प्रश्न 01. लोक प्रशासन से आप क्या समझते हैं? इसके स्वरूप और विषय क्षेत्र पर प्रकाश डालिए।
📌 लोक प्रशासन का अर्थ क्या है?
लोक प्रशासन दो शब्दों से मिलकर बना है — लोक और प्रशासन।
लोक का अर्थ है जनता और प्रशासन का अर्थ है कार्य संचालन या प्रबंधन।
इस प्रकार, लोक प्रशासन का सीधा अर्थ है —
जनता से संबंधित कार्यों का संचालन।
सरल शब्दों में कहें तो —
👉 जब सरकार जनता के लिए नीतियाँ और योजनाएँ बनाती है और उन्हें जमीन पर लागू करती है, उसी प्रक्रिया को लोक प्रशासन कहते हैं।
सरकार का काम केवल कानून बनाना नहीं होता, बल्कि उन्हें लागू करना भी होता है। यही कार्य लोक प्रशासन करता है।
इसलिए कहा जाता है —
लोक प्रशासन सरकार का कार्यकारी (Executive) भाग है।
📌 लोक प्रशासन की विद्वानों द्वारा व्याख्या
विभिन्न विद्वानों ने लोक प्रशासन को अलग-अलग रूप में समझाया है।
🔹 वुडरो विल्सन के अनुसार
लोक प्रशासन सरकार के कार्यों का विस्तृत और व्यवस्थित क्रियान्वयन है।
🔹 लूथर गुलिक के अनुसार
लोक प्रशासन सरकार के कार्यों का प्रबंधन है।
इन विचारों से स्पष्ट होता है कि लोक प्रशासन का मुख्य उद्देश्य सरकारी कार्यों को व्यवस्थित रूप से लागू करना है।
📌 लोक प्रशासन का स्वरूप
लोक प्रशासन का स्वरूप समय के साथ बदलता रहा है। आधुनिक युग में इसका स्वरूप बहुत व्यापक और विकसित हो चुका है।
📍 1. कार्यकारी स्वरूप
लोक प्रशासन सरकार के कार्यकारी अंग से संबंधित है।
यह कानून और नीतियों को लागू करता है।
उदाहरण के लिए —
यदि सरकार शिक्षा के अधिकार का कानून बनाती है, तो उसका पालन करवाने और व्यवस्था बनाने का कार्य प्रशासन करता है।
📍 2. लोक-कल्याणकारी स्वरूप
आज का राज्य “लोक-कल्याणकारी राज्य” है।
इसलिए प्रशासन का उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि जनता का कल्याण करना है।
🔹 गरीबों के लिए योजनाएँ
🔹 किसानों के लिए सहायता
🔹 स्वास्थ्य सेवाएँ
🔹 शिक्षा सुविधाएँ
ये सभी प्रशासन के माध्यम से ही जनता तक पहुँचती हैं।
📍 3. वैज्ञानिक एवं तकनीकी स्वरूप
आज प्रशासन में तकनीक का उपयोग बढ़ गया है।
अब फाइलों की जगह डिजिटल सिस्टम का उपयोग हो रहा है।
🔹 ई-गवर्नेंस
🔹 ऑनलाइन आवेदन
🔹 डिजिटल भुगतान
इससे प्रशासन अधिक पारदर्शी और तेज़ हुआ है।
📍 4. सामाजिक एवं राजनीतिक स्वरूप
लोक प्रशासन समाज की आवश्यकताओं के अनुसार कार्य करता है।
यह पूरी तरह राजनीति से अलग भी नहीं है, क्योंकि यह सरकार की नीतियों को लागू करता है।
इस प्रकार इसका स्वरूप सामाजिक और राजनीतिक दोनों है।
📍 5. गतिशील स्वरूप
लोक प्रशासन स्थिर नहीं है।
समय और परिस्थितियों के अनुसार इसमें बदलाव आता रहता है।
पहले प्रशासन केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित था,
लेकिन आज यह विकास और कल्याण के कार्यों में भी सक्रिय है।
📌 लोक प्रशासन का विषय क्षेत्र
लोक प्रशासन का विषय क्षेत्र बहुत विस्तृत है। यह केवल सरकारी दफ्तरों तक सीमित नहीं है।
📍 1. नीतियों का क्रियान्वयन
सरकार जो भी योजनाएँ बनाती है, उनका क्रियान्वयन प्रशासन करता है।
उदाहरण —
🔹 ग्रामीण विकास योजना
🔹 स्वास्थ्य बीमा योजना
🔹 रोजगार योजना
📍 2. संगठन और प्रबंधन
सरकारी विभागों का गठन, कर्मचारियों का प्रबंधन और कार्यों का विभाजन प्रशासन के अंतर्गत आता है।
इसमें शामिल हैं —
🔹 मंत्रालयों की संरचना
🔹 अधिकारियों की नियुक्ति
🔹 कार्यों का समन्वय
📍 3. कार्मिक प्रशासन
सरकारी कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण और पदोन्नति भी लोक प्रशासन का हिस्सा है।
🔹 भर्ती प्रक्रिया
🔹 प्रशिक्षण कार्यक्रम
🔹 सेवा नियम
📍 4. वित्तीय प्रशासन
सरकार की आय और व्यय का प्रबंधन भी प्रशासन करता है।
🔹 बजट बनाना
🔹 कर वसूली
🔹 सरकारी खर्च का नियंत्रण
📍 5. लोक उत्तरदायित्व
लोक प्रशासन जनता के प्रति जवाबदेह होता है।
आज पारदर्शिता और जवाबदेही बहुत महत्वपूर्ण हो गई है।
सूचना का अधिकार जैसे कानून प्रशासन को उत्तरदायी बनाते हैं।
📍 6. विकास प्रशासन
देश के विकास से जुड़ी योजनाओं का संचालन भी प्रशासन करता है।
🔹 सड़क निर्माण
🔹 शिक्षा विस्तार
🔹 स्वास्थ्य सेवाएँ
📌 लोक प्रशासन का महत्व
आज के समय में लोक प्रशासन की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गई है।
🔹 यह शासन को प्रभावी बनाता है।
🔹 जनता और सरकार के बीच सेतु का कार्य करता है।
🔹 विकास योजनाओं को जमीन तक पहुँचाता है।
🔹 सामाजिक न्याय स्थापित करता है।
यदि प्रशासन ईमानदार और सक्षम हो, तो देश तेजी से विकास करता है।
📌 आधुनिक युग में लोक प्रशासन
आज प्रशासन का दृष्टिकोण बदल गया है।
अब यह केवल आदेश देने वाली संस्था नहीं, बल्कि सेवा प्रदान करने वाली संस्था बन गया है।
🔹 नागरिक-केंद्रित प्रशासन
🔹 पारदर्शिता
🔹 भागीदारी
🔹 डिजिटल सेवाएँ
इन सबके कारण प्रशासन अधिक प्रभावी और जवाबदेह बन गया है।
📌 निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि लोक प्रशासन शासन व्यवस्था की रीढ़ है।
यह सरकार की नीतियों और योजनाओं को लागू करके जनता के जीवन को बेहतर बनाता है।
इसका स्वरूप व्यापक, गतिशील और लोक-कल्याणकारी है।
इसका विषय क्षेत्र भी अत्यंत विस्तृत है, जिसमें नीति क्रियान्वयन, संगठन, वित्त, कार्मिक प्रबंधन और विकास कार्य शामिल हैं।
एक मजबूत और पारदर्शी प्रशासन ही अच्छे शासन की पहचान है।
प्रश्न 02. लोक प्रशासन के आधुनिक उपागमों की विस्तृत चर्चा कीजिए।
📌 प्रस्तावना : आधुनिक उपागमों की आवश्यकता क्यों पड़ी?
लोक प्रशासन का प्रारंभिक स्वरूप पारंपरिक और नियमों पर आधारित था। उसमें दक्षता, नियंत्रण और अनुशासन पर अधिक बल दिया जाता था। लेकिन समय के साथ समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था में परिवर्तन आया।
आज राज्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह विकास, सामाजिक न्याय और जनकल्याण के कार्यों में सक्रिय है। इसी परिवर्तन के कारण लोक प्रशासन में भी नए विचार और दृष्टिकोण विकसित हुए, जिन्हें आधुनिक उपागम (Modern Approaches) कहा जाता है।
इन उपागमों का उद्देश्य प्रशासन को अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी, प्रभावी और नागरिक-केंद्रित बनाना है।
📌 आधुनिक उपागम का अर्थ
उपागम का अर्थ है — किसी विषय को समझने और उसके अध्ययन की विशेष पद्धति या दृष्टिकोण।
अतः लोक प्रशासन के आधुनिक उपागम वे नए दृष्टिकोण हैं, जिनके माध्यम से प्रशासन को अधिक व्यावहारिक, मानवीय और परिणामोन्मुख बनाया गया।
📌 प्रमुख आधुनिक उपागमों की विस्तृत चर्चा
📍 1. मानव संबंध उपागम (Human Relations Approach)
यह उपागम 20वीं शताब्दी में विकसित हुआ। इसका मुख्य विचार यह है कि प्रशासन केवल नियमों और संरचनाओं से नहीं चलता, बल्कि उसमें काम करने वाले लोगों की भावनाएँ, प्रेरणा और संतुष्टि भी महत्वपूर्ण होती है।
🔹 इस उपागम के अनुसार —
कर्मचारियों के साथ अच्छा व्यवहार होना चाहिए
उन्हें प्रेरित किया जाना चाहिए
टीम भावना विकसित की जानी चाहिए
यदि कर्मचारी संतुष्ट होंगे तो कार्यक्षमता भी बढ़ेगी।
यह उपागम प्रशासन को अधिक मानवीय बनाता है।
📍 2. व्यवहारवादी उपागम (Behavioral Approach)
यह उपागम प्रशासन में मानव व्यवहार का अध्ययन करता है।
इसके अनुसार प्रशासन को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि लोग कैसे सोचते हैं, कैसे निर्णय लेते हैं और किस प्रकार कार्य करते हैं।
🔹 इसकी मुख्य विशेषताएँ —
वैज्ञानिक अध्ययन
अनुभव आधारित निष्कर्ष
व्यवहार पर ध्यान
इस उपागम ने प्रशासन को अधिक वैज्ञानिक और व्यावहारिक बनाया।
📍 3. प्रणाली उपागम (System Approach)
प्रणाली उपागम के अनुसार प्रशासन एक संपूर्ण प्रणाली (System) है, जिसमें कई भाग आपस में जुड़े होते हैं।
यदि किसी एक भाग में समस्या आती है तो उसका प्रभाव पूरे प्रशासन पर पड़ता है।
🔹 उदाहरण —
शिक्षा विभाग
स्वास्थ्य विभाग
वित्त विभाग
ये सभी मिलकर एक संपूर्ण प्रशासनिक प्रणाली बनाते हैं।
इस उपागम से प्रशासन में समन्वय और संतुलन पर बल दिया जाता है।
📍 4. संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम (Structural-Functional Approach)
इस उपागम के अनुसार प्रशासन की प्रत्येक संरचना (Structure) का एक विशेष कार्य (Function) होता है।
🔹 जैसे —
विधायिका का कार्य कानून बनाना
कार्यपालिका का कार्य उन्हें लागू करना
न्यायपालिका का कार्य न्याय देना
इस दृष्टिकोण से प्रशासन को समझना आसान हो जाता है।
📍 5. विकास प्रशासन उपागम (Development Administration)
यह उपागम विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए महत्वपूर्ण है।
इसका उद्देश्य प्रशासन को विकास की दिशा में सक्रिय बनाना है।
🔹 इसके अंतर्गत —
गरीबी उन्मूलन
शिक्षा विस्तार
स्वास्थ्य सुधार
ग्रामीण विकास
पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
यह उपागम प्रशासन को परिवर्तन का माध्यम मानता है।
📍 6. नवीन लोक प्रशासन (New Public Administration)
1960 के दशक में यह उपागम विकसित हुआ।
इसका मुख्य उद्देश्य प्रशासन में सामाजिक न्याय और समानता को बढ़ावा देना था।
🔹 इसकी विशेषताएँ —
जनसामान्य की भागीदारी
सामाजिक समानता
नैतिक मूल्यों पर बल
यह उपागम कहता है कि प्रशासन केवल कुशल (Efficient) ही नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण (Just) भी होना चाहिए।
📍 7. नवीन लोक प्रबंधन (New Public Management - NPM)
यह उपागम 1980 के दशक में लोकप्रिय हुआ।
