प्रश्न 01. समाजशास्त्र की परिभाषा दीजिए तथा इसके विषय क्षेत्र का वर्णन कीजिए।
समाजशास्त्र एक महत्वपूर्ण सामाजिक विज्ञान है। यह मनुष्य और समाज के बीच संबंधों का अध्ययन करता है। जब हम समाज में रहते हैं, तो हम परिवार, विद्यालय, धर्म, राजनीति, अर्थव्यवस्था, संस्कृति आदि कई संस्थाओं से जुड़े होते हैं। इन सभी का आपस में संबंध होता है। समाजशास्त्र इन्हीं संबंधों और सामाजिक प्रक्रियाओं को समझने का प्रयास करता है। सरल शब्दों में कहें तो समाजशास्त्र हमें यह समझाता है कि समाज कैसे बनता है, कैसे चलता है और कैसे बदलता है।
अब हम क्रम से समाजशास्त्र की परिभाषा और उसके विषय क्षेत्र को समझेंगे।
📌 समाजशास्त्र का अर्थ
समाजशास्त्र शब्द अंग्रेजी के “Sociology” से बना है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है —
“Socio” जिसका अर्थ है समाज और
“Logy” जिसका अर्थ है अध्ययन।
इस प्रकार समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ है — समाज का अध्ययन।
समाजशास्त्र केवल समाज को देखने का नाम नहीं है, बल्कि यह समाज का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन करता है। इसमें तथ्यों का विश्लेषण किया जाता है। अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाण के आधार पर निष्कर्ष निकाले जाते हैं।
📌 समाजशास्त्र की प्रमुख परिभाषाएँ
विभिन्न विद्वानों ने समाजशास्त्र की अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं। इन परिभाषाओं को समझना आवश्यक है।
🔹 ऑगस्ट कॉम्ट की परिभाषा
ऑगस्ट कॉम्ट को समाजशास्त्र का जनक माना जाता है। उन्होंने कहा कि समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है।
उनके अनुसार समाज को भी उसी प्रकार अध्ययन करना चाहिए जैसे विज्ञान में प्रकृति का अध्ययन किया जाता है।
🔹 मैक्स वेबर की परिभाषा
मैक्स वेबर के अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक क्रियाओं का अध्ययन है।
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति कोई कार्य समाज को ध्यान में रखकर करता है, तो वह सामाजिक क्रिया कहलाती है। समाजशास्त्र इन्हीं क्रियाओं को समझता है।
🔹 एमिल दुर्खीम की परिभाषा
दुर्खीम के अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक तथ्यों का अध्ययन है।
सामाजिक तथ्य वे नियम और मान्यताएँ हैं जो समाज में पहले से मौजूद होते हैं और व्यक्ति को प्रभावित करते हैं।
🔹 गिन्सबर्ग की परिभाषा
गिन्सबर्ग ने कहा कि समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों का अध्ययन है।
इन सभी परिभाषाओं से स्पष्ट है कि समाजशास्त्र समाज, सामाजिक संबंधों, सामाजिक क्रियाओं और सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन करता है।
📌 समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र
अब प्रश्न का दूसरा भाग आता है — समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र क्या है?
विषय क्षेत्र से तात्पर्य है कि समाजशास्त्र किन-किन बातों का अध्ययन करता है।
समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र बहुत व्यापक है। इसे हम निम्न भागों में समझ सकते हैं।
📍 सामाजिक संबंधों का अध्ययन
🔸 व्यक्ति और समाज का संबंध
समाजशास्त्र यह जानने का प्रयास करता है कि व्यक्ति समाज से कैसे जुड़ा है।
व्यक्ति अकेला नहीं रह सकता। वह समाज में रहकर ही अपना विकास करता है।
🔸 समूहों का अध्ययन
समाज में कई प्रकार के समूह होते हैं —
परिवार, मित्र समूह, विद्यालय, संगठन आदि।
समाजशास्त्र इन समूहों की संरचना और कार्यों का अध्ययन करता है।
📍 सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन
समाजशास्त्र समाज की प्रमुख संस्थाओं का अध्ययन करता है।
🔸 परिवार
परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है।
यह व्यक्ति को जन्म से लेकर जीवनभर मार्गदर्शन देता है।
🔸 विवाह
विवाह एक सामाजिक संस्था है जो परिवार की नींव रखती है।
🔸 धर्म
धर्म समाज में नैतिक नियमों और आस्थाओं को बनाए रखता है।
🔸 शिक्षा
शिक्षा व्यक्ति को ज्ञान और संस्कार देती है।
🔸 राजनीति
राजनीति समाज में शासन और व्यवस्था बनाए रखती है।
🔸 अर्थव्यवस्था
अर्थव्यवस्था उत्पादन, वितरण और उपभोग से संबंधित है।
📍 सामाजिक प्रक्रियाओं का अध्ययन
समाजशास्त्र यह भी देखता है कि समाज में परिवर्तन कैसे होता है।
🔸 सहयोग
जब लोग मिलकर कार्य करते हैं तो उसे सहयोग कहते हैं।
🔸 प्रतिस्पर्धा
जब दो या अधिक व्यक्ति एक ही लक्ष्य के लिए प्रयास करते हैं तो उसे प्रतिस्पर्धा कहते हैं।
🔸 संघर्ष
मतभेद होने पर संघर्ष उत्पन्न होता है।
🔸 समायोजन
संघर्ष के बाद समझौता करके साथ रहना समायोजन कहलाता है।
📍 सामाजिक परिवर्तन का अध्ययन
समाज स्थिर नहीं रहता। समय के साथ बदलता है।
नई तकनीक, शिक्षा, औद्योगीकरण, नगरीकरण आदि समाज में परिवर्तन लाते हैं।
समाजशास्त्र इन परिवर्तनों के कारणों और प्रभावों का अध्ययन करता है।
📍 सामाजिक समस्याओं का अध्ययन
समाज में कई समस्याएँ होती हैं जैसे —
गरीबी, बेरोजगारी, अपराध, भ्रष्टाचार, दहेज प्रथा, जातिवाद आदि।
समाजशास्त्र इन समस्याओं के कारणों को समझता है और समाधान की दिशा में सोचने में सहायता करता है।
📍 संस्कृति का अध्ययन
संस्कृति में रीति-रिवाज, परंपराएँ, भाषा, पहनावा, भोजन आदि शामिल होते हैं।
समाजशास्त्र विभिन्न संस्कृतियों का अध्ययन करता है और यह समझता है कि संस्कृति समाज को कैसे प्रभावित करती है।
📍 सामाजिक नियंत्रण का अध्ययन
समाज में नियम और कानून होते हैं।
इनका उद्देश्य व्यवस्था बनाए रखना है।
परिवार, धर्म, शिक्षा और कानून सामाजिक नियंत्रण के साधन हैं।
समाजशास्त्र इन साधनों का अध्ययन करता है।
📌 समाजशास्त्र की प्रकृति
समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है।
यह वस्तुनिष्ठ (Objective) होता है।
यह तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष देता है।
यह समाज के वास्तविक स्वरूप को समझने का प्रयास करता है।
📌 निष्कर्ष
अंत में हम कह सकते हैं कि समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है।
यह सामाजिक संबंधों, संस्थाओं, प्रक्रियाओं, संस्कृति, परिवर्तन और समस्याओं का अध्ययन करता है।
समाजशास्त्र हमें यह समझने में मदद करता है कि हम समाज में कैसे रहते हैं, हमारे व्यवहार पर समाज का क्या प्रभाव पड़ता है और समाज में सुधार कैसे किया जा सकता है।
आज के आधुनिक युग में समाजशास्त्र का महत्व और भी बढ़ गया है। तेजी से बदलते समाज को समझने के लिए समाजशास्त्र आवश्यक है।
इस प्रकार समाजशास्त्र न केवल एक शैक्षणिक विषय है, बल्कि समाज को समझने का एक सशक्त माध्यम भी है।
प्रश्न 02 समाज से आप क्या समझते हैं? मानव समाज की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य अकेले नहीं रह सकता। वह दूसरों के साथ मिलकर रहता है। जब बहुत से लोग आपस में संबंध बनाकर, नियमों और मान्यताओं के आधार पर एक संगठित जीवन जीते हैं, तो उसे समाज कहते हैं। समाज केवल लोगों की भीड़ नहीं है। समाज संबंधों का जाल है। समाज में व्यक्ति, परिवार, समूह, संस्थाएँ, संस्कृति और नियम सब मिलकर कार्य करते हैं।
अब हम पहले समाज का अर्थ समझेंगे और फिर मानव समाज की प्रमुख विशेषताओं को विस्तार से जानेंगे।
📌 समाज का अर्थ
समाज शब्द का सामान्य अर्थ है – लोगों का समूह। लेकिन समाजशास्त्र में इसका अर्थ थोड़ा गहरा है। समाज उन व्यक्तियों का संगठित समूह है जो आपस में सामाजिक संबंध रखते हैं और कुछ सामान्य नियमों, परंपराओं और मूल्यों का पालन करते हैं।
समाज केवल भौतिक रूप से एक साथ रहने का नाम नहीं है। यदि कुछ लोग एक जगह इकट्ठे हो जाएँ, तो वह समाज नहीं कहलाता। समाज तब बनता है जब उन लोगों के बीच स्थायी संबंध, सहयोग, नियम और परस्पर निर्भरता हो।
समाज में व्यक्ति जन्म लेता है, शिक्षा पाता है, काम करता है और अपने जीवन के सभी कार्य समाज के अंदर ही करता है। इसलिए समाज मानव जीवन का आधार है।
📌 समाज की परिभाषाएँ
विभिन्न विद्वानों ने समाज की अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं।
🔹 मैकाइवर और पेज के अनुसार
समाज सामाजिक संबंधों का जाल है।
इसका अर्थ है कि समाज संबंधों से बनता है, केवल व्यक्तियों से नहीं।
🔹 गिन्सबर्ग के अनुसार
समाज उन व्यक्तियों का समूह है जो कुछ सामान्य संबंधों द्वारा एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।
इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि समाज संबंधों, नियमों और परस्पर सहयोग पर आधारित होता है।
अब हम मानव समाज की प्रमुख विशेषताओं को क्रम से समझते हैं।
📌 मानव समाज की प्रमुख विशेषताएँ
📍 1. पारस्परिक संबंध
🔸 संबंधों का जाल
समाज का मुख्य आधार संबंध है।
व्यक्ति माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, शिक्षक, पड़ोसी आदि से संबंध रखता है।
इन्हीं संबंधों से समाज का निर्माण होता है।
🔸 स्थायी संबंध
समाज में संबंध अस्थायी नहीं होते। वे लंबे समय तक चलते हैं।
इन्हीं स्थायी संबंधों से सामाजिक व्यवस्था बनी रहती है।
📍 2. पारस्परिक निर्भरता
🔸 एक-दूसरे पर निर्भरता
समाज में कोई भी व्यक्ति पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होता।
किसान अन्न उगाता है, शिक्षक पढ़ाता है, डॉक्टर इलाज करता है।
हर व्यक्ति दूसरे पर निर्भर होता है।
🔸 श्रम विभाजन
समाज में काम का बँटवारा होता है।
इसे श्रम विभाजन कहते हैं।
इसी से समाज सुचारू रूप से चलता है।
📍 3. सहयोग की भावना
🔸 मिलकर कार्य करना
समाज में लोग एक-दूसरे की सहायता करते हैं।
परिवार, विद्यालय और अन्य संस्थाएँ सहयोग पर आधारित होती हैं।
🔸 सामाजिक एकता
सहयोग से समाज में एकता और शांति बनी रहती है।
📍 4. समानता और असमानता
🔸 समानता
समाज में सभी मनुष्य मानव होने के कारण समान हैं।
सभी को जीने और विकास का अधिकार है।
🔸 असमानता
लेकिन समाज में धन, शिक्षा, पद और प्रतिष्ठा के आधार पर असमानता भी पाई जाती है।
यही असमानता समाज में वर्ग और श्रेणी का निर्माण करती है।
📍 5. नियम और नियंत्रण
🔸 सामाजिक नियम
समाज में आचरण के नियम होते हैं।
जैसे बड़ों का सम्मान करना, कानून का पालन करना।
🔸 सामाजिक नियंत्रण
परिवार, धर्म, शिक्षा और कानून समाज में अनुशासन बनाए रखते हैं।
यदि कोई व्यक्ति नियम तोड़ता है, तो उसे दंड भी मिल सकता है।
📍 6. संस्कृति
🔸 परंपराएँ और रीति-रिवाज
हर समाज की अपनी संस्कृति होती है।
इसमें भाषा, पहनावा, भोजन, त्यौहार और परंपराएँ शामिल होती हैं।
🔸 पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरण
संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती है।
इसी से समाज की पहचान बनी रहती है।
📍 7. गतिशीलता
🔸 परिवर्तनशील स्वभाव
समाज स्थिर नहीं रहता।
समय के साथ समाज बदलता है।
🔸 आधुनिक प्रभाव
शिक्षा, तकनीक, औद्योगीकरण और नगरीकरण से समाज में तेजी से परिवर्तन आते हैं।
📍 8. संगठन
🔸 संस्थाओं का निर्माण
समाज में कई संस्थाएँ होती हैं — परिवार, विवाह, धर्म, शिक्षा, राजनीति आदि।
ये संस्थाएँ समाज को व्यवस्थित रखती हैं।
🔸 संरचना
समाज की एक संरचना होती है।
इसमें पद, भूमिका और स्थिति निश्चित होती है।
📍 9. सामूहिक जीवन
🔸 समूह में जीवन
समाज में लोग अकेले नहीं बल्कि समूह में रहते हैं।
परिवार, मित्र समूह, संगठन आदि इसका उदाहरण हैं।
🔸 सामूहिक उद्देश्य
समाज के कुछ सामान्य लक्ष्य होते हैं।
जैसे शांति, सुरक्षा और विकास।
📍 10. भौगोलिक क्षेत्र
🔸 निश्चित क्षेत्र
हर समाज का एक निश्चित क्षेत्र होता है।
लोग एक विशेष स्थान पर रहकर समाज बनाते हैं।
🔸 स्थानीय पहचान
भौगोलिक क्षेत्र के अनुसार समाज की पहचान बनती है।
जैसे ग्रामीण समाज और नगरीय समाज।
📌 समाज और मानव जीवन का संबंध
समाज के बिना मानव जीवन अधूरा है।
मनुष्य का विकास समाज में रहकर ही संभव है।
बच्चा जन्म के समय कुछ नहीं जानता। वह समाज से ही भाषा, आचार-विचार और व्यवहार सीखता है।
यदि मनुष्य समाज से अलग हो जाए, तो उसका विकास रुक जाएगा। इसलिए समाज मानव जीवन की मूल आवश्यकता है।
📌 निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि समाज केवल व्यक्तियों का समूह नहीं है, बल्कि सामाजिक संबंधों, नियमों, संस्कृति और सहयोग का संगठित रूप है।
मानव समाज की प्रमुख विशेषताएँ जैसे पारस्परिक संबंध, निर्भरता, सहयोग, संस्कृति, नियम, संगठन और परिवर्तनशीलता इसे अन्य जीवों के समूह से अलग बनाती हैं।
समाज मानव जीवन का आधार है। यही व्यक्ति को पहचान, सुरक्षा और विकास का अवसर देता है।
इस प्रकार समाज मानव जीवन का अभिन्न अंग है और उसकी विशेषताओं को समझना समाजशास्त्र का मुख्य उद्देश्य है।
प्रश्न 03 प्रस्थिति की परिभाषा दीजिए। प्रस्थिति के मुख्य निर्धारकों की विवेचना कीजिए।
समाज में प्रत्येक व्यक्ति का एक निश्चित स्थान होता है। कोई शिक्षक है, कोई छात्र है, कोई पिता है, कोई अधिकारी है। समाज में इन स्थानों को ही प्रस्थिति कहा जाता है। जब हम किसी व्यक्ति को उसके सामाजिक स्थान के आधार पर पहचानते हैं, तो हम उसकी प्रस्थिति को पहचान रहे होते हैं। समाजशास्त्र में प्रस्थिति एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, क्योंकि समाज की पूरी संरचना इसी पर आधारित होती है।
अब हम क्रम से प्रस्थिति का अर्थ, परिभाषा और उसके मुख्य निर्धारकों को विस्तार से समझेंगे।
📌 प्रस्थिति का अर्थ
प्रस्थिति का सामान्य अर्थ है — समाज में किसी व्यक्ति का स्थान या पद।
जब समाज किसी व्यक्ति को एक विशेष दर्जा देता है, तो वही उसकी प्रस्थिति होती है।
उदाहरण के लिए —
एक विद्यालय में प्रधानाचार्य, शिक्षक और छात्र — सभी की अलग-अलग प्रस्थिति होती है।
परिवार में पिता, माता और पुत्र की अलग-अलग प्रस्थिति होती है।
इस प्रकार प्रस्थिति सामाजिक व्यवस्था का आधार है।
📌 प्रस्थिति की परिभाषाएँ
विभिन्न समाजशास्त्रियों ने प्रस्थिति की परिभाषा दी है।
🔹 राल्फ लिंटन के अनुसार
प्रस्थिति समाज में किसी व्यक्ति का वह स्थान है जिसे समाज मान्यता देता है।
अर्थात समाज यह तय करता है कि व्यक्ति का दर्जा क्या होगा।
🔹 मैकाइवर और पेज के अनुसार
प्रस्थिति वह सामाजिक स्थान है जो व्यक्ति को उसके सामाजिक संबंधों के आधार पर प्राप्त होता है।
इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि प्रस्थिति व्यक्ति का व्यक्तिगत गुण नहीं, बल्कि समाज द्वारा दिया गया स्थान है।
📌 प्रस्थिति के प्रकार (संक्षेप में)
मुख्य विषय पर जाने से पहले प्रस्थिति के दो प्रकार समझ लेना आवश्यक है।
🔹 जन्मजात प्रस्थिति
जो प्रस्थिति जन्म के साथ मिलती है।
जैसे — जाति, लिंग, परिवार।
🔹 अर्जित प्रस्थिति
जो व्यक्ति अपने प्रयासों से प्राप्त करता है।
जैसे — डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, अधिकारी।
अब हम मुख्य भाग पर आते हैं — प्रस्थिति के निर्धारक।
📌 प्रस्थिति के मुख्य निर्धारक
निर्धारक से तात्पर्य है — वे तत्व जो किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति को तय करते हैं।
📍 1. जन्म
🔸 परिवार
व्यक्ति किस परिवार में जन्म लेता है, यह उसकी प्रारंभिक प्रस्थिति तय करता है।
उच्च या निम्न आर्थिक स्थिति वाला परिवार उसकी सामाजिक पहचान को प्रभावित करता है।
🔸 जाति
भारतीय समाज में जाति एक महत्वपूर्ण निर्धारक रही है।
जाति के आधार पर व्यक्ति की सामाजिक स्थिति निश्चित की जाती थी।
🔸 लिंग
पुरुष और महिला की प्रस्थिति समाज में अलग-अलग हो सकती है।
कई समाजों में पुरुषों को अधिक महत्व दिया गया है।
📍 2. शिक्षा
🔸 शैक्षणिक योग्यता
शिक्षा व्यक्ति की अर्जित प्रस्थिति को निर्धारित करती है।
उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति को समाज में सम्मान मिलता है।
🔸 ज्ञान और कौशल
जिसके पास अधिक ज्ञान और कौशल है, उसकी सामाजिक स्थिति बेहतर होती है।
📍 3. व्यवसाय
🔸 कार्य का प्रकार
व्यक्ति का पेशा उसकी प्रस्थिति तय करता है।
जैसे — डॉक्टर, न्यायाधीश, प्रोफेसर आदि को उच्च सम्मान मिलता है।
🔸 आय स्तर
अधिक आय वाला व्यवसाय व्यक्ति की स्थिति को मजबूत करता है।
📍 4. आर्थिक स्थिति
🔸 संपत्ति
जिस व्यक्ति के पास अधिक धन और संपत्ति होती है, उसकी सामाजिक स्थिति ऊँची मानी जाती है।
🔸 जीवन स्तर
अच्छा घर, वाहन, सुविधाएँ — ये सभी व्यक्ति की सामाजिक प्रस्थिति को प्रभावित करते हैं।
📍 5. शक्ति और अधिकार
🔸 राजनीतिक शक्ति
नेता, मंत्री या अधिकारी की सामाजिक स्थिति अधिक प्रभावशाली होती है।
🔸 प्रशासनिक अधिकार
जिनके पास निर्णय लेने की शक्ति होती है, उनका दर्जा समाज में ऊँचा होता है।
📍 6. उपलब्धियाँ
🔸 व्यक्तिगत सफलता
प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता, खेल में उपलब्धि या कला में प्रसिद्धि व्यक्ति की स्थिति को बढ़ाती है।
🔸 पुरस्कार और सम्मान
पुरस्कार मिलने से व्यक्ति की सामाजिक पहचान मजबूत होती है।
📍 7. आयु
