रमुख बुद्धियाँ
गार्डनर ने प्रारंभ में 7 प्रकार की बुद्धियों का उल्लेख किया। बाद में कुछ और जोड़ी गईं। अब हम प्रमुख बुद्धियों को संक्षेप में समझते हैं।
📍 1. भाषायी बुद्धि (Linguistic Intelligence)
यह भाषा का सही उपयोग करने की क्षमता है।
🔹 उदाहरण
लेखक
कवि
वक्ता
ऐसे लोग शब्दों का प्रभावी प्रयोग करते हैं।
📍 2. तार्किक-गणितीय बुद्धि (Logical-Mathematical Intelligence)
यह तर्क और गणित में कुशलता है।
🔹 उदाहरण
वैज्ञानिक
गणितज्ञ
इंजीनियर
ये लोग समस्या समाधान में कुशल होते हैं।
📍 3. दृश्य-स्थानिक बुद्धि (Visual-Spatial Intelligence)
चित्र, आकृति और स्थान को समझने की क्षमता।
🔹 उदाहरण
चित्रकार
वास्तुकार
डिजाइनर
ये लोग कल्पना में चित्र बना सकते हैं।
📍 4. शारीरिक-गतिशील बुद्धि (Bodily-Kinesthetic Intelligence)
शरीर का कुशल उपयोग करने की क्षमता।
🔹 उदाहरण
खिलाड़ी
नर्तक
अभिनेता
ये लोग अपने शरीर के माध्यम से अभिव्यक्ति करते हैं।
📍 5. संगीतात्मक बुद्धि (Musical Intelligence)
संगीत को समझने और रचने की क्षमता।
🔹 उदाहरण
गायक
संगीतकार
ये लोग स्वर और लय को आसानी से पहचानते हैं।
📍 6. सामाजिक बुद्धि (Interpersonal Intelligence)
दूसरों को समझने और उनसे संबंध बनाने की क्षमता।
🔹 उदाहरण
शिक्षक
नेता
परामर्शदाता
ये लोग समूह में अच्छा व्यवहार करते हैं।
📍 7. आत्म-बोध बुद्धि (Intrapersonal Intelligence)
स्वयं को समझने की क्षमता।
🔹 विशेषता
अपनी भावनाओं को पहचानना
आत्म-नियंत्रण
ऐसे व्यक्ति आत्मविश्लेषण में कुशल होते हैं।
📍 8. प्राकृतिक बुद्धि (Naturalistic Intelligence)
प्रकृति और पर्यावरण को समझने की क्षमता।
🔹 उदाहरण
किसान
जीवविज्ञानी
पर्यावरण विशेषज्ञ
ये लोग प्रकृति के साथ जुड़ाव रखते हैं।
📌 बहुबुद्धि सिद्धान्त का महत्व
📍 1. शिक्षा में सुधार
विद्यालयों को केवल रटने पर आधारित नहीं होना चाहिए।
हर छात्र की अलग बुद्धि को पहचानना चाहिए।
📍 2. आत्मसम्मान में वृद्धि
जब छात्र समझता है कि उसकी भी कोई विशेष प्रतिभा है, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है।
📍 3. विविध अवसर
कला, खेल, संगीत और अन्य क्षेत्रों को भी समान महत्व मिलता है।
📌 बहुबुद्धि सिद्धान्त की विशेषताएँ
बुद्धि बहुआयामी है।
हर व्यक्ति में सभी प्रकार की बुद्धियाँ होती हैं, पर स्तर अलग होता है।
शिक्षा को छात्र-केंद्रित होना चाहिए।
📌 सीमाएँ
सभी बुद्धियों को मापना कठिन है।
कुछ विद्वानों ने इसे पूरी तरह वैज्ञानिक प्रमाणित नहीं माना।
फिर भी शिक्षा के क्षेत्र में इसका प्रभाव बहुत व्यापक है।
📌 निष्कर्ष