इसमें निजी क्षेत्र की कार्यप्रणालियों को सरकारी क्षेत्र में लागू करने पर बल दिया गया।
🔹 मुख्य विशेषताएँ —
परिणाम पर आधारित कार्य
प्रतिस्पर्धा
निजीकरण
लागत में कमी
इस उपागम का उद्देश्य प्रशासन को अधिक कुशल और उत्तरदायी बनाना है।
📍 8. सुशासन उपागम (Good Governance Approach)
आधुनिक समय में यह उपागम अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सुशासन का अर्थ है — पारदर्शिता, जवाबदेही, सहभागिता और कानून का पालन।
🔹 इसके प्रमुख तत्व —
पारदर्शिता
उत्तरदायित्व
जनभागीदारी
भ्रष्टाचार नियंत्रण
यह उपागम प्रशासन को जनता के प्रति अधिक जिम्मेदार बनाता है।
📍 9. ई-गवर्नेंस उपागम
तकनीकी विकास के साथ प्रशासन में डिजिटल प्रणाली का उपयोग बढ़ा है।
🔹 उदाहरण —
ऑनलाइन सेवाएँ
डिजिटल भुगतान
ई-फाइलिंग
इससे प्रशासन तेज, पारदर्शी और सरल हुआ है।
📌 आधुनिक उपागमों की विशेषताएँ
🔹 मानवीय दृष्टिकोण
🔹 वैज्ञानिक पद्धति
🔹 विकास पर जोर
🔹 सामाजिक न्याय
🔹 तकनीकी उपयोग
🔹 नागरिक-केंद्रित प्रशासन
इन उपागमों ने लोक प्रशासन को पारंपरिक ढांचे से निकालकर आधुनिक और प्रगतिशील बनाया।
📌 आधुनिक उपागमों का महत्व
आज के लोकतांत्रिक और विकासशील समाज में इन उपागमों का अत्यधिक महत्व है।
🔹 प्रशासन को प्रभावी बनाते हैं
🔹 जनता का विश्वास बढ़ाते हैं
🔹 भ्रष्टाचार कम करने में सहायक
🔹 विकास को गति देते हैं
🔹 पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं
📌 निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि लोक प्रशासन के आधुनिक उपागमों ने प्रशासन को एक नई दिशा प्रदान की है।
जहाँ पारंपरिक प्रशासन केवल नियमों और नियंत्रण पर आधारित था, वहीं आधुनिक उपागम प्रशासन को अधिक मानवीय, विकासोन्मुख और नागरिक-केंद्रित बनाते हैं।
आज के समय में सुशासन, पारदर्शिता और सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए इन उपागमों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस प्रकार, आधुनिक उपागमों ने लोक प्रशासन को केवल शासन की प्रक्रिया न बनाकर, बल्कि विकास और सामाजिक परिवर्तन का सशक्त साधन बना दिया है।
प्रश्न 03. विकासशील और विकसित देशों की राजनीतिक एवं प्रशासनिक विशेषताओं का मूल्यांकन कीजिए।
📌 प्रस्तावना : तुलना की आवश्यकता क्यों?
विश्व के सभी देशों की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था एक समान नहीं होती। कुछ देश आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी दृष्टि से अत्यधिक उन्नत हैं, जिन्हें विकसित देश कहा जाता है; जबकि कुछ देश अभी विकास की प्रक्रिया में हैं, जिन्हें विकासशील देश कहा जाता है।
राजनीतिक और प्रशासनिक ढाँचा किसी भी देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए विकासशील और विकसित देशों की विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन करना आवश्यक है, ताकि यह समझा जा सके कि विकास की दिशा में कौन-से तत्व सहायक होते हैं और किन कमियों को दूर करने की आवश्यकता होती है।
📌 विकसित देशों की राजनीतिक विशेषताएँ
📍 1. स्थिर एवं परिपक्व लोकतंत्र
विकसित देशों में लोकतंत्र मजबूत और स्थिर होता है। वहाँ चुनाव नियमित, निष्पक्ष और पारदर्शी होते हैं।
🔹 राजनीतिक दलों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा
🔹 सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण
🔹 कानून का समान रूप से पालन
इससे राजनीतिक स्थिरता बनी रहती है, जो विकास के लिए अनिवार्य है।
📍 2. कानून का शासन (Rule of Law)
विकसित देशों में कानून सर्वोपरि होता है।
🔹 सभी नागरिक कानून के सामने समान
🔹 न्यायपालिका स्वतंत्र
🔹 भ्रष्टाचार कम
कानून का सख्त पालन प्रशासन को प्रभावी बनाता है।
📍 3. उच्च राजनीतिक जागरूकता
विकसित देशों में नागरिक शिक्षित और राजनीतिक रूप से जागरूक होते हैं।
🔹 मतदान में अधिक भागीदारी
🔹 नीतियों पर खुली चर्चा
🔹 नागरिक अधिकारों के प्रति सजगता
यह जागरूकता लोकतंत्र को मजबूत बनाती है।
📍 4. मजबूत संस्थाएँ
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका स्वतंत्र और संतुलित रूप से कार्य करती हैं।
संस्थागत मजबूती राजनीतिक स्थिरता का आधार है।
📌 विकसित देशों की प्रशासनिक विशेषताएँ
📍 1. पेशेवर एवं कुशल प्रशासन
विकसित देशों में प्रशासन प्रशिक्षित और विशेषज्ञों द्वारा संचालित होता है।
🔹 योग्यता आधारित भर्ती
🔹 नियमित प्रशिक्षण
🔹 स्पष्ट कार्य-विभाजन
इससे कार्यक्षमता बढ़ती है।
📍 2. पारदर्शिता और जवाबदेही
🔹 सूचना की उपलब्धता
🔹 जनसुनवाई
🔹 भ्रष्टाचार पर नियंत्रण
प्रशासन जनता के प्रति उत्तरदायी होता है।
📍 3. तकनीकी उन्नति
विकसित देशों में ई-गवर्नेंस और डिजिटल प्रशासन का व्यापक उपयोग होता है।
🔹 ऑनलाइन सेवाएँ
🔹 डिजिटल रिकॉर्ड
🔹 त्वरित निर्णय
इससे समय और संसाधनों की बचत होती है।
📍 4. विकेंद्रीकरण
स्थानीय सरकारों को पर्याप्त अधिकार दिए जाते हैं।
इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज़ और प्रभावी होती है।
📌 विकासशील देशों की राजनीतिक विशेषताएँ
📍 1. राजनीतिक अस्थिरता
कई विकासशील देशों में सरकारें बार-बार बदलती हैं।
🔹 गठबंधन की राजनीति
🔹 आंतरिक संघर्ष
🔹 सत्ता संघर्ष
यह अस्थिरता विकास में बाधा बनती है।
📍 2. कमजोर संस्थाएँ
संवैधानिक संस्थाएँ पूरी तरह मजबूत नहीं होतीं।
🔹 न्यायपालिका पर दबाव
🔹 राजनीतिक हस्तक्षेप
🔹 प्रशासन में पक्षपात
इससे शासन की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
📍 3. सीमित राजनीतिक जागरूकता
कुछ देशों में शिक्षा का स्तर कम होने के कारण नागरिकों में राजनीतिक जागरूकता कम होती है।
🔹 वोट बैंक की राजनीति
🔹 जातीय या धार्मिक प्रभाव
🔹 भावनात्मक मुद्दों पर निर्णय
यह लोकतंत्र को कमजोर कर सकता है।
📍 4. भ्रष्टाचार की समस्या
कई विकासशील देशों में भ्रष्टाचार एक गंभीर समस्या है।
🔹 रिश्वत
🔹 संसाधनों का दुरुपयोग
🔹 नीतियों का गलत क्रियान्वयन
यह विकास को धीमा करता है।
📌 विकासशील देशों की प्रशासनिक विशेषताएँ
📍 1. संसाधनों की कमी
प्रशासन के पास पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी संसाधन नहीं होते।
🔹 बजट की कमी
🔹 प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी
🔹 अधूरी अधोसंरचना
📍 2. नौकरशाही की जटिलता
🔹 लालफीताशाही
🔹 निर्णय लेने में देरी
🔹 अधिक कागजी कार्य
इससे जनता को सेवाएँ समय पर नहीं मिल पातीं।
📍 3. केंद्रीकरण
अधिकांश निर्णय केंद्र स्तर पर लिए जाते हैं।
स्थानीय स्तर पर अधिकारों की कमी से प्रशासन कम प्रभावी हो जाता है।
📍 4. विकासोन्मुख प्रशासन
हालाँकि विकासशील देशों में प्रशासन विकास की दिशा में कार्य करता है।
🔹 गरीबी उन्मूलन योजनाएँ
🔹 शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार
🔹 ग्रामीण विकास कार्यक्रम
ये प्रयास विकास की ओर महत्वपूर्ण कदम हैं।
📌 तुलनात्मक मूल्यांकन
विकसित देशों की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था अधिक स्थिर, पारदर्शी और कुशल होती है। वहीं विकासशील देशों में कई चुनौतियाँ होती हैं, जैसे संसाधनों की कमी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता।
लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि विकासशील देश निरंतर सुधार की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
🔹 संस्थागत सुधार
🔹 डिजिटल प्रशासन
🔹 पारदर्शिता की पहल
🔹 लोकतांत्रिक मजबूती
इन प्रयासों से धीरे-धीरे अंतर कम हो रहा है।
📌 समालोचनात्मक दृष्टि
यह मान लेना सही नहीं होगा कि सभी विकसित देश पूर्णतः आदर्श हैं या सभी विकासशील देश कमजोर हैं।
कुछ विकसित देशों में भी —
🔹 राजनीतिक ध्रुवीकरण
🔹 आर्थिक असमानता
🔹 सामाजिक तनाव
देखे जाते हैं।
इसी प्रकार कई विकासशील देशों ने प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से उल्लेखनीय प्रगति की है।
इसलिए मूल्यांकन करते समय परिस्थितियों और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखना आवश्यक है।
📌 निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि विकसित देशों की राजनीतिक स्थिरता, मजबूत संस्थाएँ और कुशल प्रशासन उनके विकास का आधार हैं।
विकासशील देशों में चुनौतियाँ अधिक हैं, परंतु सुधार और परिवर्तन की प्रक्रिया जारी है।
यदि विकासशील देश —
🔹 राजनीतिक स्थिरता
🔹 पारदर्शिता
🔹 प्रशासनिक सुधार
🔹 शिक्षा और तकनीकी विकास
पर ध्यान दें, तो वे भी विकसित देशों की श्रेणी में पहुँच सकते हैं।
इस प्रकार, राजनीतिक और प्रशासनिक विशेषताएँ किसी भी देश की प्रगति का मूल आधार होती हैं।
सुदृढ़ राजनीति और प्रभावी प्रशासन ही समग्र विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
प्रश्न 04. नीति आयोग के संगठन एवं कार्यों की विस्तारपूर्वक व्याख्या कीजिए।
📌 प्रस्तावना : नीति आयोग की स्थापना की पृष्ठभूमि
भारत में स्वतंत्रता के बाद आर्थिक नियोजन के लिए योजना आयोग की स्थापना की गई थी। समय के साथ देश की आर्थिक, सामाजिक और वैश्विक परिस्थितियाँ बदल गईं। बदलते समय की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग को समाप्त कर नीति आयोग (NITI Aayog) की स्थापना की गई।
नीति आयोग का उद्देश्य देश में सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बढ़ावा देना, राज्यों को नीति निर्माण में भागीदार बनाना तथा दीर्घकालिक विकास की दिशा तय करना है।
यह संस्था “थिंक टैंक” के रूप में कार्य करती है, जो केंद्र और राज्यों को नीति संबंधी सुझाव देती है।