🔸 उम्र का प्रभाव
कई समाजों में बुजुर्गों को अधिक सम्मान दिया जाता है।
आयु के आधार पर भी प्रस्थिति बदलती रहती है।
📍 8. धर्म और संस्कृति
🔸 धार्मिक पहचान
कुछ समाजों में धर्म भी व्यक्ति की स्थिति को प्रभावित करता है।
🔸 सांस्कृतिक मान्यता
जो व्यक्ति समाज की परंपराओं और मूल्यों का पालन करता है, उसे सम्मान मिलता है।
📌 प्रस्थिति और भूमिका का संबंध
प्रस्थिति और भूमिका एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।
प्रस्थिति व्यक्ति का स्थान है, जबकि भूमिका उस स्थान से जुड़ी जिम्मेदारी है।
उदाहरण के लिए —
यदि कोई शिक्षक है (प्रस्थिति), तो उसे पढ़ाना और विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करना (भूमिका) होगा।
इस प्रकार बिना भूमिका के प्रस्थिति अधूरी है।
📌 आधुनिक समाज में प्रस्थिति
आधुनिक समाज में जन्म से अधिक महत्व अर्जित प्रस्थिति को दिया जाता है।
शिक्षा और प्रतिभा के आधार पर व्यक्ति अपनी स्थिति बदल सकता है।
यह सामाजिक गतिशीलता का संकेत है।
पहले जाति और जन्म अधिक महत्वपूर्ण थे, लेकिन अब योग्यता और मेहनत को अधिक महत्व दिया जाता है।
📌 निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि प्रस्थिति समाज में व्यक्ति का मान्यता प्राप्त स्थान है।
यह व्यक्ति की पहचान का आधार है।
प्रस्थिति के मुख्य निर्धारक हैं — जन्म, शिक्षा, व्यवसाय, आर्थिक स्थिति, शक्ति, उपलब्धियाँ, आयु और धर्म।
ये सभी तत्व मिलकर व्यक्ति की सामाजिक स्थिति को निर्धारित करते हैं।
समाज में व्यवस्था और संतुलन बनाए रखने के लिए प्रस्थिति आवश्यक है।
इसी के आधार पर व्यक्ति अपनी भूमिका निभाता है और समाज में योगदान देता है।
इस प्रकार प्रस्थिति समाज की संरचना का महत्वपूर्ण अंग है और इसके निर्धारकों को समझना समाजशास्त्र के अध्ययन में अत्यंत आवश्यक है।
प्रश्न 04 सामाजिक स्तरीकरण क्या है? स्तरीकरण के प्रमुख आधारों की विवेचना कीजिए।
समाज में सभी लोग एक समान स्थिति में नहीं होते। कुछ लोगों के पास अधिक धन होता है, कुछ के पास कम। कुछ को अधिक सम्मान मिलता है, कुछ को कम। कुछ के पास शक्ति और अधिकार होते हैं, जबकि कुछ साधारण जीवन जीते हैं। इस प्रकार समाज में लोगों के बीच जो ऊँच-नीच या स्तरों का विभाजन होता है, उसे सामाजिक स्तरीकरण कहते हैं।
यह एक सामान्य और स्थायी सामाजिक व्यवस्था है। हर समाज में किसी न किसी रूप में स्तरीकरण पाया जाता है। अब हम इसे विस्तार से समझेंगे।
📌 सामाजिक स्तरीकरण का अर्थ
सामाजिक स्तरीकरण का अर्थ है — समाज का विभिन्न स्तरों या श्रेणियों में विभाजन।
यह विभाजन धन, शक्ति, प्रतिष्ठा, जाति, शिक्षा आदि के आधार पर होता है।
स्तरीकरण शब्द का अर्थ है — परतों में बाँटना।
जैसे मिट्टी की कई परतें होती हैं, वैसे ही समाज में भी कई स्तर होते हैं।
समाज में कुछ लोग उच्च स्तर पर होते हैं और कुछ निम्न स्तर पर। यही स्तरीकरण है।
📌 सामाजिक स्तरीकरण की परिभाषाएँ
विभिन्न समाजशास्त्रियों ने स्तरीकरण को अलग-अलग ढंग से समझाया है।
🔹 गिस्बर्ट के अनुसार
सामाजिक स्तरीकरण समाज का स्थायी समूहों या श्रेणियों में विभाजन है, जो ऊँच-नीच के क्रम में व्यवस्थित होते हैं।
🔹 सोरोकिन के अनुसार
सामाजिक स्तरीकरण वह व्यवस्था है जिसमें समाज के लोग विभिन्न स्तरों में बँटे होते हैं।
इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि स्तरीकरण समाज की एक स्थायी व्यवस्था है।
📌 सामाजिक स्तरीकरण की विशेषताएँ
मुख्य आधारों पर जाने से पहले इसकी कुछ विशेषताएँ समझ लेते हैं।
🔹 यह सार्वभौमिक है
हर समाज में पाया जाता है।
🔹 यह स्थायी है
यह अस्थायी व्यवस्था नहीं है।
🔹 यह सामाजिक है
यह व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था है।
🔹 यह असमानता पर आधारित है
स्तरीकरण का आधार असमानता है।
अब हम सामाजिक स्तरीकरण के प्रमुख आधारों की विवेचना करेंगे।
📌 सामाजिक स्तरीकरण के प्रमुख आधार
📍 1. जाति
🔸 जन्म पर आधारित व्यवस्था
भारतीय समाज में जाति स्तरीकरण का प्रमुख आधार रही है।
जाति जन्म के साथ निर्धारित होती है।
🔸 स्थायी स्थिति
जाति बदली नहीं जा सकती।
इसलिए यह बंद (Closed) स्तरीकरण प्रणाली है।
🔸 सामाजिक ऊँच-नीच
जाति के आधार पर लोगों को उच्च और निम्न श्रेणियों में बाँटा गया।
📍 2. वर्ग
🔸 आर्थिक आधार
वर्ग धन और आय के आधार पर तय होता है।
समाज में उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग पाए जाते हैं।
🔸 खुली व्यवस्था
वर्ग व्यवस्था खुली होती है।
व्यक्ति मेहनत से अपनी स्थिति बदल सकता है।
🔸 आधुनिक समाज में महत्व
आज के समाज में वर्ग स्तरीकरण का मुख्य आधार बन गया है।
📍 3. शक्ति
🔸 राजनीतिक शक्ति
जिन लोगों के पास सत्ता और निर्णय लेने की शक्ति होती है, वे उच्च स्तर पर होते हैं।
🔸 प्रशासनिक अधिकार
अधिकारी और नेता समाज में प्रभावशाली माने जाते हैं।
📍 4. प्रतिष्ठा
🔸 सामाजिक सम्मान
प्रतिष्ठा का अर्थ है — समाज में मिलने वाला सम्मान।
कुछ व्यवसायों को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है, जैसे डॉक्टर, शिक्षक।
🔸 सामाजिक मान्यता
जिसे समाज अधिक सम्मान देता है, उसकी स्थिति ऊँची मानी जाती है।
📍 5. शिक्षा
🔸 ज्ञान का स्तर
उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति को अधिक सम्मान मिलता है।
🔸 सामाजिक गतिशीलता
शिक्षा व्यक्ति को अपनी सामाजिक स्थिति बदलने का अवसर देती है।
📍 6. लिंग
🔸 पुरुष और महिला का अंतर
कई समाजों में पुरुषों को महिलाओं से अधिक महत्व दिया गया।
🔸 समानता की दिशा
आधुनिक समाज में लिंग समानता की ओर प्रयास हो रहे हैं।
📍 7. आयु
🔸 बुजुर्गों का सम्मान
कई समाजों में आयु के आधार पर सम्मान दिया जाता है।
🔸 अनुभव का महत्व
अधिक आयु वाले व्यक्ति को अनुभव के कारण उच्च स्थान मिलता है।
📍 8. धर्म
🔸 धार्मिक पहचान
कुछ समाजों में धर्म भी स्तरीकरण का आधार होता है।
🔸 धार्मिक पद
धार्मिक नेताओं को समाज में विशेष सम्मान मिलता है।
📌 सामाजिक स्तरीकरण के प्रकार (संक्षेप में)
🔹 दास प्रथा
जहाँ व्यक्ति पूरी तरह स्वामी के अधीन होता था।
🔹 जाति प्रथा
जन्म आधारित बंद व्यवस्था।
🔹 वर्ग व्यवस्था
आर्थिक आधार पर खुली व्यवस्था।
📌 सामाजिक स्तरीकरण के प्रभाव
🔹 सकारात्मक प्रभाव
सामाजिक व्यवस्था बनाए रखता है।
कार्य विभाजन को प्रोत्साहित करता है।
🔹 नकारात्मक प्रभाव
असमानता बढ़ाता है।
गरीबी और शोषण को जन्म देता है।
📌 आधुनिक समाज में स्तरीकरण
आज के समाज में स्तरीकरण पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
लेकिन अब जन्म से अधिक महत्व शिक्षा और योग्यता को दिया जा रहा है।
समान अवसर की अवधारणा बढ़ रही है।
सरकारें आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से असमानता कम करने का प्रयास कर रही हैं।
📌 निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि सामाजिक स्तरीकरण समाज का विभिन्न स्तरों में विभाजन है।
यह असमानता पर आधारित व्यवस्था है।
इसके प्रमुख आधार हैं — जाति, वर्ग, शक्ति, प्रतिष्ठा, शिक्षा, लिंग, आयु और धर्म।
स्तरीकरण समाज की वास्तविकता है।
यह एक ओर सामाजिक व्यवस्था बनाए रखता है, तो दूसरी ओर असमानता भी उत्पन्न करता है।
इसलिए आधुनिक समाज में समानता और न्याय की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं ताकि स्तरीकरण के नकारात्मक प्रभाव कम किए जा सकें।
इस प्रकार सामाजिक स्तरीकरण समाजशास्त्र का एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसे समझना आवश्यक है।
प्रश्न 05 संस्कृति से आप क्या समझते हैं? संस्कृति की विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
मनुष्य केवल जैविक प्राणी नहीं है, बल्कि वह सांस्कृतिक प्राणी भी है। जानवर भी समूह में रहते हैं, लेकिन उनके पास संस्कृति नहीं होती। संस्कृति मनुष्य को अन्य जीवों से अलग बनाती है। हम कैसे बोलते हैं, कैसे कपड़े पहनते हैं, क्या खाते हैं, किस प्रकार त्योहार मनाते हैं — ये सब हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। इसलिए संस्कृति मानव जीवन का मूल आधार है।
अब हम क्रम से संस्कृति का अर्थ और उसकी विशेषताओं को विस्तार से समझेंगे।
📌 संस्कृति का अर्थ
संस्कृति का सामान्य अर्थ है — जीवन जीने का तरीका।
समाज में रहने वाले लोग जिन विचारों, विश्वासों, मूल्यों, परंपराओं और व्यवहारों को अपनाते हैं, वही संस्कृति कहलाती है।