होवार्ड गार्डनर का बहुबुद्धि सिद्धान्त बुद्धि की पारंपरिक धारणा को बदलने वाला सिद्धान्त है। इसने यह स्पष्ट किया कि बुद्धि केवल गणित और भाषा तक सीमित नहीं है।
हर व्यक्ति किसी न किसी क्षेत्र में विशेष होता है। यदि शिक्षा प्रणाली इन सभी बुद्धियों को पहचानकर विकसित करे, तो प्रत्येक छात्र अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुँच सकता है।
अतः बहुबुद्धि सिद्धान्त शिक्षा को अधिक मानवीय, व्यापक और छात्र-केंद्रित बनाता है।
प्रश्न 08. अधिगमकर्ता को अभिप्रेरित करने में शिक्षक की भूमिका का वर्णन कीजिए।
अधिगम का अर्थ है सीखना, और अभिप्रेरणा का अर्थ है प्रेरणा या वह आंतरिक शक्ति जो व्यक्ति को कार्य करने के लिए उत्साहित करती है। यदि छात्र के अंदर सीखने की इच्छा ही न हो, तो कोई भी शिक्षक उसे प्रभावी ढंग से नहीं पढ़ा सकता। इसलिए कहा जाता है कि शिक्षा का पहला कदम है — छात्र को प्रेरित करना।
अभिप्रेरणा दो प्रकार की होती है — आंतरिक (जो भीतर से आती है) और बाह्य (जो पुरस्कार या दंड से उत्पन्न होती है)। एक अच्छा शिक्षक दोनों प्रकार की प्रेरणा का संतुलित उपयोग करता है।
अब हम विस्तार से समझेंगे कि अधिगमकर्ता को अभिप्रेरित करने में शिक्षक की क्या भूमिका होती है।
📌 अभिप्रेरणा का अर्थ और महत्व
अभिप्रेरणा वह शक्ति है जो व्यक्ति को लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।
🔹 क्यों आवश्यक है?
🔸 1. सीखने की गति बढ़ती है
प्रेरित छात्र अधिक ध्यान से पढ़ता है।
🔸 2. आत्मविश्वास में वृद्धि
सफलता की भावना से आत्मविश्वास बढ़ता है।
🔸 3. लक्ष्य प्राप्ति
प्रेरणा से छात्र अपने लक्ष्य तक पहुँचता है।
इसलिए शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
📌 अधिगमकर्ता को अभिप्रेरित करने में शिक्षक की प्रमुख भूमिकाएँ
📍 1. प्रेरणादायक व्यक्तित्व प्रस्तुत करना
शिक्षक स्वयं एक आदर्श होना चाहिए।
🔹 कैसे?
🔸 1. सकारात्मक दृष्टिकोण
शिक्षक का व्यवहार उत्साहपूर्ण हो।
🔸 2. समय पालन और अनुशासन
शिक्षक का आचरण छात्रों को प्रेरित करता है।
जब शिक्षक उत्साही होता है, तो छात्र भी प्रेरित होते हैं।
📍 2. लक्ष्य स्पष्ट करना
छात्र तभी प्रेरित होते हैं जब उन्हें पता हो कि वे क्या और क्यों पढ़ रहे हैं।
🔹 क्या करें?
🔸 1. पाठ का उद्देश्य बताना
आज का पाठ क्यों महत्वपूर्ण है, यह स्पष्ट करें।
🔸 2. भविष्य से जोड़ना
विषय को जीवन और करियर से जोड़ें।
स्पष्ट लक्ष्य छात्र को दिशा देता है।
📍 3. सकारात्मक प्रोत्साहन देना
प्रशंसा और पुरस्कार अभिप्रेरणा के महत्वपूर्ण साधन हैं।
🔹 कैसे?