📌 नीति आयोग का अर्थ और उद्देश्य
नीति आयोग का पूरा नाम है —
National Institution for Transforming India
इसका मुख्य उद्देश्य भारत को परिवर्तन और विकास की दिशा में आगे बढ़ाना है।
🔹 दीर्घकालिक नीतियों का निर्माण
🔹 सतत विकास को बढ़ावा
🔹 राज्यों के साथ सहयोग
🔹 नवाचार और सुधार
नीति आयोग केवल योजनाएँ बनाने वाली संस्था नहीं है, बल्कि यह नीति निर्माण और निगरानी करने वाली सलाहकार संस्था है।
📌 नीति आयोग का संगठन (Organization Structure)
नीति आयोग का संगठन बहुस्तरीय और समन्वित है।
📍 1. अध्यक्ष
नीति आयोग का अध्यक्ष भारत का प्रधानमंत्री होता है।
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता संस्था को उच्च स्तर का नेतृत्व प्रदान करती है और नीतियों को राष्ट्रीय दिशा देती है।
📍 2. उपाध्यक्ष
उपाध्यक्ष की नियुक्ति प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है।
यह नीति आयोग का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है और आयोग की गतिविधियों का संचालन करता है।
📍 3. पूर्णकालिक सदस्य
नीति आयोग में कुछ पूर्णकालिक सदस्य होते हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ होते हैं।
🔹 अर्थशास्त्र
🔹 कृषि
🔹 उद्योग
🔹 सामाजिक क्षेत्र
इनकी विशेषज्ञता नीति निर्माण में सहायक होती है।
📍 4. अंशकालिक सदस्य
आवश्यकता अनुसार विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों या अन्य संगठनों से अंशकालिक सदस्य नियुक्त किए जाते हैं।
📍 5. पदेन सदस्य
केंद्रीय मंत्रिपरिषद के कुछ मंत्री पदेन सदस्य होते हैं।
इससे नीति आयोग और मंत्रालयों के बीच समन्वय बना रहता है।
📍 6. मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO)
CEO की नियुक्ति प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है।
यह प्रशासनिक कार्यों का संचालन करता है और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की निगरानी करता है।
📍 7. क्षेत्रीय परिषद (Regional Councils)
विशेष मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए क्षेत्रीय परिषद का गठन किया जाता है।
इसमें संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल होते हैं।
📌 नीति आयोग के प्रमुख कार्य
नीति आयोग के कार्य व्यापक और बहुआयामी हैं।
📍 1. राष्ट्रीय विकास की रणनीति बनाना
नीति आयोग दीर्घकालिक, मध्यमकालिक और अल्पकालिक विकास रणनीतियाँ तैयार करता है।
🔹 15 वर्षीय विज़न
🔹 7 वर्षीय रणनीति
🔹 3 वर्षीय कार्ययोजना
ये योजनाएँ देश के समग्र विकास को दिशा देती हैं।
📍 2. सहकारी संघवाद को बढ़ावा
नीति आयोग का प्रमुख उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग बढ़ाना है।
🔹 राज्यों को नीति निर्माण में भागीदारी
🔹 संयुक्त बैठकें
🔹 राज्यों की समस्याओं पर चर्चा
इससे राज्यों को समान अवसर मिलता है।
📍 3. सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) का क्रियान्वयन
नीति आयोग संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
🔹 गरीबी उन्मूलन
🔹 गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
🔹 लैंगिक समानता
🔹 पर्यावरण संरक्षण
इन लक्ष्यों की प्रगति की निगरानी भी आयोग करता है।
📍 4. नीति सुझाव और परामर्श
नीति आयोग विभिन्न मंत्रालयों और राज्यों को नीति संबंधी सुझाव देता है।
🔹 कृषि सुधार
🔹 स्वास्थ्य नीति
🔹 औद्योगिक नीति
यह एक सलाहकार संस्था है, जिसके सुझाव सरकार के निर्णयों में सहायक होते हैं।
📍 5. नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा
नीति आयोग “अटल इनोवेशन मिशन” जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से नवाचार को प्रोत्साहित करता है।
🔹 स्टार्टअप को बढ़ावा
🔹 तकनीकी नवाचार
🔹 युवा उद्यमिता
इससे आर्थिक विकास को गति मिलती है।
📍 6. निगरानी और मूल्यांकन
नीति आयोग विभिन्न सरकारी योजनाओं की प्रगति का मूल्यांकन करता है।
🔹 प्रदर्शन सूचकांक
🔹 राज्यों की रैंकिंग
🔹 सुधारात्मक सुझाव
इससे योजनाओं की गुणवत्ता में सुधार होता है।
📍 7. प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद
राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना भी नीति आयोग का कार्य है।
🔹 स्वास्थ्य सूचकांक
🔹 शिक्षा सूचकांक
🔹 निर्यात तैयारी सूचकांक
इनसे राज्य बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित होते हैं।
📌 योजना आयोग और नीति आयोग में अंतर
🔹 योजना आयोग संसाधनों का आवंटन करता था, जबकि नीति आयोग केवल सुझाव देता है।
🔹 योजना आयोग केंद्रीकृत था, जबकि नीति आयोग सहकारी संघवाद पर आधारित है।
🔹 नीति आयोग अधिक लचीला और आधुनिक दृष्टिकोण अपनाता है।
📌 नीति आयोग का महत्व
🔹 नीति निर्माण में विशेषज्ञता
🔹 केंद्र-राज्य समन्वय
🔹 विकास की नई दिशा
🔹 पारदर्शिता और मूल्यांकन
यह संस्था भारत के विकास को नई सोच और नई ऊर्जा प्रदान करती है।
📌 आलोचनात्मक मूल्यांकन
कुछ आलोचकों का मत है कि नीति आयोग के पास संसाधन आवंटन की शक्ति नहीं है, जिससे इसकी प्रभावशीलता सीमित हो सकती है।
फिर भी, इसकी सलाहकार भूमिका और नवाचार पर बल इसे आधुनिक और प्रगतिशील संस्था बनाते हैं।
📌 निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि नीति आयोग भारत की विकास यात्रा में एक महत्वपूर्ण संस्था है।
इसका संगठन बहुस्तरीय और समन्वित है, जिसमें प्रधानमंत्री से लेकर विशेषज्ञ सदस्य तक शामिल हैं।
इसके कार्य नीति निर्माण, सहकारी संघवाद, नवाचार, निगरानी और सतत विकास से जुड़े हैं।
नीति आयोग ने भारत में विकास की प्रक्रिया को अधिक सहभागी, पारदर्शी और परिणामोन्मुख बनाया है।
इस प्रकार, नीति आयोग केवल एक प्रशासनिक संस्था नहीं, बल्कि भारत के परिवर्तन और प्रगति का मार्गदर्शक है।
प्रश्न 05. राष्ट्रीय विकास परिषद् पर एक निबंध लिखिए।
📌 प्रस्तावना : राष्ट्रीय विकास परिषद् की आवश्यकता
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी — देश का आर्थिक और सामाजिक विकास। इस उद्देश्य से नियोजित विकास (Planned Development) की नीति अपनाई गई और पंचवर्षीय योजनाएँ प्रारंभ की गईं।
लेकिन केवल योजना आयोग के स्तर पर योजनाएँ बनाना पर्याप्त नहीं था। राज्यों की भागीदारी और सहयोग भी आवश्यक था, क्योंकि योजनाओं का क्रियान्वयन मुख्य रूप से राज्यों द्वारा ही किया जाता है।
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए 6 अगस्त 1952 को राष्ट्रीय विकास परिषद् (National Development Council - NDC) की स्थापना की गई।
राष्ट्रीय विकास परिषद् का उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करना तथा राष्ट्रीय विकास योजनाओं को प्रभावी रूप से लागू करना था।
📌 राष्ट्रीय विकास परिषद् का गठन और स्वरूप
राष्ट्रीय विकास परिषद् एक उच्च स्तरीय नीति-निर्माण संस्था थी। इसका स्वरूप परामर्शदात्री (Advisory) था, लेकिन इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
📍 1. अध्यक्ष
राष्ट्रीय विकास परिषद् के अध्यक्ष भारत के प्रधानमंत्री होते थे।
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता से परिषद् को राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व और दिशा मिलती थी।
📍 2. सदस्य
परिषद् के सदस्य निम्नलिखित होते थे —
🔹 सभी राज्यों के मुख्यमंत्री
🔹 केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासक
🔹 केंद्रीय मंत्रिपरिषद के सदस्य
🔹 योजना आयोग के सदस्य
इस प्रकार, यह संस्था केंद्र और राज्यों दोनों का प्रतिनिधित्व करती थी।
📍 3. स्वरूप
राष्ट्रीय विकास परिषद् एक सामूहिक मंच था, जहाँ विकास संबंधी विषयों पर विचार-विमर्श किया जाता था।
यह संस्था सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का उदाहरण मानी जाती थी, क्योंकि इसमें केंद्र और राज्य मिलकर योजनाओं पर चर्चा करते थे।
📌 राष्ट्रीय विकास परिषद् के प्रमुख उद्देश्य
राष्ट्रीय विकास परिषद् की स्थापना कुछ महत्वपूर्ण उद्देश्यों को ध्यान में रखकर की गई थी।
🔹 राष्ट्रीय विकास योजनाओं को अंतिम स्वीकृति देना
🔹 योजनाओं के क्रियान्वयन की समीक्षा करना
🔹 केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग बढ़ाना
🔹 संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना
इन उद्देश्यों के माध्यम से देश में संतुलित और समन्वित विकास सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया।
📌 राष्ट्रीय विकास परिषद् के कार्य
📍 1. पंचवर्षीय योजनाओं की स्वीकृति
योजना आयोग द्वारा तैयार की गई पंचवर्षीय योजनाओं को अंतिम स्वीकृति राष्ट्रीय विकास परिषद् देती थी।
इससे यह सुनिश्चित होता था कि योजनाएँ केवल केंद्र की इच्छा पर आधारित न हों, बल्कि राज्यों की सहमति भी प्राप्त हो।
📍 2. विकास कार्यक्रमों की समीक्षा
परिषद् समय-समय पर योजनाओं की प्रगति की समीक्षा करती थी।
🔹 लक्ष्य प्राप्ति की जाँच
🔹 संसाधनों का उपयोग
🔹 आवश्यक सुधार के सुझाव
इससे योजनाओं की प्रभावशीलता बढ़ती थी।
📍 3. नीति निर्माण में सहयोग
राष्ट्रीय विकास परिषद् विभिन्न आर्थिक और सामाजिक नीतियों पर विचार-विमर्श करती थी।
🔹 कृषि नीति
🔹 औद्योगिक नीति
🔹 शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार
इन विषयों पर सामूहिक निर्णय लिए जाते थे।
📍 4. केंद्र-राज्य समन्वय
परिषद् का सबसे महत्वपूर्ण कार्य था — केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करना।
🔹 राज्यों की समस्याओं को सुनना