संस्कृति केवल भौतिक वस्तुओं तक सीमित नहीं है। यह हमारी सोच, भाषा, नैतिकता और आचरण से भी जुड़ी होती है।
सरल शब्दों में कहें तो —
संस्कृति वह संपूर्ण जीवन पद्धति है जिसे मनुष्य समाज में रहकर सीखता है।
📌 संस्कृति की परिभाषाएँ
विभिन्न समाजशास्त्रियों ने संस्कृति की परिभाषा दी है।
🔹 ई.बी. टायलर के अनुसार
संस्कृति वह जटिल संपूर्णता है जिसमें ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, रीति-रिवाज तथा अन्य योग्यताएँ शामिल हैं जिन्हें मनुष्य समाज का सदस्य होने के नाते सीखता है।
इस परिभाषा से स्पष्ट है कि संस्कृति सीखी जाती है और यह सामाजिक जीवन से जुड़ी है।
अब हम संस्कृति की प्रमुख विशेषताओं को विस्तार से समझते हैं।
📌 संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ
📍 1. संस्कृति सीखी जाती है
🔸 जन्मजात नहीं होती
मनुष्य जन्म के समय संस्कृति नहीं जानता।
वह परिवार और समाज से धीरे-धीरे इसे सीखता है।
🔸 समाजीकरण की प्रक्रिया
बच्चा भाषा, व्यवहार और परंपराएँ समाजीकरण के माध्यम से सीखता है।
📍 2. संस्कृति सामाजिक होती है
🔸 व्यक्तिगत नहीं
संस्कृति किसी एक व्यक्ति की नहीं होती।
यह पूरे समाज की होती है।
🔸 सामूहिक स्वीकृति
जो व्यवहार समाज द्वारा स्वीकार किया जाता है, वही संस्कृति का हिस्सा बनता है।
📍 3. संस्कृति पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है
🔸 हस्तांतरण
संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती है।
🔸 परंपराओं का संरक्षण
त्योहार, रीति-रिवाज और भाषा इसी प्रकार आगे बढ़ते हैं।
📍 4. संस्कृति परिवर्तनशील है
🔸 समय के साथ बदलाव
संस्कृति स्थिर नहीं रहती।
समय के साथ इसमें परिवर्तन होता है।
🔸 आधुनिक प्रभाव
तकनीक, शिक्षा और वैश्वीकरण से संस्कृति बदलती रहती है।
📍 5. संस्कृति में भौतिक और अभौतिक दोनों तत्व होते हैं
🔸 भौतिक संस्कृति
घर, वाहन, कपड़े, मशीनें आदि भौतिक संस्कृति के उदाहरण हैं।
🔸 अभौतिक संस्कृति
विश्वास, मूल्य, नैतिकता, परंपराएँ अभौतिक संस्कृति के भाग हैं।
📍 6. संस्कृति अनुकूलनशील होती है
🔸 वातावरण के अनुसार
मनुष्य अपनी संस्कृति को परिस्थितियों के अनुसार ढाल लेता है।
🔸 आवश्यकता के अनुसार बदलाव
नई आवश्यकताओं के अनुसार नए व्यवहार विकसित होते हैं।
📍 7. संस्कृति आदर्श प्रदान करती है
🔸 नैतिक मार्गदर्शन
संस्कृति हमें सही और गलत का ज्ञान देती है।
🔸 सामाजिक नियम
यह बताती है कि समाज में कैसा व्यवहार करना चाहिए।
📍 8. संस्कृति एकीकृत होती है
🔸 आपसी संबंध
संस्कृति के सभी तत्व आपस में जुड़े होते हैं।
🔸 संतुलन
यदि एक भाग में परिवर्तन होता है, तो अन्य भाग भी प्रभावित होते हैं।
📍 9. संस्कृति विशिष्ट होती है
🔸 हर समाज की अलग संस्कृति
हर समाज की अपनी अलग पहचान होती है।
🔸 विविधता
भारत जैसे देश में विभिन्न संस्कृतियाँ पाई जाती हैं।
📍 10. संस्कृति मानव आवश्यकताओं की पूर्ति करती है
🔸 सामाजिक आवश्यकताएँ
संस्कृति व्यक्ति को पहचान और सुरक्षा देती है।
🔸 मानसिक संतोष
त्योहार और परंपराएँ मानसिक खुशी प्रदान करती हैं।
📌 संस्कृति का महत्व
संस्कृति समाज को एकता और स्थिरता प्रदान करती है।
यह व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करती है।
संस्कृति के बिना समाज की कल्पना नहीं की जा सकती।
संस्कृति हमें यह सिखाती है कि हमें कैसे जीना है, कैसे व्यवहार करना है और समाज के नियमों का पालन कैसे करना है।
📌 संस्कृति और समाज का संबंध
समाज और संस्कृति एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
समाज के बिना संस्कृति नहीं हो सकती और संस्कृति के बिना समाज अधूरा है।
समाज ढाँचा देता है और संस्कृति उसमें जीवन भरती है।
📌 निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि संस्कृति मनुष्य के संपूर्ण जीवन का तरीका है।
यह सीखी जाती है, सामाजिक होती है, पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है और समय के साथ बदलती रहती है।
संस्कृति के भौतिक और अभौतिक दोनों पहलू होते हैं।
यह व्यक्ति को मार्गदर्शन देती है और समाज में एकता बनाए रखती है।
इस प्रकार संस्कृति मानव समाज का महत्वपूर्ण अंग है और उसकी विशेषताओं को समझना समाजशास्त्र के अध्ययन में अत्यंत आवश्यक है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 01. समाज व समुदाय में अन्तर बताइये।
मानव जीवन समूह में ही विकसित होता है। हम परिवार, पड़ोस, गाँव, शहर और राष्ट्र जैसे अनेक समूहों में रहते हैं। लेकिन इन सभी को एक ही अर्थ में नहीं समझा जा सकता। “समाज” और “समुदाय” दोनों शब्द देखने में समान लगते हैं, परन्तु समाजशास्त्र में इनके अर्थ अलग-अलग हैं। कई विद्यार्थी इन दोनों को एक जैसा समझ लेते हैं, जबकि परीक्षा की दृष्टि से इनके बीच का अंतर स्पष्ट करना बहुत आवश्यक है।
अब हम पहले समाज और समुदाय का संक्षिप्त अर्थ समझेंगे, फिर दोनों के बीच मुख्य अंतरों को व्यवस्थित रूप से जानेंगे।
📌 समाज का अर्थ
समाज केवल लोगों का समूह नहीं है। समाज सामाजिक संबंधों का जाल है। जब व्यक्ति आपस में स्थायी संबंध बनाकर, नियमों और मान्यताओं के आधार पर जीवन जीते हैं, तो वह समाज कहलाता है।
समाज का क्षेत्र बहुत व्यापक होता है। यह पूरे देश, राज्य या विश्व स्तर तक फैला हो सकता है। समाज में परिवार, धर्म, शिक्षा, राजनीति, अर्थव्यवस्था आदि सभी संस्थाएँ शामिल होती हैं।
सरल शब्दों में —
समाज संबंधों की एक व्यापक व्यवस्था है।
📌 समुदाय का अर्थ
समुदाय समाज का ही एक छोटा और विशेष भाग है।
समुदाय उन लोगों का समूह है जो एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में रहते हैं और जिनमें “हम-भावना” पाई जाती है।
उदाहरण के लिए — गाँव, मोहल्ला, जनजाति या धार्मिक समुदाय।
इनमें लोग एक-दूसरे को पहचानते हैं और आपसी निकटता होती है।
सरल शब्दों में —
समुदाय एक सीमित क्षेत्र में रहने वाला संगठित समूह है, जिसमें एकता और अपनापन होता है।
अब हम समाज और समुदाय के बीच मुख्य अंतरों को विस्तार से समझते हैं।
📌 समाज व समुदाय में मुख्य अन्तर
📍 1. क्षेत्र (Area) के आधार पर अंतर
🔹 समाज
समाज का कोई निश्चित भौगोलिक क्षेत्र आवश्यक नहीं है।
यह बहुत व्यापक हो सकता है, जैसे भारतीय समाज या विश्व समाज।
🔹 समुदाय
समुदाय का एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होता है।
जैसे — कोई गाँव, कस्बा या मोहल्ला।
📍 2. आकार (Size) के आधार पर अंतर
🔹 समाज
समाज का आकार बहुत बड़ा होता है।
इसमें लाखों-करोड़ों लोग शामिल हो सकते हैं।
🔹 समुदाय
समुदाय का आकार अपेक्षाकृत छोटा होता है।
यह सीमित लोगों का समूह होता है।
📍 3. संबंधों की प्रकृति
🔹 समाज
समाज में संबंध प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के होते हैं।
हर व्यक्ति एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता।
🔹 समुदाय
समुदाय में संबंध अधिकतर प्रत्यक्ष और निकट होते हैं।
लोग एक-दूसरे को पहचानते हैं।
📍 4. “हम-भावना” (We-Feeling)
🔹 समाज
समाज में “हम-भावना” उतनी गहरी नहीं होती, क्योंकि इसका क्षेत्र बहुत बड़ा होता है।
🔹 समुदाय
समुदाय की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता “हम-भावना” है।
लोगों में अपनापन और एकता की भावना होती है।
📍 5. संगठन का स्वरूप
🔹 समाज
समाज एक व्यापक और जटिल संगठन है।
इसमें अनेक संस्थाएँ और समूह शामिल होते हैं।
🔹 समुदाय
समुदाय अपेक्षाकृत सरल संगठन होता है।
यह समाज का ही एक भाग है।
📍 6. गठन (Formation)
🔹 समाज
समाज स्वतः विकसित होता है।
यह किसी विशेष उद्देश्य से नहीं बनाया जाता।
🔹 समुदाय
समुदाय भी स्वाभाविक रूप से बन सकता है, लेकिन इसमें भौगोलिक एकता आवश्यक होती है।
📍 7. उदाहरण
🔹 समाज
भारतीय समाज, औद्योगिक समाज, ग्रामीण समाज।
🔹 समुदाय
ग्राम समुदाय, जनजातीय समुदाय, धार्मिक समुदाय।
📍 8. व्यापकता और सीमितता
🔹 समाज
समाज अधिक व्यापक अवधारणा है।
समुदाय समाज का ही एक हिस्सा है।
🔹 समुदाय
समुदाय सीमित और विशेष समूह को दर्शाता है।
📌 समाज और समुदाय का संबंध
समाज और समुदाय एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
समुदाय समाज का ही अंग है।
समाज के बिना समुदाय की कल्पना नहीं की जा सकती।
और अनेक समुदाय मिलकर ही समाज का निर्माण करते हैं।
उदाहरण के लिए —
भारत एक समाज है।
उसके भीतर हजारों गाँव और शहर हैं, जो अलग-अलग समुदाय हैं।
📌 सरल तुलना सारणी (स्मरण के लिए)
🔹 समाज — व्यापक, संबंधों का जाल, निश्चित क्षेत्र आवश्यक नहीं।