🔸 1. मौखिक प्रशंसा
“बहुत अच्छा”, “शाबाश” जैसे शब्द।
🔸 2. प्रमाण पत्र या पुरस्कार
छात्रों के प्रयास को सम्मान दें।
सकारात्मक प्रोत्साहन से छात्र आगे बढ़ते हैं।
📍 4. रुचिकर शिक्षण विधियों का प्रयोग
यदि पाठ उबाऊ हो, तो प्रेरणा कम हो जाती है।
🔹 उपाय
🔸 1. कहानी और उदाहरण
जटिल विषय को सरल और रोचक बनाएं।
🔸 2. गतिविधि आधारित शिक्षण
समूह कार्य, प्रोजेक्ट और प्रयोग करवाएं।
रुचिकर शिक्षण छात्र की जिज्ञासा बढ़ाता है।
📍 5. व्यक्तिगत भिन्नताओं का ध्यान
हर छात्र की क्षमता अलग होती है।
🔹 शिक्षक की भूमिका
🔸 1. कमजोर छात्रों को अतिरिक्त सहायता
उन्हें निराश न होने दें।
🔸 2. प्रतिभाशाली छात्रों को चुनौतीपूर्ण कार्य
उनकी क्षमता को बढ़ावा दें।
व्यक्तिगत ध्यान से छात्र प्रेरित रहते हैं।
📍 6. स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का वातावरण
प्रतिस्पर्धा प्रेरणा का स्रोत हो सकती है।
🔹 कैसे?
🔸 1. समूह प्रतियोगिताएँ
टीम भावना विकसित करें।
🔸 2. परिणाम की सराहना
प्रयास को महत्व दें।
स्वस्थ प्रतिस्पर्धा आत्मविकास को बढ़ाती है।
📍 7. भावनात्मक सहयोग
कई बार छात्र तनाव या चिंता से ग्रस्त होते हैं।
🔹 शिक्षक की जिम्मेदारी
🔸 1. सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार
छात्र की बात ध्यान से सुनें।
🔸 2. परामर्श देना
समस्या का समाधान सुझाएँ।
भावनात्मक समर्थन प्रेरणा को बनाए रखता है।
📍 8. आत्मनिर्भरता का विकास
शिक्षक को छात्रों को स्वयं सोचने और निर्णय लेने का अवसर देना चाहिए।
🔹 लाभ
🔸 1. आत्मविश्वास बढ़ता है
छात्र अपनी क्षमता पहचानता है।
🔸 2. आंतरिक प्रेरणा विकसित
स्वयं सीखने की इच्छा उत्पन्न होती है।
📍 9. सफलता के छोटे अवसर देना
छोटे-छोटे लक्ष्य तय करें।
🔹 क्यों?
🔸 1. उपलब्धि की भावना
छात्र को लगे कि वह सक्षम है।
🔸 2. निरंतर प्रगति
छोटे कदम बड़े लक्ष्य तक पहुँचाते हैं।
📍 10. सकारात्मक कक्षा वातावरण
कक्षा का वातावरण सहयोगपूर्ण होना चाहिए।
🔹 आवश्यक बातें
🔸 1. भयमुक्त वातावरण
डर से नहीं, प्रेरणा से सीखें।
🔸 2. सम्मान की भावना
हर छात्र का सम्मान करें।
सकारात्मक वातावरण प्रेरणा को स्थायी बनाता है।
📌 शिक्षक की समग्र भूमिका
शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला नहीं है। वह मार्गदर्शक, मित्र और प्रेरक भी है।
यदि शिक्षक समझ, सहानुभूति और प्रोत्साहन के साथ कार्य करे, तो छात्र स्वाभाविक रूप से प्रेरित होंगे।
📌 निष्कर्ष
अधिगमकर्ता को अभिप्रेरित करने में शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षक अपने व्यक्तित्व, शिक्षण विधि, प्रोत्साहन और सहयोग के माध्यम से छात्र में सीखने की इच्छा जागृत कर सकता है।
प्रेरित छात्र ही सफल छात्र बनता है। इसलिए शिक्षक को केवल पाठ पढ़ाने पर नहीं, बल्कि प्रेरणा उत्पन्न करने पर भी ध्यान देना चाहिए।
अतः कहा जा सकता है कि शिक्षक ही वह शक्ति है जो अधिगमकर्ता को लक्ष्य की ओर अग्रसर करती है और उसके जीवन को दिशा देती है।
.png)