🔹 संसाधनों के बंटवारे पर चर्चा
🔹 क्षेत्रीय असमानता कम करने के उपाय
इससे संघीय ढाँचे को मजबूती मिलती थी।
📍 5. राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का निर्धारण
परिषद् देश की विकास संबंधी प्राथमिकताओं को तय करने में भी सहायक थी।
जैसे —
🔹 गरीबी उन्मूलन
🔹 ग्रामीण विकास
🔹 रोजगार सृजन
इन क्षेत्रों में विशेष ध्यान दिया जाता था।
📌 राष्ट्रीय विकास परिषद् का महत्व
राष्ट्रीय विकास परिषद् का भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान था।
🔹 यह एक लोकतांत्रिक मंच था
🔹 राज्यों की भागीदारी सुनिश्चित करती थी
🔹 योजनाओं में समन्वय लाती थी
🔹 संघीय ढाँचे को मजबूत बनाती थी
इस संस्था के माध्यम से विकास योजनाएँ अधिक व्यापक और संतुलित बन पाती थीं।
📌 राष्ट्रीय विकास परिषद् की सीमाएँ
हालाँकि राष्ट्रीय विकास परिषद् महत्वपूर्ण संस्था थी, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ थीं।
🔹 इसका निर्णय बाध्यकारी नहीं था
🔹 वास्तविक शक्ति योजना आयोग के पास थी
🔹 बैठकों की संख्या सीमित थी
🔹 कार्यान्वयन में देरी
इन कारणों से कभी-कभी इसकी प्रभावशीलता कम हो जाती थी।
📌 राष्ट्रीय विकास परिषद् और योजना आयोग का संबंध
राष्ट्रीय विकास परिषद् और योजना आयोग परस्पर जुड़े हुए थे।
🔹 योजना आयोग योजनाएँ तैयार करता था
🔹 राष्ट्रीय विकास परिषद् उन्हें स्वीकृति देती थी
इस प्रकार दोनों संस्थाएँ मिलकर देश के नियोजित विकास को दिशा देती थीं।
📌 समकालीन परिप्रेक्ष्य
वर्ष 2015 में योजना आयोग को समाप्त कर नीति आयोग की स्थापना की गई।
इसके साथ ही राष्ट्रीय विकास परिषद् की भूमिका भी समाप्त हो गई।
अब नीति आयोग सहकारी संघवाद को बढ़ावा देने और राज्यों के साथ मिलकर विकास की दिशा तय करने का कार्य करता है।
हालाँकि राष्ट्रीय विकास परिषद् अब अस्तित्व में नहीं है, लेकिन भारतीय नियोजन प्रणाली में इसका ऐतिहासिक योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।
📌 समालोचनात्मक मूल्यांकन
राष्ट्रीय विकास परिषद् ने भारतीय संघीय ढाँचे को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह एक ऐसा मंच था जहाँ केंद्र और राज्य समान स्तर पर बैठकर विकास योजनाओं पर चर्चा करते थे।
लेकिन इसकी सलाहकार प्रकृति और सीमित शक्तियों के कारण कभी-कभी यह केवल औपचारिक संस्था बनकर रह जाती थी।
फिर भी, यह कहना उचित होगा कि राष्ट्रीय विकास परिषद् ने भारत के नियोजित विकास में समन्वय और संतुलन स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
📌 निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय विकास परिषद् भारत की नियोजन प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अंग थी।
इसने केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग बढ़ाने, पंचवर्षीय योजनाओं को स्वीकृति देने और विकास की प्राथमिकताएँ तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यद्यपि अब यह संस्था अस्तित्व में नहीं है, परंतु भारतीय प्रशासनिक इतिहास में इसका स्थान महत्वपूर्ण रहेगा।
राष्ट्रीय विकास परिषद् ने यह सिद्ध किया कि किसी भी देश के समग्र विकास के लिए केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय और सहयोग अनिवार्य है।
इस प्रकार, राष्ट्रीय विकास परिषद् भारतीय नियोजन प्रणाली की एक महत्वपूर्ण कड़ी थी, जिसने विकास को लोकतांत्रिक और सहभागी स्वरूप प्रदान किया।
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 01. लोक प्रशासन के विकास का चरणबद्ध विवरण दीजिए।
📌 प्रस्तावना : लोक प्रशासन के विकास को समझने की आवश्यकता
लोक प्रशासन आज एक स्वतंत्र और महत्वपूर्ण अध्ययन विषय है, लेकिन यह स्थिति प्रारंभ से नहीं थी। समय के साथ प्रशासन की प्रकृति, उद्देश्य और अध्ययन पद्धति में परिवर्तन हुआ।
समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था और तकनीक के विकास के साथ-साथ लोक प्रशासन भी विकसित होता गया। विभिन्न विचारकों और परिस्थितियों के प्रभाव से इसके विकास के कई चरण सामने आए।
लोक प्रशासन के विकास को सामान्यतः विभिन्न चरणों में विभाजित किया जाता है, ताकि उसके विचारात्मक और व्यावहारिक परिवर्तन को स्पष्ट रूप से समझा जा सके।
📌 पहला चरण : राजनीति-प्रशासन पृथक्करण का काल (1887–1926)
यह चरण लोक प्रशासन के जन्मकाल के रूप में जाना जाता है।
1887 में वुडरो विल्सन ने एक प्रसिद्ध लेख “The Study of Administration” प्रकाशित किया। उन्होंने राजनीति और प्रशासन को अलग-अलग क्षेत्रों के रूप में देखने की बात कही।
🔹 राजनीति का कार्य नीति निर्माण
🔹 प्रशासन का कार्य नीति का क्रियान्वयन
इस विचार को राजनीति-प्रशासन पृथक्करण (Politics-Administration Dichotomy) कहा गया।
इस चरण की विशेषताएँ —
🔹 प्रशासन को एक स्वतंत्र अध्ययन विषय के रूप में मान्यता
🔹 दक्षता और कार्यकुशलता पर बल
🔹 प्रशासन को तटस्थ और तकनीकी क्षेत्र मानना
यह चरण लोक प्रशासन की नींव रखने वाला काल था।
📌 दूसरा चरण : सिद्धांतों का काल (1927–1937)
इस चरण में प्रशासन के सार्वभौमिक सिद्धांतों (Principles) को विकसित करने का प्रयास किया गया।
प्रशासन को वैज्ञानिक और नियमबद्ध बनाने की दिशा में कार्य हुआ।
इस काल की प्रमुख विशेषताएँ —
🔹 प्रशासन के सिद्धांतों की खोज
🔹 संगठन और प्रबंधन पर बल
🔹 दक्षता को सर्वोच्च मानना
इस समय POSDCORB सिद्धांत प्रस्तुत किया गया, जिसमें प्रशासन के मुख्य कार्य बताए गए —
🔸 Planning (योजना बनाना)
🔸 Organizing (संगठन करना)
🔸 Staffing (कर्मचारी नियुक्ति)
🔸 Directing (निर्देशन)
🔸 Coordinating (समन्वय)
🔸 Reporting (रिपोर्टिंग)
🔸 Budgeting (बजट बनाना)
यह चरण प्रशासन को एक विज्ञान के रूप में स्थापित करने का प्रयास था।
📌 तीसरा चरण : आलोचना और चुनौती का काल (1938–1947)
इस चरण में पहले दिए गए सिद्धांतों की आलोचना शुरू हुई।
कुछ विद्वानों ने कहा कि प्रशासन के सिद्धांत सार्वभौमिक नहीं हो सकते, क्योंकि प्रत्येक परिस्थिति अलग होती है।
🔹 प्रशासन को राजनीति से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता
🔹 सिद्धांत परिस्थिति पर निर्भर करते हैं
🔹 व्यवहार और मानव तत्व को महत्व
इस चरण में प्रशासन को अधिक यथार्थवादी दृष्टि से देखने की शुरुआत हुई।
📌 चौथा चरण : व्यवहारवादी दृष्टिकोण का विकास (1948–1970)
इस काल में प्रशासन में मानव व्यवहार और मनोविज्ञान पर बल दिया गया।
अब केवल नियम और संरचना ही महत्वपूर्ण नहीं थे, बल्कि यह भी देखा गया कि लोग कैसे सोचते हैं और निर्णय लेते हैं।
🔹 वैज्ञानिक अनुसंधान
🔹 अनुभव आधारित अध्ययन
🔹 मानव संबंधों पर ध्यान
इस चरण ने प्रशासन को अधिक मानवीय और व्यावहारिक बनाया।
📌 पाँचवाँ चरण : विकास प्रशासन का काल (1950–1970 के दशक)
विशेष रूप से विकासशील देशों में प्रशासन को विकास का साधन माना गया।
🔹 गरीबी उन्मूलन
🔹 शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार
🔹 आर्थिक विकास
इस चरण में प्रशासन को परिवर्तन और सामाजिक प्रगति का माध्यम माना गया।
यह दृष्टिकोण विशेष रूप से एशिया और अफ्रीका के देशों में महत्वपूर्ण रहा।
📌 छठा चरण : नवीन लोक प्रशासन (1968 के बाद)
1968 में मिनोब्रुक सम्मेलन के बाद नवीन लोक प्रशासन (New Public Administration) की अवधारणा सामने आई।
इसका मुख्य उद्देश्य था — सामाजिक न्याय और समानता को बढ़ावा देना।
🔹 जनसामान्य की भागीदारी
🔹 सामाजिक समानता
🔹 नैतिक मूल्यों पर बल
यह चरण प्रशासन को केवल कुशल ही नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण था।
📌 सातवाँ चरण : नवीन लोक प्रबंधन (1980 के दशक)
इस चरण में निजी क्षेत्र की कार्यप्रणाली को सरकारी प्रशासन में लागू करने पर बल दिया गया।
🔹 परिणाम आधारित कार्य
🔹 प्रतिस्पर्धा
🔹 निजीकरण
🔹 लागत में कमी
नवीन लोक प्रबंधन का उद्देश्य प्रशासन को अधिक प्रभावी और उत्तरदायी बनाना था।
📌 आठवाँ चरण : सुशासन और ई-गवर्नेंस का काल (1990 के बाद)
वैश्वीकरण और तकनीकी विकास के साथ प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही पर बल बढ़ा।
🔹 सुशासन (Good Governance)
🔹 पारदर्शिता
🔹 जनभागीदारी
🔹 ई-गवर्नेंस
डिजिटल तकनीक के उपयोग से प्रशासन अधिक तेज़ और पारदर्शी बना।
📌 लोक प्रशासन के विकास की मुख्य विशेषताएँ
🔹 पारंपरिक से आधुनिक दृष्टिकोण की ओर परिवर्तन
🔹 नियम आधारित से मानव-केंद्रित प्रशासन
🔹 केंद्रीकरण से विकेंद्रीकरण
🔹 नियंत्रण से सहभागिता
यह विकास दर्शाता है कि लोक प्रशासन एक गतिशील और निरंतर विकसित होने वाला विषय है।
📌 समालोचनात्मक दृष्टि
लोक प्रशासन का विकास केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक अनुभवों पर आधारित रहा है।
प्रत्येक चरण ने कुछ नई बातें जोड़ीं और कुछ पुरानी धारणाओं को चुनौती दी।
हालाँकि सभी चरणों की अपनी सीमाएँ थीं, लेकिन मिलकर उन्होंने प्रशासन को अधिक व्यापक और प्रभावी बनाया।
📌 निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि लोक प्रशासन का विकास कई चरणों से होकर गुजरा है।
1887 में राजनीति-प्रशासन पृथक्करण से शुरू होकर आज सुशासन और डिजिटल प्रशासन तक की यात्रा लंबी और महत्वपूर्ण रही है।
प्रत्येक चरण ने प्रशासन को नई दिशा दी और उसे अधिक व्यावहारिक, मानवीय और विकासोन्मुख बनाया।
आज लोक प्रशासन केवल सरकारी कार्यों का संचालन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय विकास का प्रमुख साधन बन चुका है।