🔹 समुदाय — सीमित क्षेत्र, “हम-भावना”, निकट संबंध।
📌 परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु
समाज संबंधों पर आधारित है, समुदाय क्षेत्र पर।
समाज बड़ा और जटिल है, समुदाय छोटा और सरल।
समाज में प्रत्यक्ष संबंध कम, समुदाय में अधिक।
समुदाय में अपनापन अधिक स्पष्ट होता है।
यदि इन चार बिंदुओं को याद रखेंगे, तो उत्तर आसानी से लिखा जा सकता है।
📌 निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि समाज और समुदाय दोनों सामाजिक जीवन के महत्वपूर्ण अंग हैं, लेकिन दोनों एक जैसे नहीं हैं।
समाज एक व्यापक व्यवस्था है, जिसमें अनेक समूह और संस्थाएँ शामिल होती हैं।
समुदाय समाज का वह भाग है, जहाँ लोग एक निश्चित क्षेत्र में रहकर आपसी निकटता और “हम-भावना” के साथ जीवन जीते हैं।
इस प्रकार समाज और समुदाय में अंतर को समझना समाजशास्त्र के अध्ययन में अत्यंत आवश्यक है। यह अंतर हमें सामाजिक संरचना को स्पष्ट रूप से समझने में सहायता करता है।
प्रश्न 02 प्रदत्त व अर्जित प्रस्थिति में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
समाज में प्रत्येक व्यक्ति का एक निश्चित स्थान या दर्जा होता है, जिसे प्रस्थिति (Status) कहा जाता है। कोई व्यक्ति पिता है, कोई शिक्षक है, कोई मंत्री है, कोई छात्र है — ये सभी उसकी सामाजिक प्रस्थितियाँ हैं। समाजशास्त्र में प्रस्थिति का विशेष महत्व है, क्योंकि समाज की पूरी संरचना इन्हीं स्थानों और भूमिकाओं पर आधारित होती है।
प्रस्थिति मुख्यतः दो प्रकार की मानी जाती है — प्रदत्त (Ascribed) प्रस्थिति और अर्जित (Achieved) प्रस्थिति। परीक्षा की दृष्टि से इन दोनों के बीच का अंतर स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है। अब हम पहले दोनों का अर्थ समझेंगे, फिर इनके बीच अंतर को विस्तार से जानेंगे।
📌 प्रदत्त प्रस्थिति का अर्थ
प्रदत्त प्रस्थिति वह सामाजिक स्थिति है जो व्यक्ति को जन्म के साथ या बिना किसी प्रयास के मिलती है।
इसे पाने के लिए व्यक्ति को कोई विशेष मेहनत नहीं करनी पड़ती।
उदाहरण के लिए —
जाति, लिंग, परिवार, आयु आदि।
कोई व्यक्ति किस परिवार में जन्म लेगा या उसका लिंग क्या होगा, यह उसके नियंत्रण में नहीं होता। समाज इन आधारों पर उसे एक निश्चित दर्जा दे देता है।
इसलिए प्रदत्त प्रस्थिति जन्म आधारित या स्वाभाविक मानी जाती है।
📌 अर्जित प्रस्थिति का अर्थ
अर्जित प्रस्थिति वह सामाजिक स्थिति है जिसे व्यक्ति अपने प्रयास, शिक्षा, योग्यता और मेहनत से प्राप्त करता है।
यह जन्म से नहीं मिलती, बल्कि व्यक्ति स्वयं इसे कमाता है।
उदाहरण के लिए —
डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, अधिकारी, खिलाड़ी आदि।
ये पद व्यक्ति की योग्यता और उपलब्धियों के आधार पर मिलते हैं।
अतः अर्जित प्रस्थिति प्रयास और उपलब्धि पर आधारित होती है।
अब हम दोनों के बीच मुख्य अंतरों को व्यवस्थित रूप से समझते हैं।
📌 प्रदत्त व अर्जित प्रस्थिति में मुख्य अन्तर
📍 1. प्राप्ति का आधार
🔹 प्रदत्त प्रस्थिति
यह जन्म के आधार पर मिलती है।
व्यक्ति का इसमें कोई योगदान नहीं होता।
🔹 अर्जित प्रस्थिति
यह योग्यता, शिक्षा और प्रयास के आधार पर मिलती है।
व्यक्ति स्वयं इसे अर्जित करता है।
📍 2. परिवर्तन की संभावना
🔹 प्रदत्त प्रस्थिति
इसे बदलना कठिन होता है।
जैसे जन्म से मिली जाति या लिंग को बदलना आसान नहीं।
🔹 अर्जित प्रस्थिति
इसे बदला जा सकता है।
मेहनत से व्यक्ति अपनी स्थिति ऊँची या नीची कर सकता है।
📍 3. सामाजिक गतिशीलता
🔹 प्रदत्त प्रस्थिति
यह सामाजिक गतिशीलता को सीमित करती है।
क्योंकि जन्म आधारित व्यवस्था में अवसर कम होते हैं।
🔹 अर्जित प्रस्थिति
यह सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा देती है।
व्यक्ति अपनी क्षमता से आगे बढ़ सकता है।
📍 4. उदाहरण
🔹 प्रदत्त प्रस्थिति
जाति, लिंग, आयु, परिवार, जन्म स्थान।
🔹 अर्जित प्रस्थिति
डॉक्टर, प्रोफेसर, मंत्री, खिलाड़ी, व्यवसायी।
📍 5. समाज का प्रकार
🔹 प्रदत्त प्रस्थिति
पारंपरिक समाज में इसका महत्व अधिक था।
विशेषकर जाति व्यवस्था में।
🔹 अर्जित प्रस्थिति
आधुनिक समाज में इसका महत्व अधिक है।
आज शिक्षा और प्रतिभा को अधिक महत्व दिया जाता है।
📍 6. नियंत्रण का स्तर
🔹 प्रदत्त प्रस्थिति
व्यक्ति के नियंत्रण में नहीं होती।
यह स्वतः मिलती है।
🔹 अर्जित प्रस्थिति
व्यक्ति के नियंत्रण में होती है।
वह अपने प्रयास से इसे प्राप्त करता है।
📍 7. स्थायित्व
🔹 प्रदत्त प्रस्थिति
यह अधिक स्थायी होती है।
जन्म से लेकर जीवनभर बनी रह सकती है।
🔹 अर्जित प्रस्थिति
यह अस्थायी भी हो सकती है।
पद या स्थिति बदल सकती है।
📌 सरल तुलना (स्मरण के लिए)
🔹 प्रदत्त — जन्म आधारित, प्रयास नहीं, परिवर्तन कठिन।
🔹 अर्जित — मेहनत आधारित, प्रयास आवश्यक, परिवर्तन संभव।
यदि इन तीन बातों को याद रखेंगे तो उत्तर आसानी से लिखा जा सकता है।
📌 प्रदत्त और अर्जित प्रस्थिति का संबंध
दोनों प्रकार की प्रस्थितियाँ व्यक्ति के जीवन में साथ-साथ चलती हैं।
एक व्यक्ति जन्म से पुरुष (प्रदत्त) हो सकता है और पेशे से डॉक्टर (अर्जित) हो सकता है।
इस प्रकार किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान कई प्रकार की प्रस्थितियों से मिलकर बनती है।
📌 आधुनिक समाज में महत्व
आधुनिक समाज में अर्जित प्रस्थिति को अधिक महत्व दिया जा रहा है।
शिक्षा और प्रतियोगिता के माध्यम से व्यक्ति अपनी स्थिति बदल सकता है।
हालाँकि प्रदत्त प्रस्थिति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
कई स्थानों पर जाति और लिंग अभी भी व्यक्ति की स्थिति को प्रभावित करते हैं।
📌 निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि प्रस्थिति समाज में व्यक्ति का मान्यता प्राप्त स्थान है।
प्रदत्त प्रस्थिति जन्म के आधार पर मिलती है, जबकि अर्जित प्रस्थिति प्रयास और योग्यता से प्राप्त होती है।
प्रदत्त प्रस्थिति स्थायी और नियंत्रण से बाहर होती है, जबकि अर्जित प्रस्थिति परिवर्तनशील और प्रयास पर आधारित होती है।
आधुनिक समाज में समान अवसर की अवधारणा के कारण अर्जित प्रस्थिति का महत्व बढ़ रहा है।
इस प्रकार प्रदत्त और अर्जित प्रस्थिति के अंतर को समझना समाजशास्त्र के अध्ययन में अत्यंत आवश्यक है।
प्रश्न 03 भूमिका की विशेषताएँ लिखिए।
समाज में प्रत्येक व्यक्ति का एक निश्चित स्थान होता है, जिसे प्रस्थिति कहते हैं। उसी प्रस्थिति से जुड़ी जो जिम्मेदारियाँ और अपेक्षित व्यवहार होते हैं, उन्हें भूमिका (Role) कहा जाता है। सरल शब्दों में, भूमिका वह कार्य या व्यवहार है जिसे समाज किसी विशेष स्थिति वाले व्यक्ति से अपेक्षा करता है।
उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति शिक्षक है, तो पढ़ाना, छात्रों का मार्गदर्शन करना और अनुशासन बनाए रखना उसकी भूमिका है। यदि कोई व्यक्ति पिता है, तो परिवार की देखभाल करना उसकी भूमिका है। इस प्रकार समाज की व्यवस्था भूमिकाओं के सही निर्वहन पर आधारित होती है।
अब हम भूमिका की प्रमुख विशेषताओं को विस्तार से समझेंगे।
📌 1. भूमिका प्रस्थिति से जुड़ी होती है
🔹 स्थिति और भूमिका का संबंध
भूमिका हमेशा किसी प्रस्थिति से जुड़ी होती है।
बिना प्रस्थिति के भूमिका नहीं हो सकती।
🔹 उदाहरण
यदि कोई छात्र है (प्रस्थिति), तो पढ़ाई करना उसकी भूमिका है।
यदि कोई डॉक्टर है (प्रस्थिति), तो रोगियों का इलाज करना उसकी भूमिका है।
अतः प्रस्थिति और भूमिका एक-दूसरे के पूरक हैं।
📌 2. भूमिका सामाजिक अपेक्षाओं पर आधारित होती है
🔹 समाज की अपेक्षा
समाज हर व्यक्ति से कुछ विशेष व्यवहार की अपेक्षा करता है।
इन्हीं अपेक्षाओं के अनुसार भूमिका निर्धारित होती है।
🔹 मान्यता प्राप्त व्यवहार
जो व्यवहार समाज द्वारा स्वीकार किया गया हो, वही भूमिका का हिस्सा होता है।
📌 3. भूमिका गतिशील होती है
🔹 परिवर्तनशीलता
भूमिका स्थिर नहीं होती।
समय और परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती है।
🔹 आधुनिक प्रभाव
आज शिक्षक की भूमिका केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं है।
उसे मार्गदर्शक और परामर्शदाता भी बनना पड़ता है।
📌 4. भूमिका बहुआयामी होती है
🔹 एक व्यक्ति, अनेक भूमिकाएँ
एक व्यक्ति एक ही समय में कई भूमिकाएँ निभाता है।
जैसे — वह पिता भी हो सकता है, कर्मचारी भी और नागरिक भी।
🔹 संतुलन की आवश्यकता
इन सभी भूमिकाओं में संतुलन बनाना आवश्यक होता है।