इस प्रकार, लोक प्रशासन का चरणबद्ध विकास उसके महत्व और निरंतर प्रगति को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
प्रश्न 02. नवीन लोक प्रशासन की विशेषताओं का उल्लेख कीजिये।
📌 प्रस्तावना : नवीन लोक प्रशासन की पृष्ठभूमि
20वीं शताब्दी के मध्य तक लोक प्रशासन मुख्य रूप से दक्षता (Efficiency), संगठन और नियमों पर आधारित था। प्रशासन को एक तकनीकी और तटस्थ (Neutral) प्रक्रिया माना जाता था। परंतु 1960 के दशक में सामाजिक असमानता, गरीबी, नस्लीय भेदभाव और युद्ध जैसी समस्याओं ने प्रशासन की भूमिका पर प्रश्न उठाए।
इसी पृष्ठभूमि में 1968 में मिनोब्रुक सम्मेलन आयोजित हुआ, जहाँ से नवीन लोक प्रशासन (New Public Administration – NPA) की अवधारणा सामने आई। इसका उद्देश्य प्रशासन को केवल कुशल ही नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से उत्तरदायी और न्यायपूर्ण बनाना था।
नवीन लोक प्रशासन ने यह स्पष्ट किया कि प्रशासन का कार्य केवल नियमों का पालन करना नहीं, बल्कि समाज में समानता और न्याय स्थापित करना भी है।
📌 नवीन लोक प्रशासन का अर्थ
नवीन लोक प्रशासन वह दृष्टिकोण है जो प्रशासन को सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक न्याय का माध्यम मानता है।
यह पारंपरिक प्रशासन से अलग है, क्योंकि इसमें केवल दक्षता पर नहीं, बल्कि समानता, नैतिकता और जनसहभागिता पर भी बल दिया जाता है।
📌 नवीन लोक प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ
📍 1. सामाजिक समानता (Social Equity) पर बल
नवीन लोक प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता सामाजिक समानता है।
🔹 गरीब और वंचित वर्गों को प्राथमिकता
🔹 संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण
🔹 अवसरों की समानता
इस दृष्टिकोण के अनुसार प्रशासन को समाज के कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा करनी चाहिए।
📍 2. परिवर्तनकारी दृष्टिकोण
नवीन लोक प्रशासन प्रशासन को केवल व्यवस्था बनाए रखने वाला नहीं, बल्कि परिवर्तन लाने वाला मानता है।
🔹 सामाजिक सुधार
🔹 आर्थिक विकास
🔹 असमानता में कमी
प्रशासन को समाज में सकारात्मक परिवर्तन का साधन माना गया।
📍 3. मानवीय दृष्टिकोण
इस उपागम में मानव भावनाओं और आवश्यकताओं को महत्व दिया गया।
🔹 कर्मचारियों की संतुष्टि
🔹 नागरिकों के साथ संवेदनशील व्यवहार
🔹 मानवीय मूल्यों का सम्मान
इससे प्रशासन अधिक मानवीय और सहानुभूतिपूर्ण बनता है।
📍 4. जनसहभागिता (Public Participation)
नवीन लोक प्रशासन नागरिकों की भागीदारी को आवश्यक मानता है।
🔹 नीति निर्माण में जनता की भूमिका
🔹 स्थानीय स्तर पर निर्णय
🔹 पारदर्शिता
इससे लोकतंत्र मजबूत होता है।
📍 5. नैतिकता और उत्तरदायित्व
नवीन लोक प्रशासन में नैतिक मूल्यों को विशेष महत्व दिया गया।
🔹 भ्रष्टाचार का विरोध
🔹 ईमानदारी
🔹 जवाबदेही
प्रशासन को नैतिक और पारदर्शी होना चाहिए।
📍 6. विकेंद्रीकरण
निर्णय लेने की शक्ति केवल केंद्र तक सीमित न रहकर स्थानीय स्तर तक पहुँचनी चाहिए।
🔹 पंचायतों और नगरपालिकाओं को अधिकार
🔹 स्थानीय समस्याओं का स्थानीय समाधान
इससे प्रशासन अधिक प्रभावी बनता है।
📍 7. परिणामोन्मुख दृष्टिकोण
नवीन लोक प्रशासन केवल प्रक्रियाओं पर नहीं, बल्कि परिणामों पर ध्यान देता है।
🔹 योजनाओं का वास्तविक प्रभाव
🔹 जनता की संतुष्टि
🔹 सामाजिक सुधार
इससे प्रशासन का उद्देश्य स्पष्ट और व्यावहारिक बनता है।
📍 8. गतिशील और लचीला स्वरूप
नवीन लोक प्रशासन बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने पर बल देता है।
🔹 नई नीतियाँ
🔹 आधुनिक तकनीक
🔹 त्वरित निर्णय
यह दृष्टिकोण प्रशासन को अधिक प्रगतिशील बनाता है।
📌 पारंपरिक और नवीन लोक प्रशासन में अंतर
🔹 पारंपरिक प्रशासन दक्षता पर केंद्रित था, जबकि नवीन लोक प्रशासन सामाजिक न्याय पर बल देता है।
🔹 पारंपरिक दृष्टिकोण नियम आधारित था, जबकि नवीन दृष्टिकोण मानव-केंद्रित है।
🔹 पारंपरिक प्रशासन तटस्थ माना जाता था, जबकि नवीन प्रशासन सामाजिक परिवर्तन का समर्थक है।
📌 नवीन लोक प्रशासन का महत्व
🔹 सामाजिक असमानता को कम करने में सहायक
🔹 लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करता है
🔹 प्रशासन को उत्तरदायी बनाता है
🔹 जनता के विश्वास को बढ़ाता है
आज के समय में जब समाज विविध और जटिल हो चुका है, नवीन लोक प्रशासन की अवधारणा अत्यंत प्रासंगिक है।
📌 समालोचनात्मक दृष्टिकोण
हालाँकि नवीन लोक प्रशासन ने सामाजिक न्याय पर बल दिया, परंतु कुछ आलोचक मानते हैं कि यह अत्यधिक आदर्शवादी है।
🔹 सामाजिक समानता को पूरी तरह लागू करना कठिन है
🔹 प्रशासन की निष्पक्षता पर प्रश्न उठ सकते हैं
🔹 व्यावहारिक कठिनाइयाँ
फिर भी, इसकी मूल भावना प्रशासन को अधिक मानवीय और न्यायपूर्ण बनाती है।
📌 निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि नवीन लोक प्रशासन ने प्रशासनिक अध्ययन को नई दिशा दी।
इसने प्रशासन को केवल तकनीकी प्रक्रिया न मानकर, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और समानता का साधन माना।
सामाजिक समानता, जनसहभागिता, नैतिकता और विकेंद्रीकरण इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।
आज के लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राज्य में नवीन लोक प्रशासन की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है।
इस प्रकार, नवीन लोक प्रशासन प्रशासन को अधिक संवेदनशील, उत्तरदायी और न्यायपूर्ण बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
प्रश्न 03. विकास प्रशासन के विस्तृत क्षेत्र पर संक्षिप्त लेख लिखिए।
📌 प्रस्तावना : विकास प्रशासन की अवधारणा
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक देशों ने स्वतंत्रता प्राप्त की। इन देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी — आर्थिक पिछड़ापन, गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक असमानता। ऐसी परिस्थितियों में केवल सामान्य प्रशासन पर्याप्त नहीं था, बल्कि ऐसा प्रशासन चाहिए था जो विकास को गति दे सके।
इसी आवश्यकता से “विकास प्रशासन” (Development Administration) की अवधारणा सामने आई। विकास प्रशासन का अर्थ है — ऐसा प्रशासन जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास को लक्ष्य बनाकर योजनाओं का निर्माण और क्रियान्वयन करे।
यह प्रशासन केवल व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवर्तन और प्रगति का साधन बनता है।
📌 विकास प्रशासन का अर्थ
विकास प्रशासन वह प्रशासनिक व्यवस्था है जिसका मुख्य उद्देश्य विकास को बढ़ावा देना है।
🔹 आर्थिक विकास
🔹 सामाजिक सुधार
🔹 गरीबी उन्मूलन
🔹 जीवन स्तर में सुधार
सरल शब्दों में, विकास प्रशासन का लक्ष्य है — जनता के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना।
📌 विकास प्रशासन का विस्तृत क्षेत्र
विकास प्रशासन का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। यह केवल किसी एक विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के लगभग सभी क्षेत्रों को प्रभावित करता है।
📍 1. आर्थिक विकास का क्षेत्र
आर्थिक विकास विकास प्रशासन का प्रमुख क्षेत्र है।
🔹 औद्योगिकीकरण
🔹 कृषि सुधार
🔹 रोजगार सृजन
🔹 आधारभूत संरचना (सड़क, बिजली, जल)
इन सभी कार्यों का संचालन प्रशासन के माध्यम से किया जाता है।
📍 2. सामाजिक विकास
विकास प्रशासन का उद्देश्य केवल आय बढ़ाना नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन में सुधार लाना भी है।
🔹 शिक्षा का विस्तार
🔹 स्वास्थ्य सेवाएँ
🔹 महिला सशक्तिकरण
🔹 सामाजिक न्याय
इससे समाज में समान अवसर और संतुलन स्थापित होता है।
📍 3. ग्रामीण विकास
अधिकांश विकासशील देशों में बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है।
🔹 ग्रामीण सड़कें
🔹 सिंचाई सुविधाएँ
🔹 स्वयं सहायता समूह
🔹 ग्रामीण रोजगार योजनाएँ
ग्रामीण विकास कार्यक्रम विकास प्रशासन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
📍 4. प्रशासनिक सुधार
विकास के लिए प्रशासन का कुशल और पारदर्शी होना आवश्यक है।
🔹 भ्रष्टाचार पर नियंत्रण
🔹 प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण
🔹 ई-गवर्नेंस
🔹 सेवा वितरण में सुधार
ये सभी प्रयास विकास प्रशासन के क्षेत्र में आते हैं।
📍 5. नियोजन और नीति निर्माण
विकास प्रशासन योजनाबद्ध तरीके से कार्य करता है।
🔹 पंचवर्षीय योजनाएँ
🔹 दीर्घकालिक रणनीतियाँ
🔹 संसाधनों का समुचित उपयोग
नियोजन विकास प्रक्रिया का आधार है।
📍 6. विकेंद्रीकरण और जनसहभागिता
विकास प्रशासन में स्थानीय स्तर पर भागीदारी को महत्व दिया जाता है।
🔹 पंचायत राज संस्थाएँ
🔹 नगरपालिकाएँ
🔹 सामुदायिक भागीदारी
इससे विकास योजनाएँ अधिक प्रभावी और वास्तविक बनती हैं।
📍 7. सतत विकास
आज विकास प्रशासन केवल आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास पर भी ध्यान देता है।
🔹 प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण
🔹 हरित ऊर्जा
🔹 जल संरक्षण
यह भविष्य की पीढ़ियों को ध्यान में रखकर विकास करने की प्रक्रिया है।
📌 विकास प्रशासन की विशेषताएँ
🔹 परिवर्तनकारी दृष्टिकोण
🔹 लक्ष्य-उन्मुख कार्य
🔹 सामाजिक न्याय पर बल
🔹 समन्वय और सहयोग
🔹 नवाचार और आधुनिक तकनीक का उपयोग
ये विशेषताएँ इसे पारंपरिक प्रशासन से अलग बनाती हैं।
📌 विकास प्रशासन का महत्व
विकासशील देशों के लिए विकास प्रशासन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
🔹 गरीबी और बेरोजगारी कम करने में सहायक
🔹 शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार
🔹 जीवन स्तर में वृद्धि
🔹 सामाजिक समानता
यदि प्रशासन विकासोन्मुख न हो, तो योजनाएँ कागजों तक सीमित रह जाती हैं।
📌 चुनौतियाँ
हालाँकि विकास प्रशासन का क्षेत्र व्यापक है, फिर भी इसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
🔹 संसाधनों की कमी
🔹 भ्रष्टाचार
🔹 राजनीतिक हस्तक्षेप
🔹 तकनीकी सीमाएँ
इन समस्याओं के बावजूद विकास प्रशासन निरंतर सुधार की दिशा में कार्य कर रहा है।
📌 निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि विकास प्रशासन एक व्यापक और गतिशील अवधारणा है, जिसका उद्देश्य समाज में समग्र विकास लाना है।
इसका क्षेत्र आर्थिक, सामाजिक, ग्रामीण, प्रशासनिक और पर्यावरणीय विकास तक फैला हुआ है।
विकास प्रशासन केवल योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है।
इस प्रकार, विकास प्रशासन विकासशील देशों के लिए प्रगति और समृद्धि का आधार स्तंभ है।
प्रश्न 04. नौकरशाही को परिभाषित करते हुए उसके गुण और दोषों का समीक्षा कीजिये।
📌 प्रस्तावना : नौकरशाही की अवधारणा
आधुनिक राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में नौकरशाही (Bureaucracy) का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। राज्य के कार्यों का विस्तार जितना बढ़ा है, उतनी ही प्रशासनिक संरचना की आवश्यकता भी बढ़ी है। कानूनों और नीतियों को व्यवहार में लागू करने का दायित्व मुख्यतः नौकरशाही पर ही होता है।
“नौकरशाही” शब्द का अर्थ है — अधिकारियों द्वारा संचालित प्रशासनिक व्यवस्था। यह एक ऐसी संगठित प्रणाली है, जिसमें नियमों, पदानुक्रम (Hierarchy) और कार्य-विभाजन के आधार पर कार्य किया जाता है।
समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने नौकरशाही को एक आदर्श प्रशासनिक मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया था। उनके अनुसार, नौकरशाही एक तार्किक और नियमबद्ध व्यवस्था है, जो दक्षता और निष्पक्षता पर आधारित होती है।
📌 नौकरशाही की परिभाषा
नौकरशाही वह प्रशासनिक व्यवस्था है जिसमें नियुक्त अधिकारी निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार शासन कार्यों का संचालन करते हैं।
🔹 स्पष्ट पदानुक्रम
🔹 लिखित नियम
🔹 कार्यों का विभाजन
🔹 योग्यता आधारित नियुक्ति
सरल शब्दों में, नौकरशाही वह संगठित तंत्र है जो सरकार की नीतियों को लागू करता है।
📌 नौकरशाही की प्रमुख विशेषताएँ
📍 1. पदानुक्रम (Hierarchy)
नौकरशाही में उच्च से निम्न स्तर तक स्पष्ट अधिकार-श्रृंखला होती है।
🔹 प्रत्येक अधिकारी अपने वरिष्ठ के अधीन कार्य करता है
🔹 आदेश ऊपर से नीचे तक पहुँचते हैं
इससे अनुशासन और नियंत्रण बना रहता है।
📍 2. कार्य-विभाजन
प्रत्येक कर्मचारी को एक निश्चित कार्य सौंपा जाता है।
🔹 विशेषज्ञता का विकास
🔹 कार्यकुशलता में वृद्धि
📍 3. लिखित नियम और प्रक्रियाएँ
नौकरशाही नियमों और कानूनों पर आधारित होती है।
🔹 निर्णय नियमों के अनुसार
🔹 व्यक्तिगत पक्षपात की संभावना कम
📍 4. योग्यता आधारित नियुक्ति
अधिकारियों की नियुक्ति योग्यता और परीक्षा के आधार पर होती है।
🔹 निष्पक्ष चयन
🔹 दक्ष प्रशासन
📍 5. स्थायित्व
नौकरशाहों की सेवा स्थायी होती है।
🔹 प्रशासनिक निरंतरता
🔹 अनुभव का लाभ
📌 नौकरशाही के गुण (Merits)
📍 1. प्रशासनिक स्थिरता
राजनीतिक परिवर्तन के बावजूद नौकरशाही स्थिर रहती है।
इससे शासन की निरंतरता बनी रहती है।
📍 2. निष्पक्षता और तटस्थता
नौकरशाही को राजनीतिक रूप से तटस्थ माना जाता है।
🔹 सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार
🔹 नियमों के आधार पर निर्णय
📍 3. विशेषज्ञता
विशेषज्ञ अधिकारियों के कारण प्रशासन अधिक प्रभावी होता है।
🔹 तकनीकी ज्ञान
🔹 अनुभव आधारित निर्णय
📍 4. दक्षता
स्पष्ट कार्य-विभाजन और नियमों के कारण कार्यों में व्यवस्था रहती है।
🔹 समयबद्ध कार्य
🔹 संसाधनों का उचित उपयोग
📍 5. कानून का पालन
नौकरशाही कानूनों के अनुसार कार्य करती है, जिससे शासन में अनुशासन बना रहता है।
📌 नौकरशाही के दोष (Demerits)
📍 1. लालफीताशाही
नौकरशाही की सबसे बड़ी आलोचना लालफीताशाही है।
🔹 अधिक कागजी कार्य
🔹 निर्णय लेने में देरी
इससे जनता को असुविधा होती है।
📍 2. कठोरता
नियमों का अत्यधिक पालन कभी-कभी लचीलापन समाप्त कर देता है।
🔹 मानवीय दृष्टिकोण की कमी
🔹 परिस्थिति अनुसार निर्णय में कठिनाई
📍 3. जनता से दूरी
नौकरशाही पर आरोप है कि वह आम जनता से दूर रहती है।
🔹 संवेदनशीलता की कमी
🔹 औपचारिक व्यवहार
📍 4. भ्रष्टाचार
कुछ मामलों में भ्रष्टाचार की समस्या भी देखी जाती है।
🔹 रिश्वत
🔹 शक्ति का दुरुपयोग
यह प्रशासन की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।
📍 5. शक्ति का केंद्रीकरण
अत्यधिक अधिकारों के कारण नौकरशाही कभी-कभी निरंकुश हो सकती है।
🔹 जवाबदेही की कमी
🔹 लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रभाव
📌 नौकरशाही की समालोचनात्मक समीक्षा
नौकरशाही आधुनिक प्रशासन की रीढ़ है। इसके बिना शासन की कल्पना करना कठिन है।
इसके गुण — स्थिरता, दक्षता और निष्पक्षता — प्रशासन को मजबूत बनाते हैं।
लेकिन इसके दोष — लालफीताशाही, कठोरता और भ्रष्टाचार — इसकी प्रभावशीलता को कम कर सकते हैं।
इसलिए आवश्यक है कि —
🔹 प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ाई जाए
🔹 तकनीक का उपयोग किया जाए
🔹 जनसहभागिता को प्रोत्साहित किया जाए
🔹 उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जाए
इन सुधारों से नौकरशाही अधिक उत्तरदायी और प्रभावी बन सकती है।
📌 निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि नौकरशाही एक संगठित और नियमबद्ध प्रशासनिक प्रणाली है, जो आधुनिक राज्य की आधारशिला है।
इसके गुण इसे स्थिर और प्रभावी बनाते हैं, जबकि इसके दोष सुधार की आवश्यकता को दर्शाते हैं।
यदि नौकरशाही में पारदर्शिता, लचीलापन और जनसहभागिता को बढ़ावा दिया जाए, तो यह सुशासन की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
इस प्रकार, नौकरशाही न तो पूर्णतः अच्छी है और न ही पूर्णतः दोषपूर्ण; बल्कि इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इसे किस प्रकार संचालित और नियंत्रित किया जाता है।
प्रश्न 05. लोकतांत्रिक देशों में प्रशासन पर नियंत्रण की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
📌 प्रस्तावना : लोकतंत्र और प्रशासन का संबंध
लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में अंतिम सत्ता जनता के हाथों में मानी जाती है। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और वे प्रतिनिधि सरकार का गठन करते हैं। सरकार नीतियाँ बनाती है, जबकि प्रशासन उन नीतियों को लागू करता है।
इस प्रकार प्रशासन लोकतंत्र की रीढ़ है। परंतु यदि प्रशासन पर उचित नियंत्रण न हो, तो वह निरंकुश, भ्रष्ट या मनमाना हो सकता है। इसलिए लोकतांत्रिक देशों में प्रशासन पर नियंत्रण अत्यंत आवश्यक माना गया है।
नियंत्रण का अर्थ प्रशासन को बाधित करना नहीं, बल्कि उसे उत्तरदायी, पारदर्शी और जनहितकारी बनाना है।
📌 प्रशासन पर नियंत्रण का अर्थ
प्रशासन पर नियंत्रण का अर्थ है — ऐसी व्यवस्थाएँ और उपाय जिनके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाए कि प्रशासन कानून और संविधान के अनुसार कार्य करे तथा जनता के प्रति उत्तरदायी रहे।
🔹 शक्ति का दुरुपयोग न हो
🔹 भ्रष्टाचार पर रोक लगे
🔹 नीतियों का सही क्रियान्वयन हो
🔹 नागरिक अधिकार सुरक्षित रहें
📌 लोकतांत्रिक देशों में प्रशासन पर नियंत्रण की आवश्यकता
📍 1. निरंकुशता की रोकथाम
प्रशासन के पास व्यापक शक्तियाँ होती हैं। यदि उन पर नियंत्रण न हो, तो अधिकारी मनमाने निर्णय ले सकते हैं।
🔹 शक्ति का केंद्रीकरण
🔹 अधिकारों का दुरुपयोग
🔹 जनता के हितों की अनदेखी
नियंत्रण इन खतरों को रोकता है।
📍 2. जनता के प्रति उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना
लोकतंत्र में सरकार और प्रशासन जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं।
🔹 नीतियों का सही क्रियान्वयन
🔹 जनता की शिकायतों का समाधान
🔹 पारदर्शिता
नियंत्रण से प्रशासन जनता के प्रति जवाबदेह रहता है।
📍 3. भ्रष्टाचार पर नियंत्रण
यदि प्रशासन पर निगरानी न हो, तो भ्रष्टाचार की संभावना बढ़ जाती है।
🔹 रिश्वत
🔹 संसाधनों का दुरुपयोग
🔹 अनुचित लाभ
नियंत्रण तंत्र भ्रष्टाचार को कम करने में सहायक होता है।
📍 4. कानून के शासन की रक्षा
लोकतांत्रिक देशों में “कानून का शासन” सर्वोपरि होता है।
प्रशासन को संविधान और कानून के अनुसार कार्य करना चाहिए।
यदि वह कानून से हटकर कार्य करे, तो न्यायपालिका और अन्य नियंत्रण तंत्र उसे रोकते हैं।
📍 5. नागरिक अधिकारों की सुरक्षा
लोकतंत्र में नागरिकों को मौलिक अधिकार प्राप्त होते हैं।
यदि प्रशासन इन अधिकारों का उल्लंघन करे, तो नियंत्रण आवश्यक हो जाता है।
🔹 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
🔹 समानता का अधिकार
🔹 जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार
इनकी रक्षा के लिए नियंत्रण अनिवार्य है।
📍 6. प्रभावी और पारदर्शी शासन
नियंत्रण से प्रशासन में पारदर्शिता आती है।
🔹 कार्यों की समीक्षा
🔹 रिपोर्टिंग प्रणाली
🔹 सूचना का अधिकार
इससे जनता का विश्वास बढ़ता है।
📌 प्रशासन पर नियंत्रण के प्रमुख साधन
📍 1. विधायी नियंत्रण (Legislative Control)