📌 5. भूमिका में अधिकार और कर्तव्य दोनों शामिल होते हैं
🔹 अधिकार
हर भूमिका के साथ कुछ अधिकार जुड़े होते हैं।
जैसे शिक्षक को अनुशासन बनाए रखने का अधिकार होता है।
🔹 कर्तव्य
साथ ही कुछ कर्तव्य भी होते हैं।
जैसे छात्रों को सही शिक्षा देना।
भूमिका केवल कर्तव्यों का समूह नहीं, बल्कि अधिकार और कर्तव्यों का संतुलन है।
📌 6. भूमिका सामाजिक नियंत्रण का साधन है
🔹 व्यवस्था बनाए रखना
जब व्यक्ति अपनी भूमिका सही ढंग से निभाता है, तो समाज में व्यवस्था बनी रहती है।
🔹 अनुशासन
यदि भूमिका का पालन न हो, तो सामाजिक अव्यवस्था उत्पन्न हो सकती है।
📌 7. भूमिका सीखी जाती है
🔹 जन्मजात नहीं
भूमिका जन्म से नहीं आती।
इसे समाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से सीखा जाता है।
🔹 अनुभव का महत्व
अनुभव के साथ व्यक्ति अपनी भूमिका को बेहतर ढंग से निभाना सीखता है।
📌 8. भूमिका में लचीलापन होता है
🔹 परिस्थितियों के अनुसार बदलाव
व्यक्ति परिस्थिति के अनुसार अपनी भूमिका में परिवर्तन कर सकता है।
🔹 सामाजिक विकास
समाज के विकास के साथ भूमिकाएँ भी बदलती रहती हैं।
📌 9. भूमिका में संघर्ष की संभावना
🔹 भूमिका संघर्ष
जब एक व्यक्ति की दो भूमिकाओं में टकराव हो जाए, तो उसे भूमिका संघर्ष कहते हैं।
जैसे नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन।
🔹 समाधान की आवश्यकता
इस स्थिति में संतुलन बनाना आवश्यक होता है।
📌 10. भूमिका का मूल्यांकन समाज करता है
🔹 सामाजिक स्वीकृति
समाज यह तय करता है कि व्यक्ति अपनी भूमिका सही निभा रहा है या नहीं।
🔹 सम्मान या आलोचना
यदि व्यक्ति अपनी भूमिका अच्छे से निभाता है, तो उसे सम्मान मिलता है।
अन्यथा आलोचना भी हो सकती है।
📌 भूमिका का महत्व
भूमिका समाज की संरचना का महत्वपूर्ण अंग है।
यदि सभी व्यक्ति अपनी-अपनी भूमिका ईमानदारी से निभाएँ, तो समाज में शांति और संतुलन बना रहता है।
भूमिका व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास में भी सहायक होती है।
यह उसे जिम्मेदारी और अनुशासन सिखाती है।
📌 निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि भूमिका समाज में प्रस्थिति से जुड़ी अपेक्षित जिम्मेदारियों और व्यवहारों का समूह है।
यह सामाजिक अपेक्षाओं पर आधारित होती है, परिवर्तनशील होती है और सीखी जाती है।
एक व्यक्ति अनेक भूमिकाएँ निभाता है और उनमें संतुलन बनाए रखना आवश्यक होता है।
भूमिका समाज में व्यवस्था और संतुलन बनाए रखने का महत्वपूर्ण साधन है।
इस प्रकार भूमिका की विशेषताओं को समझना समाजशास्त्र के अध्ययन में अत्यंत आवश्यक है।
प्रश्न 04 सामाजिक संस्तरण का प्रकार्यवादी सिद्धान्त क्या है?
समाज में सभी लोग समान स्थिति में नहीं होते। कुछ लोगों को अधिक धन, अधिक सम्मान और अधिक शक्ति प्राप्त होती है, जबकि कुछ लोगों की स्थिति अपेक्षाकृत निम्न होती है। इस प्रकार समाज में जो ऊँच-नीच या स्तरों का विभाजन दिखाई देता है, उसे सामाजिक संस्तरण (Social Stratification) कहते हैं।
सामाजिक संस्तरण को समझाने के लिए समाजशास्त्र में कई सिद्धान्त दिए गए हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है — प्रकार्यवादी सिद्धान्त (Functional Theory)। यह सिद्धान्त बताता है कि समाज में असमानता क्यों पाई जाती है और उसका क्या उद्देश्य है।
अब हम इस सिद्धान्त को सरल भाषा में विस्तार से समझेंगे।
📌 प्रकार्यवादी दृष्टिकोण का अर्थ
प्रकार्यवादी दृष्टिकोण यह मानता है कि समाज एक जीवित शरीर की तरह है। जैसे शरीर के अलग-अलग अंग मिलकर काम करते हैं, वैसे ही समाज के विभिन्न भाग मिलकर समाज को चलाते हैं।
इस दृष्टिकोण के अनुसार समाज में जो भी व्यवस्था है, वह किसी न किसी कार्य (Function) को पूरा करती है। इसलिए सामाजिक संस्तरण भी समाज के लिए उपयोगी है।
📌 प्रकार्यवादी सिद्धान्त के प्रवर्तक
इस सिद्धान्त को मुख्य रूप से डेविस और मूर (Davis and Moore) ने स्पष्ट किया। इन्होंने 1945 में अपने लेख में बताया कि सामाजिक संस्तरण समाज के लिए आवश्यक है।
इनके अनुसार, यदि समाज में सभी को समान स्थान दे दिया जाए, तो महत्वपूर्ण कार्यों को करने के लिए लोग प्रेरित नहीं होंगे। इसलिए असमानता एक आवश्यक व्यवस्था है।
📌 प्रकार्यवादी सिद्धान्त की मूल मान्यताएँ
अब हम इस सिद्धान्त की मुख्य बातों को क्रम से समझते हैं।
📍 1. समाज एक संगठित व्यवस्था है
🔹 विभिन्न भागों का सहयोग
समाज कई संस्थाओं और भूमिकाओं से मिलकर बना है।
हर भाग का एक विशेष कार्य होता है।
🔹 संतुलन की आवश्यकता
यदि सभी भाग सही तरीके से काम करें, तो समाज में संतुलन बना रहता है।
📍 2. सभी कार्य समान महत्व के नहीं होते
🔹 महत्वपूर्ण और कम महत्वपूर्ण कार्य
समाज में कुछ कार्य बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, जैसे — डॉक्टर, वैज्ञानिक, प्रशासक।
कुछ कार्य अपेक्षाकृत कम महत्व के माने जाते हैं।
🔹 विशेष कौशल की आवश्यकता
महत्वपूर्ण कार्यों के लिए अधिक प्रशिक्षण और योग्यता चाहिए।
📍 3. प्रेरणा की आवश्यकता
🔹 अधिक पुरस्कार
महत्वपूर्ण पदों को आकर्षक बनाने के लिए अधिक वेतन, सम्मान और सुविधाएँ दी जाती हैं।
🔹 प्रतिस्पर्धा
अधिक पुरस्कार पाने के लिए लोग मेहनत करते हैं और उच्च पद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
📍 4. असमानता आवश्यक है
🔹 सामाजिक आवश्यकता
डेविस और मूर के अनुसार असमानता समाज की आवश्यकता है।
🔹 प्रतिभा का चयन
अधिक योग्य और प्रतिभाशाली व्यक्ति ही महत्वपूर्ण पदों तक पहुँच पाते हैं।
📌 प्रकार्यवादी सिद्धान्त की मुख्य धारणा
इस सिद्धान्त के अनुसार —
समाज में विभिन्न पद होते हैं।
कुछ पद अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।
इन पदों के लिए विशेष योग्यता चाहिए।
इसलिए इन पदों को अधिक पुरस्कार दिए जाते हैं।
यही असमानता सामाजिक संस्तरण को जन्म देती है।
अर्थात सामाजिक संस्तरण समाज की कार्यक्षमता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
📌 उदाहरण द्वारा समझें
यदि डॉक्टर और सफाई कर्मचारी को समान वेतन और सम्मान मिले, तो लोग कठिन प्रशिक्षण लेकर डॉक्टर बनने का प्रयास कम करेंगे।
इसलिए समाज डॉक्टर को अधिक वेतन और प्रतिष्ठा देता है, ताकि योग्य लोग उस पद को प्राप्त करने के लिए मेहनत करें।
यही व्यवस्था सामाजिक संस्तरण को जन्म देती है।
📌 प्रकार्यवादी सिद्धान्त के सकारात्मक पहलू
🔹 समाज में प्रेरणा
यह सिद्धान्त बताता है कि असमानता लोगों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।
🔹 कार्य विभाजन
समाज में उचित कार्य विभाजन संभव होता है।
🔹 दक्षता
योग्य व्यक्ति महत्वपूर्ण पदों पर पहुँचते हैं, जिससे समाज की कार्यक्षमता बढ़ती है।
📌 सिद्धान्त की आलोचना
हालाँकि यह सिद्धान्त लोकप्रिय है, लेकिन इसकी कुछ आलोचनाएँ भी की गई हैं।
🔹 असमानता को उचित ठहराना
आलोचकों का कहना है कि यह सिद्धान्त अत्यधिक असमानता को सही ठहराता है।
🔹 अवसरों की असमानता
हर व्यक्ति को समान अवसर नहीं मिलते।
इसलिए सभी प्रतिभाशाली लोग उच्च पद तक नहीं पहुँच पाते।
🔹 शक्ति का प्रभाव
कई बार पद योग्यता से नहीं, बल्कि शक्ति और संपर्क के आधार पर मिलते हैं।
📌 आधुनिक संदर्भ में महत्व
आज के समाज में शिक्षा और प्रतियोगिता के माध्यम से अर्जित प्रस्थिति को महत्व दिया जाता है।
लेकिन सामाजिक संस्तरण पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
आर्थिक असमानता, वर्ग विभाजन और शक्ति असंतुलन अभी भी मौजूद हैं।
प्रकार्यवादी सिद्धान्त हमें यह समझने में मदद करता है कि समाज में असमानता क्यों बनी रहती है।
📌 संक्षिप्त सार
🔹 सामाजिक संस्तरण समाज का ऊँच-नीच आधारित विभाजन है।
🔹 प्रकार्यवादी सिद्धान्त के अनुसार यह व्यवस्था समाज के लिए आवश्यक है।
🔹 महत्वपूर्ण पदों के लिए अधिक पुरस्कार दिए जाते हैं।
🔹 असमानता प्रेरणा का स्रोत बनती है।
📌 निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि सामाजिक संस्तरण का प्रकार्यवादी सिद्धान्त यह मानता है कि असमानता समाज की आवश्यकता है।
डेविस और मूर के अनुसार, समाज के सुचारू संचालन के लिए यह आवश्यक है कि महत्वपूर्ण पदों पर योग्य लोग पहुँचे और उन्हें उचित पुरस्कार मिले।
हालाँकि इस सिद्धान्त की आलोचना भी हुई है, फिर भी यह सामाजिक संस्तरण को समझने का एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करता है।