विधायिका प्रशासन पर नियंत्रण रखती है।
🔹 प्रश्नकाल
🔹 अविश्वास प्रस्ताव
🔹 बजट की स्वीकृति
विधायिका प्रशासन की गतिविधियों की समीक्षा करती है।
📍 2. कार्यपालिका नियंत्रण
मंत्रिपरिषद प्रशासन की देखरेख करती है।
🔹 नीतिगत दिशा-निर्देश
🔹 अधिकारियों की नियुक्ति और स्थानांतरण
🔹 अनुशासनात्मक कार्रवाई
📍 3. न्यायिक नियंत्रण
न्यायपालिका प्रशासन के कार्यों की वैधता की जाँच करती है।
🔹 न्यायिक पुनरावलोकन
🔹 रिट याचिका
🔹 जनहित याचिका
यदि प्रशासन कानून के विरुद्ध कार्य करे, तो न्यायालय उसे निरस्त कर सकता है।
📍 4. जनमत और मीडिया
लोकतंत्र में मीडिया और जनमत भी प्रभावी नियंत्रण साधन हैं।
🔹 समाचार रिपोर्ट
🔹 सामाजिक आंदोलन
🔹 जनजागरूकता
इनके माध्यम से प्रशासन पर दबाव बनाया जाता है।
📍 5. लोकपाल और सतर्कता संस्थाएँ
भ्रष्टाचार रोकने के लिए विशेष संस्थाएँ बनाई गई हैं।
🔹 लोकपाल
🔹 केंद्रीय सतर्कता आयोग
🔹 सूचना आयोग
ये संस्थाएँ प्रशासन को उत्तरदायी बनाती हैं।
📌 नियंत्रण और स्वतंत्रता में संतुलन
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अत्यधिक नियंत्रण से प्रशासन की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
इसलिए लोकतंत्र में संतुलन आवश्यक है —
🔹 पर्याप्त स्वतंत्रता
🔹 उचित निगरानी
यदि संतुलन बना रहे, तो प्रशासन प्रभावी और उत्तरदायी दोनों बना रहता है।
📌 समालोचनात्मक दृष्टिकोण
प्रशासन पर नियंत्रण लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है, लेकिन व्यवहार में कई चुनौतियाँ भी होती हैं।
🔹 राजनीतिक हस्तक्षेप
🔹 न्यायिक विलंब
🔹 मीडिया का दुरुपयोग
इन समस्याओं के बावजूद नियंत्रण तंत्र लोकतांत्रिक व्यवस्था की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।
📌 निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि लोकतांत्रिक देशों में प्रशासन पर नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है।
नियंत्रण से प्रशासन निरंकुश नहीं बनता, बल्कि वह अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी और जनहितकारी बनता है।
विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया और जनमत — ये सभी मिलकर प्रशासन को नियंत्रित और संतुलित रखते हैं।
इस प्रकार, प्रशासन पर नियंत्रण लोकतंत्र की आत्मा है, जो शासन को जनता के प्रति जवाबदेह और न्यायपूर्ण बनाए रखता है।
प्रश्न 06. तुलनात्मक लोक प्रशासन के महत्व पर प्रकाश डालिए।
📌 प्रस्तावना : तुलनात्मक अध्ययन की आवश्यकता
लोक प्रशासन किसी एक देश तक सीमित विषय नहीं है। प्रत्येक देश की राजनीतिक व्यवस्था, प्रशासनिक ढाँचा, सामाजिक परिस्थितियाँ और आर्थिक संरचना अलग-अलग होती हैं। इसलिए यह समझना आवश्यक हो जाता है कि विभिन्न देशों में प्रशासन किस प्रकार कार्य करता है और उनके अनुभवों से क्या सीखा जा सकता है।
इसी संदर्भ में “तुलनात्मक लोक प्रशासन” (Comparative Public Administration) की अवधारणा विकसित हुई। इसका अर्थ है — विभिन्न देशों की प्रशासनिक व्यवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन करना, ताकि उनकी समानताओं, भिन्नताओं और प्रभावशीलता को समझा जा सके।
आज के वैश्वीकरण के युग में तुलनात्मक लोक प्रशासन का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है।
📌 तुलनात्मक लोक प्रशासन का अर्थ
तुलनात्मक लोक प्रशासन वह अध्ययन पद्धति है जिसमें विभिन्न देशों की प्रशासनिक प्रणालियों, नीतियों और कार्यप्रणालियों की तुलना की जाती है।
🔹 प्रशासनिक संरचना की तुलना
🔹 नीति क्रियान्वयन की तुलना
🔹 विकास के स्तर की तुलना
🔹 संस्थागत व्यवस्थाओं का विश्लेषण
इसका उद्देश्य केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं, बल्कि प्रशासन को अधिक प्रभावी और आधुनिक बनाना है।
📌 तुलनात्मक लोक प्रशासन का महत्व
📍 1. प्रशासनिक सुधार में सहायक
तुलनात्मक अध्ययन से यह पता चलता है कि अन्य देशों में कौन-सी नीतियाँ और व्यवस्थाएँ सफल रही हैं।
🔹 सफल मॉडल को अपनाना
🔹 कमियों से बचना
🔹 नवीन प्रयोगों को समझना
इससे अपने देश में प्रशासनिक सुधार करना आसान हो जाता है।
📍 2. विकासशील देशों के लिए मार्गदर्शन
विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए तुलनात्मक अध्ययन अत्यंत उपयोगी है।
🔹 विकसित देशों के अनुभव
🔹 आर्थिक नीतियों का विश्लेषण
🔹 प्रशासनिक दक्षता के उपाय
इनसे विकासशील देश अपनी योजनाओं को अधिक प्रभावी बना सकते हैं।
📍 3. प्रशासन को वैज्ञानिक बनाना
तुलनात्मक दृष्टिकोण प्रशासन के अध्ययन को अधिक वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ बनाता है।
🔹 तथ्य आधारित निष्कर्ष
🔹 अनुभवजन्य अध्ययन
🔹 शोध और विश्लेषण
इससे प्रशासनिक सिद्धांतों को व्यापक आधार मिलता है।
📍 4. वैश्वीकरण के युग में प्रासंगिकता
आज दुनिया के देश आर्थिक और सामाजिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
🔹 अंतरराष्ट्रीय सहयोग
🔹 वैश्विक संस्थाएँ
🔹 साझा समस्याएँ (जैसे पर्यावरण, महामारी)
इन समस्याओं के समाधान के लिए तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।
📍 5. नीति निर्माण में सहायक
तुलनात्मक लोक प्रशासन नीति निर्माण को अधिक प्रभावी बनाता है।
🔹 अन्य देशों की नीतियों का विश्लेषण
🔹 उनकी सफलता और असफलता का अध्ययन
🔹 स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलन
इससे नीतियाँ अधिक व्यावहारिक बनती हैं।
📍 6. सांस्कृतिक और सामाजिक समझ
प्रत्येक देश की प्रशासनिक प्रणाली उसकी संस्कृति और सामाजिक संरचना से प्रभावित होती है।
तुलनात्मक अध्ययन से यह समझने में सहायता मिलती है कि —
🔹 संस्कृति प्रशासन को कैसे प्रभावित करती है
🔹 सामाजिक मूल्य निर्णय प्रक्रिया को कैसे प्रभावित करते हैं
इससे प्रशासन अधिक संवेदनशील और समावेशी बन सकता है।
📍 7. लोकतंत्र और सुशासन को मजबूत करना
तुलनात्मक लोक प्रशासन से यह पता चलता है कि किन देशों में सुशासन की कौन-सी विशेषताएँ प्रभावी हैं।
🔹 पारदर्शिता
🔹 जवाबदेही
🔹 जनसहभागिता
इन तत्वों को अपनाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ किया जा सकता है।
📍 8. प्रशासनिक सिद्धांतों का विकास
तुलनात्मक अध्ययन से नए सिद्धांत और अवधारणाएँ विकसित होती हैं।
🔹 प्रणाली दृष्टिकोण
🔹 विकास प्रशासन
🔹 नवीन लोक प्रशासन
इन सभी अवधारणाओं के विकास में तुलनात्मक दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
📌 तुलनात्मक लोक प्रशासन की विशेषताएँ
🔹 बहु-देशीय अध्ययन
🔹 अनुभव आधारित विश्लेषण
🔹 सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों पर ध्यान
🔹 विकास और परिवर्तन पर बल
यह केवल संरचना का अध्ययन नहीं करता, बल्कि व्यवहार और परिणामों का भी विश्लेषण करता है।
📌 चुनौतियाँ
हालाँकि तुलनात्मक लोक प्रशासन का महत्व अत्यधिक है, परंतु इसमें कुछ चुनौतियाँ भी हैं।
🔹 देशों की परिस्थितियाँ अलग-अलग
🔹 सांस्कृतिक भिन्नता
🔹 आंकड़ों की उपलब्धता
इसलिए किसी भी मॉडल को सीधे लागू करना संभव नहीं होता, बल्कि उसे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ढालना पड़ता है।
📌 समालोचनात्मक दृष्टिकोण
तुलनात्मक लोक प्रशासन ने प्रशासनिक अध्ययन को नई दिशा दी है।
इसने यह स्पष्ट किया कि प्रशासन को समझने के लिए केवल एक देश का अध्ययन पर्याप्त नहीं है।
हालाँकि कभी-कभी विदेशी मॉडल अपनाने में कठिनाई आती है, फिर भी यह दृष्टिकोण प्रशासन को अधिक व्यापक और आधुनिक बनाता है।
📌 निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि तुलनात्मक लोक प्रशासन का महत्व अत्यंत व्यापक है।
यह प्रशासनिक सुधार, नीति निर्माण, वैज्ञानिक अध्ययन और वैश्विक सहयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए यह एक मार्गदर्शक सिद्ध होता है, जिससे वे विकसित देशों के अनुभवों से सीखकर अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ बना सकते हैं।
इस प्रकार, तुलनात्मक लोक प्रशासन आधुनिक युग में प्रशासनिक अध्ययन का एक अनिवार्य और प्रभावी क्षेत्र है, जो सुशासन और विकास की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
प्रश्न 07. सहभागी प्रबंधन पर टिप्पणी कीजिए।
📌 प्रस्तावना : प्रबंधन में परिवर्तन की आवश्यकता
आधुनिक प्रशासन और प्रबंधन के क्षेत्र में समय के साथ महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। पहले प्रबंधन का स्वरूप केंद्रीकृत और आदेशात्मक (Authoritarian) हुआ करता था, जिसमें निर्णय केवल उच्च अधिकारियों द्वारा लिए जाते थे। कर्मचारियों की भूमिका केवल आदेशों का पालन करने तक सीमित रहती थी।
लेकिन जैसे-जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों और मानव-केंद्रित दृष्टिकोण का विकास हुआ, यह महसूस किया गया कि संगठन की सफलता के लिए केवल आदेश और नियंत्रण पर्याप्त नहीं हैं। कर्मचारियों की सहभागिता, विचारों का आदान-प्रदान और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकती है।
इसी विचार से “सहभागी प्रबंधन” (Participative Management) की अवधारणा विकसित हुई।
📌 सहभागी प्रबंधन का अर्थ
सहभागी प्रबंधन वह प्रबंधन पद्धति है जिसमें संगठन के निर्णय लेने की प्रक्रिया में कर्मचारियों और संबंधित पक्षों को भागीदारी का अवसर दिया जाता है।
सरल शब्दों में, जब प्रबंधक और कर्मचारी मिलकर निर्णय लेते हैं, तो उसे सहभागी प्रबंधन कहा जाता है।
🔹 सामूहिक निर्णय
🔹 विचार-विमर्श
🔹 साझा उत्तरदायित्व
🔹 पारदर्शिता