इस प्रकार प्रकार्यवादी सिद्धान्त सामाजिक असमानता को समाज की कार्यप्रणाली से जोड़कर समझाने का प्रयास करता है।
प्रश्न 05 सामाजिक संरचना की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
समाज केवल व्यक्तियों का समूह नहीं है। यह एक व्यवस्थित व्यवस्था है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति का एक स्थान होता है और प्रत्येक स्थान से कुछ निश्चित कार्य जुड़े होते हैं। समाज में परिवार, धर्म, शिक्षा, राजनीति, अर्थव्यवस्था जैसी संस्थाएँ मिलकर एक संगठित रूप बनाती हैं। इसी संगठित और व्यवस्थित रूप को सामाजिक संरचना (Social Structure) कहा जाता है।
सरल शब्दों में कहें तो —
सामाजिक संरचना समाज का ढाँचा है।
जिस प्रकार किसी भवन को खड़ा रखने के लिए मजबूत ढाँचे की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार समाज को व्यवस्थित रखने के लिए सामाजिक संरचना आवश्यक है।
अब हम इस अवधारणा को विस्तार से समझेंगे।
📌 सामाजिक संरचना का अर्थ
सामाजिक संरचना का अर्थ है — समाज के विभिन्न अंगों, संस्थाओं और संबंधों की व्यवस्थित व्यवस्था।
यह बताती है कि समाज किन-किन भागों से मिलकर बना है और वे भाग आपस में कैसे जुड़े हुए हैं।
समाज में व्यक्ति, समूह, संस्थाएँ, भूमिकाएँ और प्रस्थितियाँ होती हैं। इन सभी का एक निश्चित क्रम और संबंध होता है। यही क्रम और संबंध सामाजिक संरचना बनाते हैं।
📌 सामाजिक संरचना की परिभाषाएँ
विभिन्न समाजशास्त्रियों ने सामाजिक संरचना को अलग-अलग ढंग से समझाया है।
🔹 मैकाइवर और पेज के अनुसार
सामाजिक संरचना सामाजिक संबंधों की व्यवस्था है।
🔹 रेडक्लिफ ब्राउन के अनुसार
सामाजिक संरचना उन स्थायी सामाजिक संबंधों का जाल है, जिनके द्वारा समाज बना रहता है।
इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि सामाजिक संरचना समाज की स्थायी और संगठित व्यवस्था है।
📌 सामाजिक संरचना के मुख्य तत्व
सामाजिक संरचना कई तत्वों से मिलकर बनती है। अब हम इन तत्वों को क्रम से समझते हैं।
📍 1. प्रस्थिति (Status)
🔹 सामाजिक स्थान
प्रस्थिति समाज में व्यक्ति का स्थान है।
जैसे — शिक्षक, छात्र, पिता, अधिकारी।
🔹 व्यवस्था का आधार
समाज की संरचना विभिन्न प्रस्थितियों के आधार पर व्यवस्थित होती है।
📍 2. भूमिका (Role)
🔹 अपेक्षित व्यवहार
भूमिका उस कार्य को कहते हैं जो किसी प्रस्थिति से जुड़ा होता है।
🔹 जिम्मेदारी
यदि व्यक्ति अपनी भूमिका सही निभाए, तो समाज में संतुलन बना रहता है।
📍 3. सामाजिक संस्थाएँ
🔹 प्रमुख संस्थाएँ
परिवार, विवाह, शिक्षा, धर्म, राजनीति और अर्थव्यवस्था समाज की मुख्य संस्थाएँ हैं।
🔹 स्थायित्व
ये संस्थाएँ समाज को स्थिरता प्रदान करती हैं।
📍 4. सामाजिक समूह
🔹 छोटे और बड़े समूह
परिवार, मित्र मंडली, संगठन आदि समूह सामाजिक संरचना का हिस्सा हैं।
🔹 पारस्परिक संबंध
इन समूहों के माध्यम से व्यक्ति समाज से जुड़ा रहता है।
📍 5. सामाजिक मानदंड
🔹 नियम और मूल्य
समाज में व्यवहार के लिए कुछ नियम और मूल्य होते हैं।
🔹 नियंत्रण
ये नियम समाज में अनुशासन बनाए रखते हैं।
📌 सामाजिक संरचना की विशेषताएँ
अब हम सामाजिक संरचना की मुख्य विशेषताओं को समझते हैं।
📍 1. यह संगठित होती है
सामाजिक संरचना एक व्यवस्थित ढाँचा है।
इसमें प्रत्येक भाग का एक निश्चित स्थान होता है।
📍 2. यह स्थायी होती है
सामाजिक संरचना अचानक नहीं बदलती।
यह लंबे समय तक बनी रहती है।
📍 3. यह अमूर्त होती है
सामाजिक संरचना को छू या देख नहीं सकते।
इसे केवल सामाजिक संबंधों के माध्यम से समझा जा सकता है।
📍 4. यह परिवर्तनशील भी है
हालाँकि यह स्थायी होती है, लेकिन समय के साथ बदल भी सकती है।
जैसे संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार का बढ़ना।
📍 5. यह सामाजिक नियंत्रण बनाए रखती है
सामाजिक संरचना समाज में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने में सहायक होती है।
📌 सामाजिक संरचना का महत्व
यह समाज को स्थिरता देती है।
यह व्यक्ति को पहचान और स्थान प्रदान करती है।
यह सामाजिक संतुलन बनाए रखती है।
यह सामाजिक जीवन को संगठित और व्यवस्थित बनाती है।
यदि सामाजिक संरचना न हो, तो समाज अव्यवस्थित हो जाएगा।
📌 सामाजिक संरचना और सामाजिक व्यवस्था
सामाजिक संरचना और सामाजिक व्यवस्था आपस में जुड़े हैं।
संरचना ढाँचा प्रदान करती है, और व्यवस्था उस ढाँचे के अनुसार कार्य करती है।
यदि संरचना मजबूत होगी, तो समाज में संतुलन बना रहेगा।
📌 आधुनिक समाज में सामाजिक संरचना
आधुनिक समाज में सामाजिक संरचना में कई परिवर्तन हुए हैं।
औद्योगीकरण, शिक्षा और तकनीकी विकास के कारण पारंपरिक संरचनाएँ बदल रही हैं।
फिर भी समाज को व्यवस्थित रखने के लिए किसी न किसी प्रकार की संरचना आवश्यक है।
📌 निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि सामाजिक संरचना समाज का संगठित और व्यवस्थित ढाँचा है।
यह प्रस्थिति, भूमिका, संस्थाएँ, समूह और नियमों से मिलकर बनती है।
यह समाज को स्थिरता, संतुलन और दिशा प्रदान करती है।
हालाँकि समय के साथ इसमें परिवर्तन होते रहते हैं, फिर भी सामाजिक संरचना समाज के अस्तित्व के लिए अत्यंत आवश्यक है।
इस प्रकार सामाजिक संरचना की अवधारणा समाजशास्त्र में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके माध्यम से हम समाज की मूल व्यवस्था को समझ पाते हैं।
प्रश्न 06. मूल्य से आप क्या समझते हैं? संक्षेप में समझाइए।
समाज में व्यक्ति जैसा व्यवहार करता है, वैसा वह केवल अपनी इच्छा से नहीं करता, बल्कि समाज के कुछ मानकों और आदर्शों के अनुसार करता है। समाज हमें यह सिखाता है कि क्या सही है और क्या गलत, क्या अच्छा है और क्या बुरा। इन्हीं मानकों और आदर्शों को मूल्य (Values) कहा जाता है।
सरल शब्दों में —
मूल्य वे आदर्श सिद्धांत हैं जो समाज में सही और गलत का निर्धारण करते हैं।
मूल्य व्यक्ति के व्यवहार को दिशा देते हैं। वे समाज के नैतिक आधार होते हैं। यदि समाज में मूल्य न हों, तो जीवन अव्यवस्थित हो जाएगा।
📌 मूल्य का अर्थ
मूल्य का सामान्य अर्थ है — महत्व या महत्ता।
समाजशास्त्र में मूल्य का अर्थ है — वे मान्यताएँ या आदर्श जिन्हें समाज महत्वपूर्ण और वांछनीय मानता है।
उदाहरण के लिए —
सत्य बोलना, ईमानदारी, बड़ों का सम्मान करना, देशभक्ति, समानता आदि सामाजिक मूल्य हैं।
ये मूल्य व्यक्ति को यह बताते हैं कि उसे समाज में कैसा आचरण करना चाहिए।
📌 मूल्य की परिभाषा
समाजशास्त्रियों के अनुसार —
मूल्य वे मानदंड हैं जो समाज में अच्छे और बुरे, उचित और अनुचित का निर्धारण करते हैं।
अर्थात मूल्य समाज के आदर्श होते हैं, जो व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं।
📌 मूल्य की प्रमुख विशेषताएँ
🔹 1. सामाजिक होते हैं
मूल्य किसी एक व्यक्ति के नहीं, बल्कि पूरे समाज के होते हैं।
🔹 2. आदर्शात्मक होते हैं
ये आदर्श बताते हैं कि व्यक्ति को कैसा होना चाहिए।
🔹 3. पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं
मूल्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचते हैं।
🔹 4. परिवर्तनशील होते हैं
समय के साथ मूल्यों में परिवर्तन भी होता है।
जैसे पहले संयुक्त परिवार को अधिक महत्व दिया जाता था, आज एकल परिवार भी स्वीकार्य है।
📌 मूल्य के प्रकार (संक्षेप में)
🔹 नैतिक मूल्य
सत्य, ईमानदारी, न्याय आदि।
🔹 सामाजिक मूल्य
समानता, सहयोग, भाईचारा।
🔹 धार्मिक मूल्य
धर्म पालन, आस्था, पूजा।
🔹 राष्ट्रीय मूल्य
देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता।
📌 मूल्य का महत्व
मूल्य समाज में अनुशासन बनाए रखते हैं।
वे व्यक्ति के व्यवहार को दिशा देते हैं।
समाज में एकता और स्थिरता बनाए रखते हैं।
व्यक्ति के चरित्र निर्माण में सहायक होते हैं।
📌 निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि मूल्य समाज के आदर्श और मान्यताएँ हैं, जो व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित और निर्देशित करते हैं।
वे सही और गलत का निर्धारण करते हैं और समाज में व्यवस्था बनाए रखते हैं।
इस प्रकार मूल्य सामाजिक जीवन का आधार हैं और उनके बिना समाज की कल्पना नहीं की जा सकती।
प्रश्न 07. मानदण्ड की विशेषताएँ समझाएं।
समाज में व्यक्ति जैसा व्यवहार करता है, वह पूरी तरह उसकी व्यक्तिगत इच्छा पर आधारित नहीं होता। समाज ने कुछ नियम, परंपराएँ और आचरण के तरीके तय कर रखे हैं। इन्हीं को सामाजिक मानदण्ड (Social Norms) कहा जाता है।