इस पद्धति में प्रबंधन केवल आदेश देने वाला नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और सहयोगी बन जाता है।
📌 सहभागी प्रबंधन की प्रमुख विशेषताएँ
📍 1. निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी
सहभागी प्रबंधन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है — कर्मचारियों को निर्णय लेने में शामिल करना।
🔹 नीतियों पर सुझाव
🔹 कार्य सुधार के उपाय
🔹 समस्याओं के समाधान
इससे निर्णय अधिक व्यावहारिक और स्वीकार्य बनते हैं।
📍 2. संवाद और संचार
संगठन में खुला संवाद आवश्यक है।
🔹 नियमित बैठकें
🔹 सुझाव प्रणाली
🔹 फीडबैक व्यवस्था
इससे गलतफहमियाँ कम होती हैं और विश्वास बढ़ता है।
📍 3. सामूहिक उत्तरदायित्व
जब निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं, तो उनकी जिम्मेदारी भी साझा होती है।
🔹 कार्य के प्रति समर्पण
🔹 परिणामों के प्रति उत्तरदायित्व
📍 4. विश्वास और सहयोग
सहभागी प्रबंधन आपसी विश्वास पर आधारित होता है।
🔹 प्रबंधक और कर्मचारी के बीच सम्मान
🔹 सहयोगात्मक वातावरण
📍 5. प्रेरणा और संतुष्टि
कर्मचारियों को जब अपने विचार रखने का अवसर मिलता है, तो उनका मनोबल बढ़ता है।
🔹 कार्य संतुष्टि
🔹 रचनात्मकता में वृद्धि
🔹 उत्पादकता में सुधार
📌 सहभागी प्रबंधन के लाभ
📍 1. बेहतर निर्णय
कई लोगों के विचार शामिल होने से निर्णय अधिक संतुलित और व्यावहारिक होते हैं।
📍 2. कार्यकुशलता में वृद्धि
सहभागिता से कर्मचारी संगठन के लक्ष्यों को अपना लक्ष्य मानते हैं।
इससे उत्पादकता बढ़ती है।
📍 3. संघर्ष में कमी
जब सभी को अपनी बात रखने का अवसर मिलता है, तो असंतोष कम होता है।
🔹 विवाद कम
🔹 सकारात्मक वातावरण
📍 4. नवाचार को प्रोत्साहन
कर्मचारी अपने अनुभव के आधार पर नए सुझाव देते हैं।
🔹 नई तकनीक
🔹 कार्य सुधार के उपाय
इससे संगठन अधिक प्रगतिशील बनता है।
📍 5. लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास
सहभागी प्रबंधन लोकतांत्रिक सिद्धांतों को मजबूत करता है।
🔹 समानता
🔹 पारदर्शिता
🔹 उत्तरदायित्व
📌 सहभागी प्रबंधन के दोष और सीमाएँ
📍 1. निर्णय में विलंब
सभी की राय लेने से निर्णय प्रक्रिया धीमी हो सकती है।
📍 2. मतभेद की संभावना
अलग-अलग विचारों के कारण कभी-कभी मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं।
📍 3. गोपनीयता की समस्या
कुछ संवेदनशील निर्णयों में व्यापक सहभागिता संभव नहीं होती।
📍 4. अनुशासन में कमी
यदि सहभागिता का संतुलन न रहे, तो अनुशासन प्रभावित हो सकता है।
📌 प्रशासनिक संदर्भ में सहभागी प्रबंधन
लोक प्रशासन में सहभागी प्रबंधन का विशेष महत्व है।
🔹 पंचायत राज संस्थाएँ
🔹 स्थानीय निकाय
🔹 जनसुनवाई
🔹 सामाजिक अंकेक्षण
इन माध्यमों से जनता को प्रशासन में भागीदारी का अवसर मिलता है।
इससे नीतियाँ अधिक प्रभावी और जनहितकारी बनती हैं।
📌 समालोचनात्मक दृष्टिकोण
सहभागी प्रबंधन आधुनिक संगठनों के लिए अत्यंत उपयोगी है, परंतु इसे संतुलित रूप में लागू करना आवश्यक है।
🔹 नेतृत्व की स्पष्टता
🔹 निर्णय प्रक्रिया की समय सीमा
🔹 उचित समन्वय
यदि इन बातों का ध्यान रखा जाए, तो सहभागी प्रबंधन संगठन को अधिक मजबूत और प्रभावी बना सकता है।
📌 निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि सहभागी प्रबंधन एक आधुनिक और लोकतांत्रिक प्रबंधन पद्धति है, जो सामूहिक निर्णय और साझा उत्तरदायित्व पर आधारित है।
यह कर्मचारियों में प्रेरणा, संतुष्टि और नवाचार को बढ़ावा देता है।
हालाँकि इसमें कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी उचित संतुलन और नेतृत्व के माध्यम से इसे प्रभावी बनाया जा सकता है।
इस प्रकार, सहभागी प्रबंधन संगठन को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और परिणामोन्मुख बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन है।
प्रश्न 08. प्रशासन के राजनीतिक परिवेश का वर्णन कीजिये।
📌 प्रस्तावना : प्रशासन और राजनीति का संबंध
लोक प्रशासन और राजनीति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यद्यपि प्रारंभिक विचारकों ने राजनीति और प्रशासन को अलग-अलग क्षेत्रों के रूप में प्रस्तुत किया था, परंतु व्यवहारिक जीवन में यह पूर्णतः संभव नहीं है। प्रशासन सरकार की नीतियों को लागू करता है, और नीतियाँ राजनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से बनती हैं।
इसलिए प्रशासन का कार्य जिस वातावरण में होता है, उसे “राजनीतिक परिवेश” कहा जाता है। राजनीतिक परिवेश प्रशासन की दिशा, कार्यशैली और निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करता है।
लोकतांत्रिक, अधिनायकवादी या संघीय — प्रत्येक प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था प्रशासन के स्वरूप और कार्यप्रणाली को अलग-अलग रूप से प्रभावित करती है।
📌 राजनीतिक परिवेश का अर्थ
राजनीतिक परिवेश से आशय उन राजनीतिक परिस्थितियों, संस्थाओं, मूल्यों और शक्तियों से है, जिनके भीतर प्रशासन कार्य करता है।
🔹 शासन प्रणाली
🔹 राजनीतिक दल
🔹 विधायिका
🔹 कार्यपालिका
🔹 न्यायपालिका
🔹 जनमत
ये सभी तत्व प्रशासन के कार्य को प्रभावित करते हैं।
📌 प्रशासन के राजनीतिक परिवेश के प्रमुख घटक
📍 1. शासन प्रणाली (Form of Government)
किसी देश की शासन प्रणाली प्रशासन की प्रकृति को निर्धारित करती है।
🔹 संसदीय प्रणाली में प्रशासन मंत्रिपरिषद के प्रति उत्तरदायी होता है।
🔹 राष्ट्रपति प्रणाली में प्रशासन राष्ट्रपति के नियंत्रण में कार्य करता है।
इस प्रकार शासन प्रणाली प्रशासन की जवाबदेही और नियंत्रण को प्रभावित करती है।
📍 2. राजनीतिक दलों की भूमिका
राजनीतिक दल नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
🔹 चुनावी घोषणापत्र
🔹 विचारधारा
🔹 सत्ता परिवर्तन
जब सरकार बदलती है, तो प्रशासन को नई नीतियों के अनुसार कार्य करना पड़ता है।
इसलिए राजनीतिक दलों की नीतियाँ प्रशासन को दिशा देती हैं।
📍 3. विधायिका का प्रभाव
विधायिका कानून बनाती है और प्रशासन उन्हीं कानूनों के अनुसार कार्य करता है।
🔹 प्रश्नकाल
🔹 बजट चर्चा
🔹 समिति प्रणाली
विधायिका प्रशासन की गतिविधियों पर निगरानी रखती है।
📍 4. कार्यपालिका का नियंत्रण
कार्यपालिका प्रशासन को निर्देश देती है।
🔹 नीतिगत निर्णय
🔹 अधिकारियों की नियुक्ति
🔹 स्थानांतरण और अनुशासन
इस प्रकार कार्यपालिका प्रशासन का प्रत्यक्ष नियंत्रण करती है।
📍 5. न्यायपालिका की भूमिका
न्यायपालिका प्रशासन के कार्यों की वैधता की जाँच करती है।
🔹 न्यायिक पुनरावलोकन
🔹 नागरिक अधिकारों की रक्षा
यदि प्रशासन कानून के विरुद्ध कार्य करे, तो न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है।
📍 6. जनमत और मीडिया
लोकतंत्र में जनमत और मीडिया प्रशासन को प्रभावित करते हैं।
🔹 समाचार रिपोर्ट
🔹 सामाजिक आंदोलन
🔹 सार्वजनिक आलोचना
जनमत प्रशासन को अधिक उत्तरदायी बनाता है।
📌 राजनीतिक परिवेश का प्रशासन पर प्रभाव
📍 1. नीति क्रियान्वयन पर प्रभाव
प्रशासन को राजनीतिक नेतृत्व द्वारा निर्धारित नीतियों को लागू करना होता है।
यदि राजनीतिक वातावरण स्थिर हो, तो नीतियाँ प्रभावी रूप से लागू होती हैं।
📍 2. निष्पक्षता और तटस्थता की चुनौती
राजनीतिक दबाव के कारण कभी-कभी प्रशासन की तटस्थता प्रभावित हो सकती है।
इसलिए प्रशासन को राजनीतिक प्रभाव से संतुलित दूरी बनाए रखनी चाहिए।
📍 3. स्थिरता और विकास
राजनीतिक स्थिरता प्रशासन को सुचारु रूप से कार्य करने में सहायता करती है।
अस्थिर राजनीतिक स्थिति में —
🔹 नीतियों में बार-बार परिवर्तन
🔹 निर्णय में देरी
देखी जा सकती है।
📍 4. संघीय व्यवस्था में प्रभाव
संघीय देशों में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच संबंध प्रशासन को प्रभावित करते हैं।
🔹 शक्तियों का विभाजन
🔹 समन्वय की आवश्यकता
इससे प्रशासनिक कार्य जटिल हो सकते हैं।
📌 लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी परिवेश में अंतर
🔹 लोकतंत्र में प्रशासन जनता के प्रति उत्तरदायी होता है।
🔹 अधिनायकवादी व्यवस्था में प्रशासन शासक के प्रति उत्तरदायी होता है।
लोकतांत्रिक परिवेश में पारदर्शिता और जनसहभागिता अधिक होती है, जबकि अधिनायकवादी प्रणाली में केंद्रीकरण अधिक होता है।
📌 राजनीतिक तटस्थता का महत्व
प्रशासन को राजनीतिक रूप से तटस्थ रहना चाहिए।
🔹 निष्पक्ष निर्णय
🔹 समान व्यवहार
🔹 कानून के अनुसार कार्य
यदि प्रशासन राजनीतिक पक्षपात करे, तो लोकतांत्रिक मूल्यों को हानि पहुँच सकती है।
📌 समालोचनात्मक दृष्टिकोण
हालाँकि राजनीति और प्रशासन को अलग रखने का प्रयास किया जाता है, परंतु पूर्ण पृथक्करण संभव नहीं है।
प्रशासन को राजनीतिक निर्देशों का पालन करना होता है, परंतु उसे कानून और नैतिकता का भी ध्यान रखना चाहिए।
इसलिए संतुलन आवश्यक है —
🔹 राजनीतिक नेतृत्व का सम्मान
🔹 प्रशासनिक निष्पक्षता
📌 निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि प्रशासन का राजनीतिक परिवेश उसके कार्य और स्वरूप को गहराई से प्रभावित करता है।
शासन प्रणाली, राजनीतिक दल, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और जनमत — ये सभी प्रशासन के कार्यक्षेत्र को निर्धारित करते हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन को उत्तरदायी, पारदर्शी और तटस्थ रहना आवश्यक है।
इस प्रकार, प्रशासन और राजनीति के बीच संतुलित संबंध ही सुशासन और विकास की आधारशिला है।
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