मानदण्ड यह बताते हैं कि समाज में हमें कैसे व्यवहार करना चाहिए। जैसे — बड़ों का सम्मान करना, सार्वजनिक स्थान पर शालीनता बनाए रखना, कानून का पालन करना आदि। यदि कोई व्यक्ति इन नियमों का पालन करता है तो समाज उसे स्वीकार करता है, और यदि नहीं करता तो समाज उसे दंड या आलोचना भी दे सकता है।
अब हम सामाजिक मानदण्ड की प्रमुख विशेषताओं को सरल और स्पष्ट भाषा में समझेंगे।
📌 1. मानदण्ड सामाजिक होते हैं
मानदण्ड किसी एक व्यक्ति द्वारा बनाए गए नियम नहीं होते।
वे पूरे समाज द्वारा स्वीकार किए गए व्यवहार के तरीके होते हैं।
समाज की सामूहिक स्वीकृति ही उन्हें मानदण्ड बनाती है।
इसलिए ये सामाजिक जीवन का अंग होते हैं।
📌 2. मानदण्ड व्यवहार को नियंत्रित करते हैं
मानदण्ड व्यक्ति को यह बताते हैं कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
वे सही और गलत के बीच अंतर स्पष्ट करते हैं।
इसी कारण मानदण्ड सामाजिक नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण साधन हैं।
📌 3. मानदण्ड आदर्शात्मक होते हैं
मानदण्ड आदर्श व्यवहार का संकेत देते हैं।
वे बताते हैं कि व्यक्ति को समाज में कैसा आचरण करना चाहिए।
हालाँकि हर व्यक्ति इनका पूरी तरह पालन नहीं करता, फिर भी वे आदर्श के रूप में बने रहते हैं।
📌 4. मानदण्ड लिखित और अलिखित दोनों हो सकते हैं
कुछ मानदण्ड लिखित रूप में होते हैं, जैसे कानून।
कुछ मानदण्ड अलिखित होते हैं, जैसे परंपराएँ और रीति-रिवाज।
दोनों प्रकार के मानदण्ड समाज में समान रूप से प्रभाव डालते हैं।
📌 5. मानदण्ड पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं
मानदण्ड एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचते हैं।
बच्चे इन्हें परिवार और समाज से सीखते हैं।
इसी प्रक्रिया को समाजीकरण कहा जाता है।
📌 6. मानदण्ड परिवर्तनशील होते हैं
मानदण्ड स्थायी नहीं होते।
समय, परिस्थिति और समाज के विकास के साथ इनमें परिवर्तन आता है।
जैसे पहले कई सामाजिक प्रथाएँ स्वीकार थीं, जो आज बदल चुकी हैं।
📌 7. मानदण्ड दंड और पुरस्कार से जुड़े होते हैं
यदि व्यक्ति मानदण्डों का पालन करता है तो उसे सम्मान और स्वीकृति मिलती है।
यदि वह उल्लंघन करता है तो उसे आलोचना या दंड का सामना करना पड़ सकता है।
इससे समाज में अनुशासन बना रहता है।
📌 8. मानदण्ड समाज में एकता बनाए रखते हैं
जब सभी लोग एक समान नियमों का पालन करते हैं, तो समाज में स्थिरता और एकता बनी रहती है।
मानदण्ड सामाजिक समन्वय और संतुलन को मजबूत करते हैं।
📌 9. मानदण्ड विभिन्न प्रकार के होते हैं
समाज में कई प्रकार के मानदण्ड पाए जाते हैं —
लोकाचार, परंपराएँ, नैतिक नियम, कानून आदि।
इनका प्रभाव व्यक्ति के दैनिक जीवन पर पड़ता है।
📌 10. मानदण्ड समाज के अनुसार भिन्न होते हैं
हर समाज के मानदण्ड अलग-अलग हो सकते हैं।
जो व्यवहार एक समाज में उचित माना जाता है, वह दूसरे समाज में अनुचित हो सकता है।
इसलिए मानदण्ड सांस्कृतिक विविधता को दर्शाते हैं।
📌 निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि मानदण्ड समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार के नियम हैं, जो व्यक्ति के आचरण को नियंत्रित और निर्देशित करते हैं।
वे सामाजिक नियंत्रण का महत्वपूर्ण साधन हैं और समाज में एकता, अनुशासन तथा संतुलन बनाए रखते हैं।
मानदण्ड सामाजिक, आदर्शात्मक, परिवर्तनशील और दंड-पुरस्कार से जुड़े होते हैं।
इस प्रकार सामाजिक मानदण्ड समाज के सुचारू संचालन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
प्रश्न 08. "समाजशास्त्र और मानवशास्त्र जुड़वा बहिने हैं" स्पष्ट कीजिए।
सामाजिक विज्ञानों में समाजशास्त्र और मानवशास्त्र दोनों का महत्वपूर्ण स्थान है। कई विद्वानों ने इन दोनों विषयों को “जुड़वा बहिने” कहा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि दोनों बिल्कुल एक ही विषय हैं, बल्कि यह है कि दोनों में बहुत गहरा संबंध और समानता पाई जाती है। दोनों ही विषय मानव और उसके सामाजिक जीवन का अध्ययन करते हैं।
अब हम विस्तार से समझेंगे कि समाजशास्त्र और मानवशास्त्र को जुड़वा बहिने क्यों कहा जाता है।
📌 समाजशास्त्र का संक्षिप्त परिचय
समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है।
यह सामाजिक संबंधों, संस्थाओं, समूहों, संस्कृति और सामाजिक परिवर्तन का अध्ययन करता है।
समाजशास्त्र मुख्य रूप से आधुनिक और जटिल समाजों का अध्ययन करता है।
इसका उद्देश्य यह समझना है कि समाज कैसे कार्य करता है और उसमें परिवर्तन कैसे होते हैं।
📌 मानवशास्त्र का संक्षिप्त परिचय
मानवशास्त्र (Anthropology) मानव का समग्र अध्ययन है।
यह मानव की उत्पत्ति, विकास, संस्कृति और जीवन शैली का अध्ययन करता है।
मानवशास्त्र विशेष रूप से आदिम और जनजातीय समाजों का अध्ययन करता रहा है।
हालाँकि आधुनिक समय में यह आधुनिक समाजों का भी अध्ययन करता है।
अब हम दोनों के बीच समानताओं को समझेंगे, जिनके कारण इन्हें जुड़वा बहिने कहा जाता है।
📌 1. अध्ययन का विषय समान
दोनों विषय मानव और उसके सामाजिक जीवन का अध्ययन करते हैं।
समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों और संस्थाओं को समझता है।
मानवशास्त्र मानव की संस्कृति और जीवन शैली का अध्ययन करता है।
दोनों का मुख्य केंद्र मानव और समाज ही है।
📌 2. संस्कृति का अध्ययन
संस्कृति दोनों विषयों का मुख्य विषय है।
समाजशास्त्र संस्कृति के सामाजिक प्रभावों को समझता है।
मानवशास्त्र संस्कृति की उत्पत्ति और विकास का अध्ययन करता है।
इस प्रकार संस्कृति दोनों को जोड़ती है।
📌 3. समान पद्धतियों का प्रयोग
दोनों विषयों में सर्वेक्षण, अवलोकन और साक्षात्कार जैसी पद्धतियों का उपयोग किया जाता है।
विशेष रूप से मानवशास्त्र में “प्रत्यक्ष अवलोकन” की पद्धति प्रसिद्ध है, जिसे समाजशास्त्र ने भी अपनाया है।
📌 4. सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन
परिवार, विवाह, धर्म, अर्थव्यवस्था आदि संस्थाओं का अध्ययन दोनों करते हैं।
मानवशास्त्र इन संस्थाओं का अध्ययन आदिम समाजों में करता है।
समाजशास्त्र आधुनिक समाजों में उनका अध्ययन करता है।
📌 5. एक-दूसरे पर निर्भरता
समाजशास्त्र मानवशास्त्र के शोध से सहायता लेता है।
मानवशास्त्र भी समाजशास्त्रीय सिद्धांतों का उपयोग करता है।
इस प्रकार दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
📌 6. समान उद्देश्य
दोनों का उद्देश्य मानव जीवन को समझना और समाज की समस्याओं का समाधान ढूँढना है।
दोनों सामाजिक सुधार और विकास में योगदान देते हैं।
अब हम दोनों के बीच कुछ अंतर भी संक्षेप में समझेंगे, ताकि तुलना स्पष्ट हो सके।
📌 समाजशास्त्र और मानवशास्त्र में संक्षिप्त अंतर
समाजशास्त्र मुख्य रूप से आधुनिक समाजों का अध्ययन करता है, जबकि मानवशास्त्र प्रारंभ में आदिम समाजों पर केंद्रित था।
समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों पर अधिक ध्यान देता है, जबकि मानवशास्त्र मानव के शारीरिक और सांस्कृतिक पहलुओं का भी अध्ययन करता है।
मानवशास्त्र का क्षेत्र अधिक व्यापक है, क्योंकि इसमें जैविक मानवशास्त्र भी शामिल है।
फिर भी, इन अंतरों के बावजूद दोनों का संबंध बहुत घनिष्ठ है।
📌 जुड़वा बहिने कहने का कारण
दोनों विषयों का जन्म लगभग एक ही काल में हुआ।
दोनों का उद्देश्य मानव और समाज को समझना है।
दोनों में समान विषय, समान पद्धति और समान दृष्टिकोण पाए जाते हैं।
इसी गहरे संबंध और समानता के कारण विद्वानों ने इन्हें “जुड़वा बहिने” कहा है।
📌 आधुनिक संदर्भ में महत्व
आज के समय में समाजशास्त्र और मानवशास्त्र के बीच की दूरी और कम हो गई है।
दोनों विषय एक-दूसरे से ज्ञान और सिद्धांत ग्रहण करते हैं।
वैश्वीकरण और सांस्कृतिक परिवर्तन के अध्ययन में दोनों की संयुक्त भूमिका महत्वपूर्ण है।
📌 निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि समाजशास्त्र और मानवशास्त्र दोनों मानव और उसके सामाजिक जीवन के अध्ययन से जुड़े विषय हैं।
दोनों में विषय-वस्तु, पद्धति और उद्देश्य की समानता पाई जाती है।
हालाँकि कुछ अंतर भी हैं, फिर भी उनका संबंध अत्यंत घनिष्ठ है।
इसी कारण इन्हें “जुड़वा बहिने” कहा जाता है।
इस प्रकार समाजशास्त्र और मानवशास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं और मिलकर मानव समाज की गहन समझ प्रदान करते हैं।
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